बहन ने बनाया मदारचोद!
Family Antarvasna : बहन ने भाई को मदारचोद बनाने का बनाया प्लान! माँ की किया गर्म! फिर दरवाजे से मम्मी को दिखवाई अपनी चुत चुदाई! ताकि माँ भी चुदे भाई के लंड से!
अभी तक आपने "पॉर्न देखकर बहन ने लिया भाई का लंड!" में पढ़ा :-
और मम्मी... वो तुम्हारी पत्नी नहीं बनेंगी। वो तुम्हारी मम्मी ही रहेंगी। लेकिन रात में... रात में वो तुम्हारी रखैल बन जाएंगी," प्रिया ने कान में फुसफुसाते हुए कहा।
मेरा लंड पैंट में फनफना उठा।
"और अगर मम्मी राजी हुईं... तो हम तीनों एक साथ सोएंगे। एक ही बिस्तर पर। तुम एक रात मम्मी को चोदोगे... दूसरी रात मुझे। और कभी-कभी... दोनों को एक साथ," प्रिया ने आगे कहा।
मैंने उसे गले लगा लिया। यह सोचकर ही मेरा दिमाग घूम रहा था।
"अब जाओ सो जाओ। कल से शुरू होगा असली खेल। मम्मी को पटाने का खेल। उन्हें अपने बेटे के लंड का दीवाना बनाने का खेल," प्रिया ने कहा।
वो उठकर अपने कमरे में चली गई। मैं अकेले सोफे पर बैठा रहा। मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही ख्याल था - मम्मी। उनकी गोरी चूत। उनके बड़े बूब्स। उनकी गोल गांड।
क्या वो सच में राजी हो जाएंगी? क्या मैं अपनी माँ को चोद पाऊंगा?
रात भर मैं करवटें बदलता रहा। नींद नहीं आ रही थी। सुबह होते ही नया दिन शुरू होगा। और उस दिन से शुरू होगी मम्मी को पटाने की यात्रा।
क्या प्रिया का प्लान काम करेगा? क्या मम्मी अपने बेटे के लंड के लिए अपनी चूत देंगी?
अब आगे :-
अगली सुबह घर बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसे हर रोज लगता है। किचन से कड़ाही की आवाज आ रही थी, केतली उबल रही थी और मम्मी प्रिया को आवाज दे रही थीं कि दूध निकाल ले।
लेकिन मेरे शरीर में कल रात वाली बात उतर चुकी थी। प्रिया ने साफ कह दिया था कि मम्मी को धीरे-धीरे तैयार करेगी और मैं मदारचोद बनूँगा। सुबह होते ही वही बात बार-बार दिमाग में घूम रही थी।
मैं नहाकर तौलिया लपेटे बाहर निकला। जानबूझकर छाती खुली रखी। बाल अभी गीले थे। तौलिया कमर पर ठीक से बंधा था, लेकिन नीचे लंड हल्का तना हुआ था।
मम्मी किचन पर खड़ी थीं। उन्होंने पलटकर देखा और एक पल के लिए उनकी निगाह मेरे पेट और छाती पर रुक गई। फिर उन्होंने जैसे जबरदस्ती नजरें हटाईं।
“आर्यन, शरम करो थोड़ा। लड़के हो गए हो। तौलिया लपेटकर घर में यूँ नहीं घूमा करते।”
प्रिया फ्रिज का दरवाजा बंद करते हुए बोली, “मम्मी, आप भी ना। जिम जाने लगा है वो। बॉडी बन रही है तो दिखेगी भी। आप पहले भी तो पापा को ऐसा ही देखती थीं।”
मम्मी ने करछी रोकी। “पापा और बेटे में फर्क होता है प्रिया। तू बहुत बातें बनाने लगी है nowadays।”
“मैं बातें नहीं बना रही मम्मी। सच बोल रही हूँ। आप खुद देखो ना, आर्यन अब बच्चा नहीं रहा। घर में एक जवान लड़का रह रहा है और आप अभी भी उसे दस साल का समझती हो।”
मम्मी ने मेरी तरफ देखा, फिर चाय का कप मेरे हाथ में थमा दिया। उनकी उंगलियाँ मेरे हाथ से एक पल ज्यादा लगीं।
मैंने जानबूझकर हटाया नहीं। वो खुद हट गईं और बोलीं, “चाय पी लो और कपड़े पहन लो। इतनी सुबह-सुबह यह सब ठीक नहीं लगता।”
मैंने धीरे से कहा, “क्या चीज ठीक नहीं लगता मम्मी? मैं घर में हूँ। बाहर थोड़े जा रहा हूँ।”
