अँधेरे में बेटे ने फाड़ी पूर्णिमा माँ की चूत!
Family Sex : पार्टी के अँधेरे में कॉल बॉय समझ बेटे से चुद गई पूर्णिमा! Wild चुदाई कर बुझाई सालों की प्यास! घर में लंड पकड़ शुरू करी चुत-गांड की घरेलू Chudai!
मेरा नाम पूर्णिमा ताई है। उम्र पचपन साल हो चुकी है। बेटा निकिल। दिल्ली के किसी कोने में रहते हैं। पति रेलवे में नौकरी करते हैं, उम्र सैंतालीस के आसपास। मैं सरकारी स्कूल में टीचर रही हूँ।
घर में पाँच लोग - पति, बड़ा बेटा सोनू (तेईस साल, गोरा-हैंडसम), निकिल (इक्कीस साल, रंग काला पर शरीर तगड़ा और मसल वाला), और छोटी बेटी मीना (उन्नीस साल, दूध जैसी गोरी)।
निकिल पढ़ाई में हमेशा कमजोर रहा। भाई-बहन सब ठीक थे, पर ये बारहवीं में दोबारा फेल हो गया था। घरवालों की नजर में निकम्मा था। हर समय ताने सुनता रहता।
लड़कियाँ उसके काले रंग और कमजोर पढ़ाई की वजह से लाइन नहीं देती थीं। नतीजा ये कि वो छुप-छुपकर मुठ मारने लगा था। रोजी-रोटी की तरह रोजाना। मैं सब जानती थी, पर कुछ बोलती नहीं थी।
पति से मेरे झगड़े भी बढ़ गए थे। जब भी काम से आते, लड़ाई शुरू।
बिस्तर पर भी अब वैसा मजा नहीं रह गया था। अंदर से भूख लगने लगी थी। उम्र पचपन हो गई थी, पर शरीर अभी भी तरोताजा था - बड़े-बड़े मम्मे, गोल गांड, और चूत में अभी भी वह गर्मी बाकी थी जो पति अब नहीं बुझा पाते थे।
एक दिन सहेली की मैरिज एनिवर्सरी आई। पास के शहर में पार्टी थी। एक रात रुकना था। पति घर पर नहीं थे, बड़ा बेटा व्यस्त। मैंने निकिल से कहा, “तेरे पापा और भाई नहीं जा सकते। कोई बहाना मत बना। चुपचाप तैयार हो जा।” वो मजबूरन मेरे साथ चल दिया।
बैंक्वेट हॉल पहुँचे। आंटी ने सब मेहमानों को रूम दे रखे थे। हमें भी एक रूम मिला। मैं सहेलियों से बातें करने लगी, हँसने-गाने में व्यस्त। निकिल इधर-उधर घूमने लगा, किसी पागल की तरह।
पार्टी में एक आदमी ने निकिल को एक कार्ड दिया और कहा, “ये उनको दे दो।” वो महिला करीब बत्तीस साल की दिख रही थी, पर असल में वो सिर्फ मैनेजमेंट कर रही थी।
मैंने पहले से सब व्यवस्था करवा रखी थी। अपनी प्यास बुझाने के लिए। निकिल ने कार्ड दे दिया। महिला ने उसे देखा और बोली, “सुनो, कितना चार्ज करते हो? मेरा तो आज मन नहीं है, फिर भी तुम्हारा कहीं जुगाड़ कर देती हूँ।”
थोड़ी देर बाद वही महिला निकिल के पास आई।
बोली, “तुम्हारा काम हो गया है। पैसे जो मिलें, रख लेना। ज्यादा ना-नुकुर मत करना।”
फिर एक बड़ा सा स्कार्फ देते हुए बोली, “दूसरे फ्लोर पर कमरा नंबर 32। मुँह पर ये कपड़ा बाँधकर जाना… और सुनो, बढ़िया से सर्विस देना। अगर सर्विस पसंद आई तो अगली बार और भी कस्टमर मिलेंगे।”
