बूढ़े बाबा ने खेत में फाड़ दी रिया की चूत!
Antarvasna Village Sex : पेशाब कराते देख लिया बूढ़े बाबा का मूसल 9 इंच लंड! फिर गरम कर खेत में ले जाकर चुसवाई रसभरी चुत! फिर लंड चूस फड़वाई चूत! अंदर भरवाई माल!
लो दोस्तों, मैं रिया। बाईस साल की हूँ, शहर में पढ़ाई कर रही हूँ लेकिन अभी गाँव में दादाजी की तबियत खराब होने की वजह से आई हुई हूँ।
शक्ल-सूरत ऐसी है कि लोग घूरते हैं - चूचियाँ 36 इंच की, भरी हुई और थोड़ी ऊपर की तरफ उठी हुई, कमर 30 इंच की पतली, और गाँड 40 इंच की मांसल, जो चलते वक्त अपने आप हिचकोले खाती है।
अभी दुसरे गाँव के एक जमींदार के लड़के से सगाई हो चुकी है, शादी एक साल बाद पक्की है। लेकिन अंदर से मैं वैसी नहीं हूँ जैसी दिखती हूँ। अभी तक पाँच मर्दों के लंड से अपनी चूत चुदवा चुकी हूँ।
पहली बार पंद्रह-सोलह साल की उम्र में एक शादीशुदा मर्द ने मेरी सील तोड़ी थी। दर्द इतना हुआ था कि हफ्ते भर टाँगें चोड़ी करके चली थी।
उसके बाद ललक ऐसी लगी कि वही मर्द बार-बार चुदाई करवाता रहा, फिर चार और लोगों के नीचे टाँगें खुलने लगीं। नौ बार गर्भ ठहर भी गया, लेकिन समय रहते सब संभाल लिया।
अब ये छठी बार की कहानी है, जो इत्तफाक से एक बूढ़े बाबा के साथ हुई।
हमारे घर से थोड़ी दूर खेतों में एक छोटी झोपड़ी थी। उसमें एक बूढ़ा अकेला रहता था। मैं जब सहेलियों के साथ घूमने जाती तो उसे देखती। ठंड का मौसम था।
एक दिन मन में आया कि जाकर देखूँ, उसका खाना-पीना कौन बनाता होगा। सहेली को साथ चलने को कहा तो उसने मना कर दिया और चली गई। मैं अकेली उसकी झोपड़ी के अंदर चली गई।
अंधेरा था, बाबा चारपाई पर पतला कंबल ओढ़े लेटे थे।
मैंने आवाज दी, “बाबा, मैं अंदर आऊँ? आपसे बात करनी है।” उन्होंने कमजोर आवाज में कहा, “आ जा बेटी। क्या बात है?” मैं अंदर गई और उनकी चारपाई पर बगल में बैठ गई।
जींस, टॉप और ऊपर जैकेट पहनी थी सर्दी की वजह से। बाबा ने मुझसे पूछा कि मैं कौन हूँ, कहाँ रहती हूँ। मैंने बताया कि इसी गाँव की बेटी हूँ, शहर में रहती हूँ, दादाजी की तबियत खराब होने पर आई हूँ।
फिर मैंने पूछा, “बाबा, आपका खाना-पीना कौन बनाता है? कोई नहीं है क्या?” बाबा ने कहा, “कोई नहीं बेटी। एक बेटी थी, उसकी शादी हो गई। अब अकेला हूँ। खुद बना लेता हूँ।”
मुझे उनका पतला कंबल देखकर बुरा लगा। मैंने कहा, “बाबा, कल नया कंबल लाकर देती हूँ। अब मैं चलती हूँ।” जैसे ही उठने लगी, बाबा ने कहा, “रुक बेटी। दो दिन से तबियत ठीक नहीं है।
मुझे पेशाब करना है। क्या तू मुझे उठाकर थोड़ी दूर ले जा सकती है? भगवान तुझे दुआ देगा।”
मैंने उन्हें धीरे से खड़ा किया। पतले थे, वजन ज्यादा नहीं था। पास की खुली जगह की तरफ ले गई। बाबा ने कहा, “यहीं खुले में कर लूँगा। तू चली जा।” मैंने कहा,
“नहीं बाबा, मैं रुकती हूँ। आप कैसे वापस जाओगे? कर लो, मैं मुँह फेर लेती हूँ।”
मैंने पीछे मुँह किया। बाबा ने लुंगी खोली। पेशाब की आवाज सुनाई दी।
अनजाने में मेरी नजर उधर चली गई। बाबा का लंड सोया हुआ था, लेकिन इतना बड़ा और मोटा दिख रहा था कि आँखें फटी रह गईं। काला, भारी, नसें थोड़ी उभर रही थीं। मैं मुड़कर देखने लगी।