वो गैस की तरफ मुड़ गईं। “बस पहन लो। ज्यादा सवाल मत पूछो।”
दोपहर तक घर में सामान्य बातें चलती रहीं, लेकिन प्रिया का प्लान धीरे-धीरे काम करने लगा। मम्मी जब अपने कमरे में आराम करने गईं तो प्रिया मेरे पास आई और बहुत धीमी आवाज में बोली,
“भैया, आज दोपहर को वो नहाने जाएंगी। दरवाजा अक्सर पूरी तरह बंद नहीं करतीं क्योंकि पापा होते नहीं और घर में हम ही रहते हैं।
तुम गलियारे में पानी के बहाने खड़े रहना। ज्यादा अंदर मत घुसना। बस नजर मिल जाए। डरना नहीं, भागना भी नहीं। एक बार उनकी आँखों में देख लेना।”
“अगर वो चिल्ला दीं तो?” मैंने पूछा।
“नहीं चिल्लाएंगी। मैं जानती हूँ। वो डांटेंगी, शरम से लाल होंगी, लेकिन अंदर से ये सोचेगी कि बेटे ने उन्हें औरत की तरह देखा। बस वही चाहिए हमें।”
मम्मी नहाने गईं। पानी की आवाज आने लगी। भाप दरवाजे के नीचे से निकल रही थी। कुंडी पूरी तरह चढ़ी नहीं थी, जैसा प्रिया ने कहा था। मैं गलियारे में खड़ा रहा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
एक बार लगा कि यह सब गलत है, कि मैं अपनी माँ के दरवाजे पर खड़ा हूँ, लेकिन उसी वक्त प्रिया का चेहरा याद आ गया जब वो कह रही थी - मैं तुझे मदारचोद बनाऊँगी।
मैंने दरवाजा हल्का सा धक्का दिया। दरार से मम्मी का गोरा कंधा दिखा। तौलिया छाती पर था, बाल गीले थे, कान के नीचे पानी की बूंदें थीं। उन्होंने गर्दन घुमाई और मुझे देख लिया।
हमारी निगाहें मिलीं। कोई नहीं बोला पहले दो सेकंड तक।
फिर मम्मी ने तौलिया और कसकर पकड़ा। “आर्यन? यहाँ क्या कर रहे हो? मैं नहा रही हूँ।”
मेरी आवाज फंस गई। “मम्मी… पानी पीने आया था… टॉयलेट समझ लिया…”
“टॉयलेट उस तरफ है। यह बात तुम्हें बचपन से पता है।” उनकी आवाज सख्त थी, लेकिन साँस तेज चल रही थी। तौलिया उनके बूब्स पर दबा हुआ था। नीचे गांड की गोलाई कपड़े में साफ उभर रही थी।
“चले जाओ यहाँ से। और आगे से दरवाजा देखकर आया करो।”
मैं पीछे हटा। “सॉरी मम्मी। गलती से हो गया।”
वो दरवाजा खींच रही थीं, लेकिन पूरी तरह बंद करने से पहले उन्होंने एक बार फिर देखा। उस निगाह में सिर्फ गुस्सा नहीं था। कुछ और भी था, जिसे वो छुपाना चाहती थीं।
पीछे हॉल में प्रिया खड़ी थी। जैसे ही मैं आया, उसने मेरा हाथ पकड़ा और कमरे में घसीटा।
दरवाजा बंद करके बोली, “हो गया। तुमने देखा ना उनके चेहरे को? वो सिर्फ नाराज नहीं थीं। वो घबराई हुई थीं। घबराहट तब होती है ना जब औरत को पता चल जाए कि उसे देखा गया है।”
“प्रिया, बहुत तेज हो रहा है यह सब। मम्मी हैं वो।”
“मैं जानती हूँ वो मम्मी हैं। इसीलिए तो धीरे कर रहे हैं। अगर मैं चाहती तो कल रात ही उन्हें बिस्तर पर ले आती। लेकिन तब वो सुबह पछतातीं और घर खराब हो जाता। हमें उनकी शर्म तोड़नी है, इज्जत नहीं।”
उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बहुत साफ शब्दों में कहा, “आज रात मम्मी के सोने के बाद मेरे कमरे में मत आना। तुम अपने कमरे में रहना।
मैं उनके पास जाऊँगी। लड़कियों वाली ईमोशनल और गंदी बात करूँगी। पापा की कमी, अकेली रातें, शरीर की भूख। तुम कुछ मत बोलना। बस रात को उनके कमरे के बाहर से गुजरना।
अगर दरवाजा थोड़ा खुला हो तो समझ जाना कि बात आगे बढ़ी है।”
मैंने उसे देखा। “तुम सच में उनसे यह सब पूछ लोगी?”