मैं कमरे में अँधेरे में इंतजार कर रही थी। दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने घरघराती सी आवाज में कहा, “खुला है… आ जाओ।”
जब वो अंदर आया, मैंने दरवाजा बंद किया। उसका हाथ पकड़कर पाँच हजार रख दिए। दबी हुई आवाज में बोली,
“ये पाँच हजार हैं… चाहो तो गिन सकते हो।” फिर उसकी पैंट पर हाथ डाला। तगड़ा लंड टटोला। गरम और सख्त। हाथ से सहलाने लगी। उसे इतना मजा आया कि वो मेरा हाथ अपने लंड पर दबाने लगा।
“आह… मैडम… बहुत अच्छा लग रहा है…”
मैंने उसके कपड़े उतारने शुरू किए। कुछ ही देर में उसे बिल्कुल नंगा कर दिया। लंड पकड़कर मुँह में डाल लिया और चूसने लगी।
“गप… गप… उम्म…” अब उसे जन्नत का मजा आने लगा। वो मेरे मुँह में आगे-पीछे करने लगा। मैंने खाँसते हुए लंड बाहर निकाला और उसके कान में फुसफुसाया, “बहुत बड़ा है तुम्हारा… अब तुम्हारी बारी।”
मैंने उसका हाथ पकड़कर अपने शरीर पर रखा। उसने समझ लिया। मेरे कपड़े निकाल दिए। मैं बिस्तर पर लेट गई। उसने मेरे ऊपर चढ़कर टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। लंड मेरी चूत पर लगाने लगा।
मैंने खुद पकड़कर सही जगह रखा और थपकी देकर हाँ कहा।
जैसे ही उसने पहला धक्का मारा, मेरी आवाज निकल गई, “आह… मर गई… धीरे पेल साले…”
दूसरे धक्के में उसने पूरा लंड अंदर ठेल दिया। मैं चीख उठी, “आह मादरचोद… फाड़ेगा क्या… आराम से कर ना… तेरा इतना बड़ा है…”
अब वो आराम-आराम से चुदाई करने लगा। मैं मस्ती में अपनी गांड उठा-उठाकर मजा लेने लगी।
“आह… आह… और तेज… आह… और तेज…” मेरी मादक आवाजें निकलती रहीं। वो भी तेज-तेज चोदने लगा। पच्चीस मिनट बाद मैंने कहा, “तुम कोई दवाई खाकर आए हो क्या… इतनी देर हो चुकी है, तुम्हारा पानी नहीं निकला?”
वो चुप रहा और चुदाई करता रहा। मैंने फिर कहा, “यार एक बात बताओ, मैं यहाँ लड़की होकर बोले जा रही हूँ और तुम हो कि मर्द होकर भी शर्मा रहे हो!”
उसकी आवाज बदल गई। शायद उसे मेरी आवाज जानी-पहचानी लगने लगी। अगले ही पल वो घबरा गया। मैं महसूस कर सकती थी। उसने तुरंत स्पीड बढ़ा दी और जल्दी झड़ने की कोशिश करने लगा।
मैं “अब आराम से… आराम से…” कहती रही, पर वो मेरी कोई बात सुने बिना और तेज चोदने लगा।
लगभग दस मिनट बाद उसका पानी निकल गया। वो मेरे ऊपर गिर पड़ा। हाँफ रहा था। मैंने बड़े प्यार से उसकी पीठ सहलाई, चूमा। जब थोड़ा होश आया तो वो जल्दी उठकर कपड़े ढूँढने लगा।
“क्या हुआ यार… कहाँ चल दिए?” मैंने पूछा।
जब वो पहनने लगा तो मैंने कहा, “सुनो, मेरी फ्रेंड ने पाँच हजार पूरी रात के बताए थे… और तुम अभी से जा रहे हो?”