बाबा ने देखा और कहा, “बेटी, पीछे मत देख। उधर ही रह।” मैंने माफी माँगी, लेकिन नजर हट नहीं रही थी। पेशाब खत्म करके बाबा ने लुंगी सही की। मैं उन्हें वापस चारपाई पर ले गई।
कंबल में लेट गए। मैं बगल में बैठी रही। बातें होने लगीं।
मैंने जानबूझकर कहा, “बाबा, मुझे भी बहुत ठंड लग रही है। आपसे बात करना अच्छा लग रहा है। क्या मैं आपके कंबल में लेट जाऊँ?” बाबा अजीब नजर से देखने लगे।
मैंने कहा, “क्या देख रहे हो?” वे बोले, “कुछ नहीं बेटी… जवानी के दिन याद आ गए तुझे देखकर। लेट जा अगर तुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है।”
मैं कंबल के अंदर घुस गई। बाबा का शरीर पास था। ठंड में गर्माहट अच्छी लग रही थी। बातें करते-करते मेरा हाथ धीरे से उनके लंड पर रख गया। बाबा ने कुछ नहीं कहा।
मैंने कहा, “बाबा, जब तक यहाँ हूँ रोज आपके पास आ जाया करूँगी। कोई प्रॉब्लम तो नहीं?” बाबा ने कहा, “नहीं बेटी। जब मन करे आ जाना।”
मैंने उनका लंड पकड़ लिया। नरम था अभी।
बाबा बोले, “बेटी, ये क्या कर रही हो?” मैंने कहा, “कुछ भी तो नहीं। रहने दो ना।” बाबा ने कहा, “मैं तुझसे बहुत बड़ा हूँ उम्र में। ये मत करो। तुम परेशान हो जाओगी।”
मैंने पूछा, “कैसे परेशान हो जाऊँगी?” और लंड को धीरे से मसल दिया। लंड फूलने लगा। बाबा की साँसें तेज होने लगीं।
मैंने कहा, “बाबा, मुझे आपका लंड देखना है।” बाबा बोले, “यहाँ खुला है बेटी। कोई आ जाएगा। अभी रात होने वाली है। तू घर चली जा।”
मैंने कहा, “बाबा, फोन आएगा तो कह दूँगी सहेली के घर हूँ। मुझे देखना है।” बाबा थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले, “अच्छा, पीछे एक जगह है। मेरे पीछे आ जा। लेकिन किसी को कहना मत। तेरा पापा मुझे मार डालेगा।”
हम झोपड़ी से बाहर निकले। बाबा आगे, मैं पीछे। थोड़ी दूर खेत के अंदर एक खुली जगह पर पहुँचे जहाँ चारों तरफ ऊँची फसल थी। बाबा ने कहा, “यहाँ कोई नहीं आएगा।”
फिर लुंगी खोल दी। सिर्फ चड्डी में रह गए।
मैंने देखा चड्डी के अंदर लंड पूरा खड़ा हो चुका था, तना हुआ, फूला हुआ। मैंने बाबा के कंधे पर हाथ रखा और दूसरे हाथ से चड्डी के ऊपर से लंड दबाया। बाबा की आवाज में काँप थी,
“बेटी, जो करना है जल्दी कर। लेट मत कर।”
मैंने चड्डी में हाथ डाल दिया और लंड पकड़ लिया। बाबा ने मेरे सिर पर हाथ रखा और मुझे घुटनों के बल बैठा दिया। मैं समझ गई। पहले भी पाँच लोगों के लंड चूस चुकी थी, लेकिन इतना बड़ा और मोटा नहीं देखा था।
लगभग ग्यारह इंच लंबा और चार इंच मोटा लग रहा था। मैंने बिना देर किए चड्डी नीचे खींची। लंड बाहर निकल आया, हिचकोले खाते हुए, काला नाग जैसा। मैंने हाथ में पकड़कर देखा, फिर होंठों से चुम्मा लिया। बाबा के मुँह से “स्स्स…” निकल गई।
मैंने सुपारे को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। पूरा नहीं आ रहा था। आधे से थोड़ा ज्यादा ही मुँह में जा रहा था। मैं जीभ से चाट रही थी, चूस रही थी। लंड गीला हो गया।