प्रिया हँसी नहीं। इस बार उसका चेहरा गंभीर था। “भैया, मैंने कल रात तुम्हारे लंड को मुँह में लिया था और अपनी चूत में लिया था। अब शर्म किस बात की बची है? मम्मी भी औरत हैं।
पैंतालीस साल की अकेली औरत। पापा महीने में एक बार आते हैं और वो भी थककर सो जाते हैं। मैंने मम्मी को रात को करवटें बदलते देखा है।
मैंने देखा है जब वो टीवी पर कोई बोल्ड सीन आता है तो चैनल बदल देती हैं, लेकिन बदलने से पहले दो सेकंड देखती हैं। वो तैयार हैं। बस कोई उन्हें इजाजत दे।”
शाम को घर में खाना सामान्य रहा।
मम्मी ने रोटी दी, साग लगाया, मुझसे पूछा इंटर्नशिप कैसी चल रही है। प्रिया बीच-बीच में हँसती रही जैसे कुछ हुआ ही न हो। खाने के बाद मम्मी अपने कमरे में चली गईं। टीवी की आवाज बंद हो गई।
ग्यारह बजकर बीस मिनट पर प्रिया उठकर उनके कमरे में गई। मैं हॉल में बैठा रहा। तीस मिनट तक कुछ नहीं सुनाई दिया। फिर बहुत हल्की आवाज आई, दो औरतों की।
शब्द साफ नहीं थे। कभी मम्मी की सख्त आवाज, कभी प्रिया की धीमी। एक बार लगा मम्मी ने कहा, “यह बात मुझसे मत कर।” फिर सन्नाटा। फिर फिर से बात।
पैंतालीस मिनट बाद प्रिया निकली। उसके गाल लाल थे, आँखें चमक रही थीं। वो मेरे पास आकर सोफे पर बैठ गई और बहुत देर तक कुछ नहीं बोली। फिर धीरे से कहा।
“भैया, मम्मी ने हाँ नहीं की। लेकिन ना भी वैसी नहीं की जैसी माँ किया करती है। उन्होंने पूछा कि मैं यह सब सोचती कहाँ से हूँ।
मैंने कहा - घर में रहकर। आप अकेली सोती हो, पापा की कमी है, और आर्यन अब बच्चा नहीं रहा। वो चुप हो गईं। अंत में इतना कहा कि प्रिया, कुछ बातें घर की इज्जत के बाहर की होती हैं।
मैंने कहा - इज्जत तब रहती है जब औरत खुश हो। दुखी माँ से घर नहीं चलता।”
“फिर क्या हुआ?”
“फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला कि जा सो। बहुत बोल ली तू। लेकिन हाथ छोड़ते समय उन्होंने जोर से नहीं छोड़ा। धीरे छोड़ा। समझ रहे हो ना फर्क?”
मैंने सिर हिलाया। गला सूख रहा था।
प्रिया ने मेरे कान के पास आकर कहा, “कल रात तुम उनके पैर दबाने जाना। कमर दर्द का बहाना पहले से है। मैंने आज याद दिला दिया उनको। वो मना नहीं करेंगी।
बस एक शर्त है - ज्यादा मत बढ़ना। हाथ जांघ तक ले जाना, ऊपर नहीं। लंड दिख जाए तो दिखने देना, छुपाना मत। उन्हें देखना है, बस कबूल नहीं करना।”
मैं रात भर करवटें बदलता रहा। नींद नहीं आई। हर बार आँख बंद करता तो मम्मी की वो निगाह याद आती जो नहाने वाले दरवाजे पर मिली थी। माँ वाली निगाह नहीं थी वो। औरत वाली थी, जो खुद से डर रही थी।
दूसरे दिन घर में बातें सामान्य रहीं, लेकिन हवा भारी थी। मम्मी ज्यादा बोलती नहीं थीं। चाय देते समय मेरी तरफ देखतीं तो नजर हटा लेतीं।
प्रिया जानबूझकर उनके पास बैठती, बाल बनाती, कमर दर्द पूछती। दोपहर को मम्मी ने खुद कहा, “रात को अगर आर्यन जगे तो पैर दबा देना। नींद नहीं आती इन दिनों।”
प्रिया ने मेरी तरफ देखा जैसे कह रही हो — देख लिया, दरवाजा खुद खुल गया।
रात दस बजकर चालीस मिनट पर मैं उनके कमरे के बाहर खड़ा हुआ। अंदर टीवी की हल्की आवाज आ रही थी। मैंने खटखटाया।
“कौन है?”