उसने पैसे मेरे हाथ पर रख दिए।
मैंने कहा, “यार हुआ क्या है तुम्हें? तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफ करना… पर जा क्यों रहे हो? अगर मन अब और नहीं है तो कम से कम कुछ देर बातें ही कर लेंगे।”
पर उसने एक न सुनी। दरवाजे की ओर चल दिया। मैं एकदम उसके पीछे हो ली और उसे वापस कमरे में खींचने लगी, “सुनो, तुमको और पैसे चाहिए तो मैं दे दूँगी, पर अभी मत जाओ।”
उसने अचानक आवाज बदलकर कहा, “सुनो, पैसों की कोई बात नहीं है। अब आप क्यों जिद कर रही हैं मैडम? अगर आपको कोई पूरी रात के लिए चाहिए तो किसी और को देख लीजिए।”
मैंने कहा, “सुनो, चलो पूरी रात नहीं… एक बार तो और कर सकते हो ना… और तुम जैसा बोलोगे, मैं वैसा ही करूँगी।”
वो बोला, “ठीक है तो सुनो, मुझे बातें करना पसंद नहीं है… और मैं सिर्फ एक और बार करूँगा। उसके बाद कुछ नहीं। और ड्रामा नहीं होना चाहिए।”
“ठीक है,” मैंने कहा।
फिर वो मुझे चूमने लगा। मैंने सोचा – जो होना था, वो हो ही गया है। एक बार और कर लेती हूँ। इससे क्या बिगड़ जाएगा। अगर ऐसे ही चला गया तो पता नहीं क्या सोचेगा।
मैंने उसे 69 की पोजीशन में लेटाया। उसकी चूत चाटने लगी, वो मेरा लंड चूसने लगा।
“आह्ह… हाँ… चाट… आह्ह…” लगभग बीस मिनट बाद मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया। मैंने उठकर उसे कुतिया की तरह बनने का इशारा किया। वो समझ गया। पीछे जाकर लंड रखने लगा तो मैंने कहा, “रुको, गलत छेद है।”
मैंने खुद उसका लंड पकड़कर अपनी चूत पर रखा, “अब करो।”
जैसे ही उसने धक्का दिया, मेरी आवाज निकल पड़ी, “आ… आअ… आआ…” सिसकारियाँ। पर वो बिना रुके चुदाई चालू कर दी। मैं “आह… आह… आई…” करती रही।
थोड़ी देर बाद झड़कर बोली, “अब थोड़ी देर रुक जाओगे क्या?”
वो सीधा लेटते हुए बोला, “सुनो, इसी नाटक की वजह से मैं जा रहा था।”
मैंने कहा, “चलो मत रुको, करो जो करना है।”
वो बोला, “मुझे नहीं करना है… अब तुम्हें करना है।” बिस्तर पर लेट गया, “अब तुम मेरे ऊपर आकर करो।”
मैं उसके ऊपर चढ़ गई। हाथ से लंड पकड़कर अपनी चूत में डालकर उछलने लगी। उसे चूमने लगी। बड़बड़ाने लगी, “आह… आह… तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिले… बड़ा मजा दे रहे हो…”
वो जल्दी करना चाहता था। मुझे अपने ऊपर से हटाया और मेरी टाँगों के बीच आ गया। टाँगें फैलाकर कंधों पर रख लीं और एक झटके में पूरा लंड घुसा दिया। लंड फैलाकर चुदाई चालू कर दी। मेरे बड़े-बड़े मम्मे दबाने लगा। मैं चीखने लगी।
“आह्ह्ह… और जोर से… आह्ह…”
लगभग पंद्रह-बीस मिनट बाद उसने अपना पानी मेरी चूत में छोड़ दिया और मेरे ऊपर गिर पड़ा।
मैंने कहा, “आह… मजा आ गया… सुनो अब कब मिलोगे?”
वो बोला, “मैं एक बार के बाद किसी से दोबारा नहीं मिलता।” उठकर कपड़े पहनने लगा।
“कितने पैसे दूँ आपको?” मैंने पूछा।
“जो देना हो, दे दो।”
मैंने पर्स ढूँढते हुए कहा, “जरा लाइट तो जलाना, मुझे अपना पर्स ढूँढना है।”
ये सुनते ही उसने जल्दी से दरवाजा खोला और एकदम बाहर निकल गया। ताकि भेद न खुल जाए।
दो घंटे बाद मैं अपने रूम में आई। निकिल लेटा हुआ था। मैंने पूछा, “आप कहाँ थे?”
