माँ ने बेटे का लंड बनाया मोटा! भाग - 01
Family Sex Story : गांव की प्यासी विधवा माँ प्रिया ने 18 साल के बेटे का लंड चूस बनाया मोटा! पिलाया दूध! फिर खेत के छप्पर में चूत फड़वाकर बेटे का बीज लिया अंदर!
जब मैं 18 साल का हुआ, पिताजी के जाने के बाद घर की जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधों पर आ गई। गांव की जिंदगी कठिन थी। सुबह चार बजे उठना, भैंसों को दुहना, खेत में काम, फिर अंजलि को पढ़ाना।
मां प्रिया हर काम में मेरे साथ थी। 32 साल की उम्र में भी उसकी आंखों में वो थकान थी जो विधवा होने के बाद आ जाती है, लेकिन उसकी मुस्कान अभी भी गर्म थी।
शुरू के महीनों में मैं उसे सिर्फ मां के रूप में देखता था। लेकिन धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातें नजर आने लगीं। जैसे सुबह दूध दुहते वक्त उसकी साड़ी का पल्लू सरक जाना, या गर्मी में ब्लाउज से पसीना टपकते हुए उसकी गर्दन की नमी।
मैं खुद को समझाता – “ये मेरी मां है, राहुल। गलत मत सोच।” लेकिन रात को अकेले लेटे-लेटे उसका ख्याल आ जाता और लंड अनजाने में खड़ा हो जाता।
मां भी बदल रही थी। पहले वो मुझे “बच्चा” कहकर पुकारती थी, अब “राहुल बेटा” कहते वक्त उसकी आवाज में कुछ नरमापन आ गया था। कभी-कभी काम करते वक्त हमारी आंखें मिल जातीं। वो शरमा जाती, लेकिन नजर हटाने में देर करती।
एक महीना बीता। गर्मी बढ़ गई थी। एक दोपहर खेत में काम करते-करते मां थक गई। “राहुल, चल थोड़ी देर छप्पर में बैठते हैं।” हम दोनों वहां गए। मैं जमीन पर बैठ गया।
मां मेरे पास बैठी। उसकी सांसें भारी थीं। उसने पानी पिया और थोड़ा सा मेरी तरफ बढ़ाया।
“पिएगा?” उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों को छू गईं। एक झनझनाहट हुई। मैंने हां में सिर हिलाया।
उस दिन सिर्फ बातें हुईं। घर की, भविष्य की, मेरी पढ़ाई छूटने की। मां ने कहा, “तुमने इतना बोझ उठा लिया बेटा… मां को बहुत गर्व है, लेकिन डर भी लगता है कि तुम्हारी जवानी खराब न हो जाए।”
उसकी आंखों में ममता और कुछ और था – शायद अकेलापन।
अगले कई दिन इसी तरह गुजरे। हल्के स्पर्श बढ़ने लगे। कभी वो मेरी पीठ पर हाथ फेरती, “पसीना पोछ लूं?” कभी मैं उसके बालों में फंसी घास निकालता। हर स्पर्श थोड़ा लंबा होता जा रहा था।
फिर एक दिन, दोपहर का समय। हम छप्पर में थे। गर्मी से हालत खराब थी। मां ने कहा, “राहुल, तू थक गया लगता है। सर रख मेरी गोद में।” मैंने हिचकिचाते हुए अपना सिर उसके गोद में रख दिया।
उसकी साड़ी की महक, उसके पेट की नरमी… दिल जोरों से धड़क रहा था।
मां मेरे बालों में उंगलियां फिराने लगी।
“बचपन में ऐसे ही सोता था तू। अब बड़ा हो गया है… लेकिन मां के लिए अभी भी बच्चा है।” उसकी आवाज में नमी थी। मैंने ऊपर देखा। उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन होंठ हल्के से खुले हुए थे।
मेरा हाथ अनजाने में उसके कमर पर चला गया। हल्का स्पर्श। मां सिहर गई, लेकिन हटाई नहीं। “राहुल…” सिर्फ नाम लिया उसने, कोई डांट नहीं।
उस दिन बस इतना ही। लेकिन रात को दोनों को नींद नहीं आई।