“मम्मी, मैं हूँ। आपने कहा था पैर दबा दूँ। सो नहीं रहे क्या आप?”
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा। फिर उनकी आवाज आई, “आ जाओ। दरवाजा बंद कर देना, ठंड लग रही है।”
कमरे में एक बल्ब जल रहा था। मम्मी बिस्तर पर तकिया लगाए बैठी थीं। साड़ी नहीं थी। कॉटन की हल्की नाइटी पहनी हुई थी, बिना ब्रा के। बूब्स का उभार कपड़े में साफ दिख रहा था।
मैंने नजरें झुकाईं, लेकिन देर तक नहीं झुका सका। उन्होंने देखा कि मैं देख रहा हूँ। कुछ नहीं बोलीं।
“यहाँ बैठ जाओ।” उन्होंने पैर आगे किए।
मैं बिस्तर के किनारे बैठ गया। पिंडली पकड़ी। उनके पैर मुलायम थे, थोड़े ठंडे। मैंने धीरे-धीरे दबाया। मम्मी ने आह भरी, फिर संभल गईं।
“जोर से नहीं। बस हल्का-हल्का। हाँ… वहीं… रोज खड़े-खड़े काम करने से सूज जाते हैं।”
मैंने घुटने तक हाथ ले गए। “मम्मी, पापा आते कब हैं इस बार?”
वो टीवी की तरफ देखती रहीं। “पता नहीं बेटा। बोले थे काम ज्यादा है। अब महीने में एक बार भी ठीक से नहीं आ पाते। आते हैं तो थककर सो जाते हैं। बात भी पूरी नहीं होती।”
“आप अकेली कैसे रह लेती हो इतने दिन?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा। “माँ होती है इंसान, तो अकेला रहना सीख लेती है। तुम बच्चे हो, यह बात समझोगे नहीं।”
प्रिया का सिखाया हुआ वाक्य मुँह तक आया। मैंने कहा, “मम्मी, हम अब बच्चे नहीं रहे। प्रिया भी बड़ी हो गई है, मैं भी। घर में जो खालीपन है वो हमें भी दिखता है।”
उनका हाथ मेरे हाथ के पास आ गया, लेकिन छुआ नहीं। “बहुत बोलने लगे हो तुम लोग। प्रिया ने दिन में भी यही सब कहा था। मैं माँ हूँ आर्यन। माँ के कुछ रिश्ते कायदे के होते हैं।”
मैं हाथ और ऊपर ले गया। जांघ के निचले हिस्से तक। नाइटी थोड़ी खिसक गई। गोरी त्वचा दिखी। मम्मी का शरीर एक बार तना, फिर ढीला पड़ा। उन्होंने मेरा हाथ नहीं हटाया। सिर्फ इतना कहा, “बस करो। इतना काफी है।”
मैं रुका, लेकिन हाथ वहीं रखा। “दर्द यहीं ज्यादा है ना?”
“हाँ… ऊपर कमर में भी रहता है। लेकिन ऊपर मत जाना।”
कमरे में टीवी चल रहा था, कोई सीरियल, लेकिन कोई देख नहीं रहा था। मेरा लंड पजामे में तन चुका था। जब मैंने पोजीशन बदली तो उभार साफ हो गया। मम्मी की निगाह एक पल के लिए वहाँ गई।
उन्होंने मुँह फेरा, गला साफ किया और बोला, “जाओ अब सो जाओ। बहुत दबा दिया। नींद आ जाएगी।”
मैं उठा। खड़ा होते समय पजामा और तन गया। छुपाने की कोशिश की, फिर सोचा प्रिया ने मना किया है छुपाने से। मम्मी ने देखा। इस बार नजर ज्यादा देर तक रही। फिर उन्होंने कंबल अपनी तरफ खींच लिया।
“रातेश बंद करके जाना। और आर्यन…” वो रुकीं, शब्द चुनती हुई। “घर में इज्जत रहनी चाहिए। जो बात मन में आए, सब करने की नहीं होती।”
मैं दरवाजे पर मुड़ा। “मैं समझ गया मम्मी। लेकिन कभी-कभी मन की बात भी दबाने से बीमारी हो जाती है।”
वो जवाब नहीं दीं। मैं बाहर आया तो प्रिया गलियारे में खड़ी थी। उसने मेरे हाथ का तापमान महसूस किया और फुसफुसाकर कहा, “उनकी जांघ तक गया ना तू? मैं जानती थी। वो सो नहीं पाएंगी आज। तू अपने कमरे जा। आधा घंटा बाद मैं आऊँगी। आज उनको सुनना है।”
“प्रिया, दरवाजा खुला रखना खतरनाक है।”