उसने पलटकर पूछा, “क्या मतलब?”
मैंने उसका मोबाइल उसके हाथ में रखा और बोली, “ये कहाँ मिला, पता है तुम्हें?”
वो बोला, “पता नहीं, ये तो पार्टी में कहीं गुम गया था।”
दोस्तों, वो रात कभी नहीं भूली। अँधेरे में अनजान बनकर अपने ही बेटे के साथ जो हुआ… वो मजा, वो गर्मी, वो डर और वो प्यास… सब कुछ याद है।
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उस रात के बाद घर लौटने पर सब कुछ बदल गया था।
निकिल चुप था। मुझसे आँखें नहीं मिलाता था। मैं भी सामान्य बनने की कोशिश करती, पर अंदर से मेरी चूत अभी भी उसके लंड की याद में गीली रहती। रात भर उसके थप्पड़ और गहरी चुदाई की याद आती तो मैं बिस्तर पर लेटी-लेटी अपनी उंगलियाँ चूत में डालकर हिलाती रहती।
पति बगल में सोता रहता, पर मुझे उसकी कोई जरूरत नहीं थी। मेरा शरीर अब सिर्फ निकिल का लंड माँगता था।
दो दिन बाद रात को सब सो गए। मैं रसोई में पानी पीने गई। निकिल भी आया। अँधेरे में हम आमने-सामने खड़े हो गए। मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ा और अपनी चूत पर रख दिया। उसकी हथेली गीली हो गई।
“मम्मी…” वो फुसफुसाया।
मैंने उसके कान में कहा, “अब मम्मी मत बोल। रात वाली औरत बोल। तेरा लंड अभी भी याद है मेरी चूत को। आजा मेरे कमरे में। पापा गहरी नींद में हैं।”
वो थोड़ा झिझका, पर मेरी चूत पर हाथ फेरते-फेरते सख्त हो गया। मैंने उसे अपने कमरे में खींच लिया। दरवाजा अंदर से बंद किया। पति बगल वाले कमरे में खर्राटे ले रहा था।
मैंने जल्दी से अपनी साड़ी और ब्लाउज उतार दिया। नंगी हो गई। बड़े-बड़े मम्मे उसके सामने झूलने लगे। मैंने उसकी पैंट खोलकर लंड निकाला। गरम, सख्त, नसों से भरा। मुँह में लेकर चूसने लगी।
घुटनों के बल बैठकर उसके तगड़े लंड को गले तक उतारने की कोशिश करने लगी। गल-गल की आवाजें आने लगीं। वो मेरे बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदने लगा।
“आह… मम्मी… इतना गहरा…”
मैंने लंड मुँह से निकाला और बोली, “अब चुपचाप चोद। जोर से मत बोल। पापा सुन लेंगे तो दोनों की गांड फट जाएगी।”
मैं बिस्तर पर चारों हाथ-पैर करके कुतिया बन गई। उसने पीछे से आकर अपना मोटा लंड मेरी गीली चूत पर रगड़ा। एक झटके में पूरा अंदर घुसा दिया।
“आह्ह्ह… मादरचोद… इतना बड़ा…” मैंने तकिया मुँह में दबा लिया ताकि चीख न निकले।
वो जोर-जोर से धक्के मारने लगा। उसके अंडे मेरी गांड से टकरा रहे थे। थप्पड़-थप्पड़ की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। मेरी चूत से पानी टपकने लगा। वो मेरी कमर पकड़कर और जोर से पेलने लगा।
“ले… ले साली… तेरी बूढ़ी चूत को चीर दूँगा…” वो गंदी-गंदी बातें करने लगा।
मैं मजे से गांड हिला-हिलाकर जवाब दे रही थी, “हाँ बेटा… चीर दे… अपनी मम्मी की चूत फाड़ दे… और तेज… और गहरा…”