धीरे-धीरे ये सिलसिला बढ़ा। रसोई में खाना बनाते वक्त पीछे से मैं उसके पास खड़ा हो जाता। वो मुड़कर मुस्कुराती, “क्या चाहिए बेटा?” मैं कुछ न कहता, बस पास खड़ा रहता। उसकी सांसों की गर्मी महसूस होती।
एक शाम बालकनी (छत) पर दोनों बैठे थे। अंजलि सो चुकी थी। मां ने कहा, “राहुल, आजकल तू मुझे अलग तरह से देखता है। मां समझती है बेटा। अकेलापन दोनों को सता रहा है।”
मैं चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “मां… आप बहुत सुंदर हो।”
उसने शरमाकर मेरी तरफ देखा। “ये मत बोल… पाप लगेगा।” लेकिन उसकी आंखों में इनकार नहीं था, बल्कि एक मुलायम स्वीकृति थी।
उस रात पहली बार हल्का किस हुआ। सिर्फ गाल पर। लेकिन वो किस इतना लंबा था कि दोनों की सांसें उखड़ गईं। मां ने मुझे दूर धकेला, “बस… आज के लिए काफी है।”
अगले दिन फिर दूध दुहने के बाद छप्पर में। मां ने मुझे गोद में बिठाया। “भूख लगी होगी ना?” उसकी आवाज कांप रही थी।
मैंने हां कहा। उसने बहुत धीरे-धीरे ब्लाउज का पहला हुक खोला। फिर दूसरा। भारी, दूध भरे स्तन आधे दिख गए। “आ… लेकिन धीरे से।”
मैंने सिर झुकाया। निप्पल मुंह में लिया। गर्म दूध निकला। मां की सांस तेज हुई – “आह… राहुल… धीरे बेटा… मां को अच्छा लग रहा है, लेकिन… ये गलत है ना?”
मैंने स्तन को हल्का दबाया। मां कराह उठी, “उफ्फ… हां… और दबा… लेकिन प्यार से।”
उस दिन भी पूरा नहीं हुआ। सिर्फ स्तन चूसना, हल्की मालिश, और guilt भरे emotional बातें। मां बार-बार कह रही थी, “मां तुझे प्यार करती है… लेकिन समाज, परिवार… हम धीरे चलेंगे बेटा।”
रोज की दिनचर्या के साथ ये सिलसिला चलता रहा – सुबह काम, दोपहर छप्पर में हल्का स्पर्श, शाम छत पर बातें और किस, रात को guilt और चाहत का मिश्रण।
उसके बाद के दिन और भी खतरनाक होते गए, लेकिन हम दोनों ने खुद को रोका रखा। सुबह का रूटीन वही था – भैंस दुहना, खेत में काम, अंजलि को स्कूल भेजना। लेकिन अब हर छोटी चीज में एक नई गर्मी घुल गई थी।
मां जब भी मेरे पास से गुजरती, उसका शरीर मेरे शरीर को हल्का-सा छू जाता। कभी जानबूझकर, कभी अनजाने में। मैं महसूस करता कि उसकी सांसें उस पल थोड़ी तेज हो जाती हैं।
एक सुबह दूध दुहते वक्त मां ने मुझे पास बुलाया। “राहुल, ये वाली भैंस आज थोड़ी परेशान है। तू पकड़ इसे।” मैंने भैंस को पकड़ा। मां झुकी हुई थी। उसकी साड़ी का पल्लू सरक गया। भारी स्तन ब्लाउज के अंदर हिल रहे थे।
पसीने से भीगी गर्दन, खुली हुई आंखें। मैं घूरता रह गया। मां ने ऊपर देखा और मुस्कुराई, लेकिन इस बार मुस्कान में शरम के साथ एक चिंगारी थी। “क्या देख रहा है बेटा?” उसने धीरे से पूछा।
“कुछ नहीं मां…” मैंने नजर झुका ली, लेकिन मेरा लंड पहले ही सख्त हो चुका था।
दोपहर में छप्पर के अंदर हम फिर अकेले थे। गर्मी इतनी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। मां ने कहा, “आज तू बहुत थका लग रहा है। आ, मेरी गोद में सर रख।” मैं लेट गया।
उसकी जांघों की नरमी मेरे गाल को छू रही थी। मां मेरे बालों में उंगलियां फिराती रही। काफी देर तक चुप्पी रही। फिर उसने धीरे से कहा,