“इसीलिए रखना है। डर के बिना यह घर नहीं खुलेगा। तू आवाज कम रखना, मैं थोड़ी सी कराहूँगी। बस इतनी कि लगे कोई सपना देख रहा है, इतनी नहीं कि पड़ोसी सुन ले।”
मैं कमरे में गया। बारह बजकर दस मिनट पर प्रिया आई। नाइटी में, बाल खुले, पैंटी नहीं। उसने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। कुंडी हल्की छोड़ी, जैसे हवा से हिल सके।
फिर मेरे पास आई और बहुत धीमे बोली, “आज पॉर्न मत खोलना। आज सिर्फ बात करो और मुझे लो। मम्मी का नाम लेकर लो। उन्हें सुनना है कि बेटा क्या सोचता है।”
मैंने विरोध किया। “यह बहुत नीचे है प्रिया। वो हमारी माँ हैं।”
प्रिया ने मेरे गाल पर हाथ रखा। “भैया, कल रात तुम मेरी चूत में माल छोड़ आए हो।
अब नैतिकता का लेक्चर मत दो। मैं तुम्हें मदारचोद बनाने बैठी हूँ। मदारचोद वह नहीं होता जो गलती से हो जाए। वो होता है जो जानकर अपनी माँ को औरत समझे। आज सिर्फ समझना है उनको। छूना कल।”
उसने नाइटी ऊपर की। चूत पहले से चमक रही थी। मैंने हाथ रखा तो वो मेरे कान में बोली, “बोलो। जोर से नहीं, साफ-साफ। कि मम्मी की गांड कैसी लगती है साड़ी में। कि उनके बूब्स देखकर लंड खड़ा होता है। बोलो।”
मैं चुप रहा। फिर लंड उनके अंदर जाते समय मुँह से निकल गया, “मम्मी जब साड़ी पहनकर किचन में चलती हैं ना प्रिया… उनकी गांड ऐसे हिलती है कि दिमाग खराब हो जाता है।”
प्रिया मुस्कुराई। “और?”
“और नहाते वक्त दरवाजा अधखुला रखती हैं जैसे पता हो कोई देख सकता है।”
“आह्ह्ह… ऐसे ही बोलो…” उसने कमर उठाई। मेरा लंड अंदर तक चला गया। उसकी चूत गरम थी, रात से पहचानी हुई। मैंने धक्के धीमे रखे, लेकिन आवाज पूरी तरह दब न सकी। बिस्तर हल्का सा बोला। प्रिया ने जानबूझकर एक कराह निकाली।
“भैया… मम्मी जैसी चूत चाहिए तुझे ना… तो पहले मेरी फाड़…”
गलियारे में कदमों की आवाज आई। बहुत हल्की। हम दोनों थम गए। लंड अंदर ही था। कदम rubarub आए और दरवाजे के बाहर रुक गए। एक साँस सुनाई दी। कपड़े की हल्की रगड़। कोई खड़ा था। एक मिनट से ज्यादा।
प्रिया ने मेरे कंधे में नाखून गाड़ लिए, लेकिन आवाज नहीं निकाली। फिर कदम लौटे। धीरे-धीरे। मम्मी के कमरे का दरवाजा बंद होने की आवाज आई — जोर से नहीं, जैसे कोई सोच-समझकर बंद कर रहा हो।
प्रिया मेरे कान में हँसी, साँस फूलती हुई।
“अब वो माँ नहीं रही भैया। अब वो औरत है जो खड़ी होकर सुन गई और चिल्लाई नहीं। चिल्लाना था तो दस सेकंड में चिल्लातीं। वो गईं सोचने। सोचने वाली औरत राजी होती है, बस समय मांगती है।”
मैं उसके अंदर ही झड़ गया। गुस्सा, डर और कामावेश एक साथ निकला। प्रिया मेरे ऊपर लेटी रही और बालों में उंगलियाँ फेरती हुई बोली, “कल आखिरी धक्का है।
मैं मम्मी से सीधा पूछूँगी कि दरवाजे के बाहर क्या कर रही थीं। तुम तैयार रहना। अगर वो जवाब दें… तो फिर यह घर पहले जैसा नहीं बचेगा।”
मैं छत की तरफ देखता रहा। माँ की साँस दरवाजे के बाहर अभी भी कानों में घूम रही थी। नींद नहीं आई। सिर्फ एक ख्याल बार-बार आता रहा - उन्होंने सुना, समझा, और लौट गईं। लौटना भी एक जवाब होता है।
अगला भाग - जल्द ही = "बहन ने बनाया मदारचोद! 02"
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