बीस मिनट तक वो पीछे से चुदाई करता रहा। फिर मुझे पलटाया। मेरी टाँगें कंधों पर रखीं और पूरा वजन डालकर चोदने लगा। मेरे मम्मे उसके मुँह में जा रहे थे। वो एक-एक करके चूसने और काटने लगा।
मैं पागल हो गई थी। “आह… निकिल… अपनी मम्मी की चूत में पूरा पानी भर दे… आज रात पूरी भर दे…”
उसने और तेज किया। आखिर में जोर की सिसकारी के साथ मेरी चूत में ही झड़ गया। गरम-गरम पानी अंदर भर गया। वो मेरे ऊपर गिर पड़ा। दोनों हाँफ रहे थे।
मैंने उसके लंड को चूत से निकाला। सफेद पानी टपक रहा था। मैंने उंगली से निकालकर चख लिया और बोली, “तेरा पानी भी स्वादिष्ट है बेटा… अब रोज रात को आना। पापा को पता नहीं चलना चाहिए।”
अगले कई दिनों तक यही सिलसिला चला।
कभी रात को सब सोने के बाद वो मेरे कमरे में आता। कभी मैं उसके कमरे में चली जाती। एक बार तो दोपहर में जब घर में कोई नहीं था, मैंने उसे रसोई में ही खींच लिया।
काउंटर पर बैठाकर उसकी पैंट उतारी और मुँह में लंड लेकर चूसने लगी। फिर खुद अपनी साड़ी ऊपर कर ली और उसकी गोद में बैठकर चूत में लंड घुसा लिया। उछल-उछलकर चुदाई करने लगी। मम्मे उसके मुँह में डाल दिए। वो काट-काट कर चूस रहा था।
“आह… मम्मी… तेरी चूत कितनी टाइट है… उम्र में पचपन हो गई फिर भी कुँवारी जैसी…”
मैं हँसते हुए बोली, “तेरे पापा ने कभी इतना जोर से नहीं चोदा… तू ही सही मर्द निकला… अपनी मम्मी को कुतिया बनाकर चोद…”
एक रात मैंने उससे कहा, “आज मेरी गांड में डाल। अभी तक नहीं डाला।”
वो थोड़ा हिचकिचाया। मैंने खुद तेल लगाकर अपनी गांड की छेद को गीला किया। कुतिया बनकर खड़ी हो गई। उसने धीरे-धीरे अपना मोटा लंड मेरी गांड में घुसाना शुरू किया।
“आह्ह्ह… मादरचोद… फट गई… धीरे…”
पर दर्द के साथ मजा भी आ रहा था। धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर चला गया। फिर वो जोर-जोर से गांड चोदने लगा। मैं तकिया दबाए चीख रही थी। मेरी चूत से पानी की धारा बह रही थी। उसने एक हाथ से मेरी चूत भी मसलनी शुरू कर दी।
दोनों छेद एक साथ इस्तेमाल हो रहे थे। आखिर में उसने मेरी गांड में ही पूरा पानी भर दिया। निकालते समय सफेद पानी टपकता रहा। मैं बिस्तर पर लेटी-लेटी अपनी गांड और चूत दोनों मसल रही थी।
“अब तू मेरी जान बन गया है निकिल… रोज चोद मुझे… जितना गंदे तरीके से चाहे… कुतिया बना, रंडी बना, जो करना है कर… बस पापा को पता न चले।”
अब घर में दिन-रात यही चलता है।
कभी बाथरूम में, कभी रात को बिस्तर पर, कभी सुबह जल्दी। मैं अपनी उम्र भूल चुकी हूँ। मेरी चूत और गांड अब सिर्फ अपने बेटे के लंड की भूखी रहती हैं। वो जब चाहे आता है, जितना गंदा बोलना चाहे बोलता है, जितना जोर से चोदना चाहे चोदता है।
और मैं? मैं बस अपनी टाँगें फैलाए उसकी प्रतीक्षा करती हूँ…
एक रात सब कुछ खुल गया।