“राहुल… पिछले कुछ दिनों से मां को भी अजीब सा लग रहा है। तू अब बच्चा नहीं रहा। मर्द बन गया है। मां अकेली है… तेरे पिताजी गए दो साल हो गए। कभी-कभी रात में नींद नहीं आती।” उसकी आवाज कांप रही थी।
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। “मां, मुझे भी आपकी कमी खलती है। आप इतनी मेहनत करती हो… मैं कुछ नहीं कर पाता।”
मां ने मेरे हाथ को अपने होंठों से छुआ। हल्का-सा किस। “तू मेरे लिए सब कुछ है बेटा। लेकिन ये जो हो रहा है ना… ये पाप है। फिर भी… मां खुद को रोक नहीं पा रही।”
उस दिन पहली बार उसने मुझे अपने ब्लाउज के ऊपर से स्तनों को छूने दिया। मैंने हल्के हाथ से दबाया। मां की सांसें भारी हो गईं।
“आह… धीरे राहुल… बहुत दिनों बाद किसी ने छुआ है…” वो कराह रही थी, लेकिन अभी भी पूरा ब्लाउज नहीं खोला था।
शाम को घर लौटते वक्त रास्ते में वो मेरे कंधे से लगकर चल रही थी। “अंजलि को कुछ पता नहीं चलना चाहिए। वो अभी छोटी है।” हम दोनों ने वादा किया कि जो भी हो, बहुत धीरे-धीरे होगा।
रात को छत पर दोनों बैठे थे। चांदनी रात थी। मां ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरका लिया। हवा में उसकी देह की खुशबू आ रही थी। मैं उसके पास सरक गया। हमारी जांघें छू रही थीं।
मैंने हिम्मत करके उसका हाथ पकड़ा और अपनी गोद में रख लिया। फिर धीरे से उसके होंठों पर किस किया। पहली बार असली किस।
मां ने पहले तो हिचकिचाया, लेकिन फिर आंखें बंद करके जवाब दिया। उसके होंठ नरम, गर्म और थोड़े नम थे। किस लंबा होता गया। उसकी जीभ मेरी जीभ से मिली। “म्मह… राहुल…” वो हल्के से कराह उठी।
किस के बाद हम दोनों शर्म से भर गए। मां ने मुझे गले लगा लिया। “बेटा, मां डर रही है। अगर कोई देख लिया तो… लेकिन तुझे छोड़ भी नहीं सकती।” उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन शरीर मेरे शरीर से चिपका हुआ था।
अगले कुछ दिन इसी emotional और physical tension में बीते। रसोई में खाना बनाते वक्त मैं पीछे से आकर उसकी कमर पकड़ लेता। मां “छोड़ बेटा, अंजलि आ जाएगी” कहती, लेकिन खुद मेरी उंगलियों को हटाती नहीं।
कभी-कभी मैं उसके कान में फुसफुसाता, “मां, आप बहुत सुंदर हो।” वो शरमाकर “चुप पागल” कह देती।
एक और दोपहर छप्पर में। गर्मी चरम पर थी। मां ने कहा, “आज नहा लेते हैं साथ में। शरीर ठंडा हो जाएगा।” हम दोनों कुएं के पास गए। मां ने साड़ी को शरीर पर लपेट रखा था।
पानी डालते वक्त साड़ी पूरी भीग गई। उसके स्तन, कमर, जांघें… सब कुछ नजर आ रहा था। मैं नंगा हो गया। मेरा लंड पहले से ही आधा खड़ा था।
मां ने मुझे नहलाया। उसके हाथ मेरी छाती पर, पीठ पर, फिर धीरे-धीरे पेट पर। आखिरकार उसने मेरे लंड को हाथ में ले लिया।
“हे भगवान… इतना सख्त हो गया है मेरा बेटा…” उसने धीरे-धीरे मालिश शुरू की। मैं कराह उठा, “मां… आह… बहुत अच्छा लग रहा है…”
मां की सांसें भी तेज थीं। “राहुल… मां को भी छू… लेकिन ऊपर ही।” मैंने उसके ब्लाउज के अंदर हाथ डाला। भारी, गर्म स्तन। निप्पल सख्त हो चुके थे। मैंने उन्हें मसलना शुरू किया। मां “उफ्फ… हां बेटा… यही… धीरे से…” कराह रही थी।