मोटी नसें उभर आईं। बाबा मेरे सिर पर हाथ फेर रहे थे, धीरे-धीरे आगे-पीछे कर रहे थे। मेरी चूत भी गीली होने लगी थी।
बाबा ने कहा, “बेटी, खड़ी हो जा।” मैं खड़ी हुई। बाबा ने लुंगी को चादर बनाकर जमीन पर बिछा दिया। कहा, “नंगी हो जा।” मैंने सारे कपड़े उतार दिए।
ब्रा-पैंटी में आ गई। बाबा भी पूरी तरह नंगे हो गए। उनकी त्वचा झुर्रियों वाली थी, लेकिन लंड जवान जैसा कड़क खड़ा था। बाबा ने ब्रा के ऊपर से मेरे बूब्स दबाने शुरू किए। जोर से।
मैंने कहा, “बाबा, आराम से। मैं कहीं भागी नहीं जा रही।” बाबा बोले, “बेटी, तेरी जैसी जवान चूत मुझे मिली है। काबू नहीं हो रहा।”
उन्होंने ब्रा उतार दी और मेरे बूब्स पर टूट पड़े। एक-एक करके चूसने लगे। जीभ से निप्पल्स चाट रहे थे। मेरे मुँह से “आआह… आआह…” निकल रही थी। बाबा धीरे-धीरे नीचे की तरफ आने लगे, पेट चाटने लगे।
नाभि पर जीभ फिरा रहे थे। मैं आँखें बंद करके मजा ले रही थी। फिर उन्होंने मेरी पैंटी उतार दी। एक उंगली मेरी चूत में डाल दी और अंदर-बाहर करने लगे। चूत पहले से गीली थी।
मैंने कहा, “रुको बाबा।” बाबा ने कहा, “बेटी, अब लेट जाओ।”
मैं लुंगी पर लेट गई। टाँगें चोड़ी करके खोलीं। बाबा मेरे ऊपर आए। लंड हाथ में लेकर चूत पर रगड़ने लगे। काफी थूक दिया।
फिर कहा, “बेटी, चिल्लाना नहीं। कोई आ जाएगा तो सब मिलकर मार देंगे।” मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया। बाबा ने सुपारा चूत के मुँह पर लगाया और एक धक्का मारा। लंड फिसल गया। फिर से लगाया और जोर से धक्का दिया।
सुपारा अंदर घुस गया। दर्द हुआ। मेरे मुँह से चीख निकल गई, “ओह्ह… मम्मी…!” बाबा ने जल्दी मेरे मुँह पर हाथ रखा और रुक गए।
बोले, “मत चिल्लाओ बेटी। सारा मजा खराब करेगी।” मैंने सिर हिलाया। बाबा ने फिर धीरे-धीरे धक्के देने शुरू किए। लंड अंदर-बाहर हो रहा था। दर्द कम होने लगा। बाबा की रफ्तार बढ़ने लगी। मेरे बूब्स दब रहे थे।
मैं “आआह… आआह… उआआह…” की आवाजें निकाल रही थी। बाबा मेरे होंठों को चूमने लगे। लंड गहराई तक जा रहा था।
बाबा का लंड धीरे-धीरे मेरी चूत के अंदर घुसता जा रहा था। हर धक्के के साथ दर्द थोड़ा कम हो रहा था और अंदर से एक अजीब सी गर्मी फैलने लगी थी। बाबा का शरीर मेरे ऊपर था, उनकी साँसें मेरी गर्दन पर पड़ रही थीं।
मैंने अपनी दोनों टाँगें थोड़ी और चौड़ी कर लीं ताकि लंड आसानी से अंदर-बाहर हो सके। बाबा एक हाथ से मेरे बाएँ बूब को दबा रहे थे, निप्पल को उँगलियों के बीच मसल रहे थे, और दूसरे हाथ से मेरे कूल्हे को पकड़े हुए धक्के लगा रहे थे।
“आआह… बाबा… धीरे… आआह…” मेरे मुँह से निकल रहा था।
बाबा बोले, “बेटी, तेरी चूत कितनी तंग है। मेरा लंड जकड़ रही है।” उनकी आवाज में काँप थी। लंड लगभग आठ इंच अंदर तक जा चुका था। बाबा ने एक और जोर का धक्का लगाया। सुपारा मेरी बच्चेदानी के मुँह पर टकराया।
मेरे पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई। “ऊईई… मम्मी…!” मैं कराह उठी। बाबा ने मेरे मुँह पर फिर हाथ रखा और बोले, “धीरे आवाज निकाल बेटी। कोई सुन लेगा।”
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