रात के करीब दो बजे थे। घर में सन्नाटा। पति गहरी नींद में थे, या कम से कम मैंने सोचा था। निकिल मेरे कमरे में था। मैं चारों हाथ-पैर करके कुतिया बनी हुई थी। उसने पीछे से अपना मोटा लंड मेरी चूत में पूरा घुसा रखा था और जोर-जोर से धक्के मार रहा था। थप्पड़-थप्पड़ की आवाज आ रही थी। मैं तकिया मुँह में दबाए “आह… आह… और तेज… अपनी मम्मी की चूत फाड़ दे…” कह रही थी।
अचानक कमरे का दरवाजा जोर से खुला।
लाइट जल गई।
पति दरवाजे पर खड़े थे। आँखें फटी हुईं। मुँह खुला हुआ। वो हम दोनों को देख रहे थे – अपनी बीवी नंगी, कुतिया बनी हुई, और अपना इक्कीस साल का बेटा उसके पीछे खड़ा, लंड अंदर तक धँसाए हुए।
सन्नाटा छा गया।
निकिल का लंड अचानक ढीला पड़ने लगा। वो पीछे हटा। मैं तेजी से पलटी और चादर ओढ़ने की कोशिश करने लगी, पर बहुत देर हो चुकी थी।
पति की आवाज काँप रही थी, “यह… यह क्या चल रहा है पूर्णिमा…? तू… अपने बेटे के साथ…?”
मैं कुछ नहीं बोली। शर्म से मेरा चेहरा लाल हो गया था, पर अंदर से एक अजीब सी गर्मी भी दौड़ रही थी। निकिल ने जल्दी से पैंट पहननी शुरू की।
पति कमरे में घुसे। दरवाजा बंद किया। उनकी आँखों में गुस्सा, सदमा और कुछ और था। वो निकिल के पास गए और उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा।
“साले… अपनी माँ को चोद रहा था…?”
निकिल चुप रहा। मैंने हिम्मत करके कहा, “विक्की… सुन… बात ऐसी है…”
पति मेरी तरफ मुड़े। उनकी नजर मेरी नंगी छातियों और जांघों पर टिकी। मेरी चूत से अभी भी निकिल का पानी टपक रहा था। उन्होंने देखा।
फिर अचानक उन्होंने अपनी पैंट का बटन खोला।
“तू रंडी बन गई है… अपने बेटे की रंडी… तो आज दोनों की सेवा कर।”
मैं हैरान रह गई। निकिल भी।
पति ने अपनी पैंट नीचे कर दी। उनका लंड भी सख्त हो चुका था। उम्र के हिसाब से अभी भी ठीकठाक। उन्होंने मेरा बाल पकड़ा और अपने लंड की तरफ खींचा।
“मुँह खोल। पहले मुझे चूस। फिर अपने बेटे को भी चूस। आज रात दोनों को संतुष्ट करेगी।”
मैं घबरा गई थी, पर शरीर ने जवाब दे दिया। मेरी चूत फिर से गीली होने लगी। मैंने मुँह खोला। पति का लंड मुँह में ले लिया। उसी समय निकिल भी पास आ गया। मैंने एक हाथ से निकिल का लंड पकड़ा और हिलाने लगी।
पति जोर-जोर से मेरे मुँह में धक्के मारने लगे। “ले… ले रंडी… अपने पति का भी चूस… बेटे का भी चूस… आह्ह… कितनी गहरी चूसती है…”
थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। “टाँगें फैला।”
मैंने फैला दीं। पति मेरे ऊपर चढ़ गए और एक झटके में अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया। उसी चूत में जिसमें थोड़ी देर पहले निकिल का पानी भरा था। वो जोर-जोर से चोदने लगे।
“साली… बेटे से चुदवाती थी… अब पति भी चोदेगा… दोनों मिलकर तेरी चूत फाड़ेंगे… आह्ह… कितनी ढीली हो गई है…”
निकिल बगल में खड़ा देख रहा था। उसका लंड फिर से सख्त हो गया था। पति ने उसे इशारा किया, “आ जा… इसकी गांड में डाल। आज दोनों छेद भरे जाएंगे।”
निकिल ने तेल लिया। मेरी गांड की छेद पर लगाया। फिर धीरे-धीरे अपना मोटा लंड मेरी गांड में घुसाने लगा।
“आह्ह्ह… दोनों… एक साथ… आह्ह्ह… फट गई…” मैं चीख पड़ी।
अब दोनों एक साथ मुझे चोद रहे थे। पति आगे से चूत में, निकिल पीछे से गांड में। दोनों के धक्के एक दूसरे से टकरा रहे थे। मेरा शरीर बीच में दबकर काँप रहा था। मम्मे पति के मुँह में जा रहे थे। वो काट-काट कर चूस रहे थे।
“आह… विक्की… निकिल… धीरे… फट जाएगी… आह्ह्ह…”
पर दोनों रुकने वाले नहीं थे। पति गंदी-गंदी बातें करने लगे, “तेरी चूत कितनी ढीली हो गई है… बेटे ने खोल दी… अब दोनों मिलकर रोज चोदेंगे… तू हमारी साझा रंडी बन गई है…”
निकिल भी अब खुलकर बोल रहा था, “पापा… मम्मी की गांड बहुत टाइट है… आज पूरा पानी इसमें भरूँगा… आह्ह… ले मम्मी…”
मैं पागल हो रही थी। दोनों छेद भरे हुए थे। दर्द और मजे का मिश्रण। मेरी चूत से पानी की धारा बह रही थी। आखिर में पहले निकिल ने मेरी गांड में जोर से झड़ा। गरम पानी अंदर भर गया। उसके कुछ देर बाद पति ने भी मेरी चूत में पूरा पानी छोड़ दिया।
दोनों निकल गए। मैं बिस्तर पर लेटी रही। दोनों छेदों से सफेद पानी टपक रहा था। पूरा शरीर काँप रहा था।
पति ने सिगरेट जलाई और बोले, “आज से नियम बदल गए हैं। जब मन करेगा, दोनों आएंगे। कभी एक-एक करके, कभी साथ में। तू मना नहीं करेगी। समझी?”
मैंने थकी हुई आवाज में कहा, “हाँ… समझ गई…”
उस रात के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया।
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अब दिन हो या रात, जब भी पति या निकिल को मन होता, मुझे बुला लेते। कभी पति पहले चोदते, फिर निकिल। कभी दोनों एक साथ। कभी मुझे घुटनों के बल बैठाकर दोनों का लंड बारी-बारी से चूसवाते। कभी मुझे कुतिया बनाकर एक चूत में, एक गांड में।
एक दिन तो दोपहर में जब घर में सिर्फ हम तीन थे, पति ने मुझे सोफे पर लिटाया। निकिल ने मेरे मुँह में लंड दे दिया और पति ने चूत में। दोनों एक साथ धक्के मार रहे थे। मैं बीच में दबी हुई “गल… गल… आह्ह…” की आवाजें निकाल रही थी। मेरे मम्मे हवा में झूल रहे थे। पति ने उन्हें पकड़कर जोर से मसला।
“साली… दोनों छेद और मुँह… सब एक साथ इस्तेमाल होगा अब से… आह्ह… कितनी रंडी बन गई है तू…”
निकिल ने मेरे बाल खींचकर मुँह में और गहरा धक्का मारा। “मम्मी… गले तक ले… आह्ह… तेरा मुँह भी अब हमारा है…”
मैं हाँफ रही थी, लेकिन शरीर खुद आगे बढ़ रहा था। थोड़ी देर बाद निकिल ने मुँह से लंड निकाला और मेरे बगल में खड़ा हो गया। पति ने मुझे उल्टा किया और कुतिया बना दिया। फिर खुद पीछे से गांड में घुस गए। निकिल आगे आकर मेरे मुँह में अपना लंड ठूंस दिया।
“आह्ह्ह… दोनों… फिर से… आह्ह… गंदे मादरचोद…” मैं चीख रही थी, लेकिन आवाज मुँह में लंड की वजह से दबी हुई थी।
पति जोर-जोर से गांड चोद रहे थे। “तेरी गांड कितनी खुली हो गई है… बेटे ने खोल दी थी… अब पति भी पूरा भरेगा… आह्ह… ले रंडी…”
निकिल भी मुँह चोदते हुए बोला, “पापा सही कह रहे हैं मम्मी… आज पूरी रात दोनों छेद भरेंगे… आह्ह… चूस अच्छे से…”
लगभग बीस मिनट तक ये सिलसिला चला। फिर दोनों ने लगभग एक साथ झाड़ दिया। पति ने गांड में और निकिल ने मुँह में। मैंने जितना बन पड़ा निगल लिया। बाकी मेरे चेहरे पर फैल गया।
पति ने सिगरेट जलाते हुए कहा, “पुर्णिमा, आज बेटे की गांड में पानी भरने का मन है। तैयार हो जा।”
और मैं तैयार हो जाती।
एक और रात पति ने मुझे बिस्तर पर चारों हाथ-पैर करके खड़ा किया। निकिल आगे से चूत में और पति पीछे से गांड में। दोनों के धक्के इतने तालमेल से लग रहे थे कि मैं बार-बार झड़ रही थी।
“आह्ह्ह… विक्की… निकिल… दोनों मिलकर फाड़ दो… आह्ह… अपनी रंडी की चूत और गांड… दोनों…”
पति ने मेरे मम्मे पकड़कर खींचे और बोले, “साली… अब तू सिर्फ हमारी साझा रंडी है… रोज चोदेंगे… कभी एक-एक करके… कभी साथ में… मना मत करना…”
निकिल ने भी साथ दिया, “मम्मी… तेरी चूत इतनी गीली है… पापा का पानी भी अंदर है… फिर भी मजा आ रहा है… आह्ह…”
मैं पागल हो चुकी थी। “हाँ… दोनों आओ… जितना गंदा करना है करो… आह्ह… मैं तैयार हूँ…”
आखिर में दोनों ने मेरे अंदर ही झाड़ दिया। मैं बिस्तर पर गिर पड़ी। दोनों छेदों से सफेद पानी बह रहा था। शरीर काँप रहा था।
पति ने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा, “समझ गई ना? अब घर का नियम यही है। जब बुलाएँ, आना। टाँगें फैला देना। मुँह खोलना। गांड भी देना। कोई शर्त नहीं।”
मैंने थकी हुई आवाज में हाँ कह दिया।
अब मैं सिर्फ उनकी माँ या बीवी नहीं रही। मैं उनकी साझी रंडी बन चुकी थी। दोनों के लंड की भूखी। दोनों की गंदी बातों की आदी।
और सबसे बड़ी बात – मुझे पछतावा नहीं था।
हर रात जब दोनों मेरे शरीर पर टूट पड़ते, तो मैं बस अपनी टाँगें और फैला देती… और कहती –
“आओ… दोनों आओ… आज फिर से अपनी रंडी को चोदो… जितना गंदा करना है करो…”
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रात के करीब दो बजे थे। घर में सन्नाटा। पति गहरी नींद में थे, या कम से कम मैंने सोचा था। निकिल मेरे कमरे में था। मैं चारों हाथ-पैर करके कुतिया बनी हुई थी।
उसने पीछे से अपना मोटा लंड मेरी चूत में पूरा घुसा रखा था और जोर-जोर से धक्के मार रहा था। थप्पड़-थप्पड़ की आवाज आ रही थी। मैं तकिया मुँह में दबाए “आह… आह… और तेज… अपनी मम्मी की चूत फाड़ दे…” कह रही थी।
अचानक कमरे का दरवाजा जोर से खुला।
लाइट जल गई।
पति दरवाजे पर खड़े थे। आँखें फटी हुईं। मुँह खुला हुआ। वो हम दोनों को देख रहे थे – अपनी बीवी नंगी, कुतिया बनी हुई, और अपना इक्कीस साल का बेटा उसके पीछे खड़ा, लंड अंदर तक धँसाए हुए।
सन्नाटा छा गया।
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