उस दिन हम दोनों ने एक-दूसरे को हाथों से राहत दी। मां ने मुझे झड़ने तक मालिश की और मेरा सारा रस अपने हाथ पर लिया। फिर खुद को छूकर झड़ी। लेकिन अभी भी पूरा सेक्स नहीं हुआ।
बाद में aftercare में वो मुझे गोद में लेकर बैठी रही। “हम धीरे चल रहे हैं ना बेटा? मां तुझे कभी दुख नहीं पहुंचाना चाहती।”
उस नहाने वाले दिन के बाद दोनों के अंदर का बांध टूटने वाला था। अगले दो दिन हमने खुद को रोका, लेकिन tension चरम पर थी। काम करते वक्त भी नजरें मिलते ही शरीर गर्म हो जाता।
तीसरे दिन दोपहर में खेत का काम खत्म करके हम छप्पर में आए। मां ने दरवाजा बंद किया और मेरी तरफ मुड़ी। उसकी आंखों में शर्म, guilt, और भूख तीनों थे।
“राहुल… आज मां खुद को रोक नहीं पाएगी। तू मेरा बेटा है, लेकिन आज मुझे औरत की तरह चाह।” उसकी आवाज कांपी।
मैंने उसे दीवार से लगा दिया और जोर से किस किया। इस बार कोई हिचकिचाहट नहीं। हमारी जीभें एक-दूसरे को चाट रही थीं।
मां “म्म्ह… राहुल… आह…” कराह रही थी। मैंने उसका ब्लाउज फाड़ते हुए खोला। दो भारी स्तन बाहर आ गए। मैंने एक को मुंह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा।
“आआह… हां बेटा… जोर से चूस… मां का दूध पी ले… उफ्फ्… काट भी ले…” मां मेरे बाल खींच रही थी।
मैंने दूसरा स्तन मसलते हुए उसकी साड़ी का नाड़ा खोल दिया। पेटीकोट नीचे सरक गया। मां की चूत पर हल्के बाल थे, पहले से गीली हो चुकी थी। मैंने उंगली डाली। “मां… आपकी चूत तो पूरी तर हो गई है…”
“हां बेटा… तेरे लिए तरस रही थी… आह… अंदर डाल उंगली…” वो कमर हिला रही थी।
मैंने उसे जमीन पर लिटाया। उसकी टांगें फैला दीं और चूत चाटने लगा। मां पागल हो गई।
“राहुल… आआह… हां… चाट मेरी चूत… अपनी मां की चूत चाट… उफ्फ्… जीभ अंदर डाल…” उसकी उंगलियां मेरे सिर पर जोर से दबा रही थीं। उसका स्वाद मीठा-खारा था। वो पहली बार झड़ गई – “मैं आ गई… बेटा… आह… आ गई!!”
अब मेरा लंड पत्थर हो चुका था। मां ने उसे पकड़ा और मुंह में ले लिया। “इतना मोटा… मेरा बेटा का लंड…” वो गहरी गला लगाकर चूस रही थी। “ग्लक… ग्लक…” की आवाजें छप्पर में गूंज रही थीं।
“मां… अब सह नहीं सकता…” मैंने उसे चित लिटाया। लंड उसकी चूत पर रखा।
मां ने मेरी आंखों में देखा, “डाल दे बेटा… फाड़ दे अपनी मां की चूत… जिसमें तू निकला था… आज पूरा डाल दे…”
मैंने एक जोरदार धक्का मारा। आधा लंड अंदर चला गया। मां चीख उठी, “आआह… धीरे… बड़ा है तेरा…” लेकिन फिर खुद कमर उठाकर बाकी लंड अंदर ले लिया। “हां… पूरा… आ गया… चोद अपनी मां को राहुल…”
मैं तेजी से धक्के मारने लगा। छप्पर में चुदाई की चट-चट आवाजें भर गईं। मां दोनों टांगें मेरी कमर पर लपेटे हुए थी। “जोर से… हां… फाड़ दे… तेरी मां की चूत तुझे ही चाहिए थी ना… आह… आह… और जोर से…”
मैं उसके स्तनों को दबाते हुए चोद रहा था। “मां… आपकी चूत बहुत टाइट है… मैं झड़ने वाला हूं…”
“अंदर डाल दे बेटा… creampie कर अपनी मां को… pregnancy risk ले… मां तैयार है…” उसकी आंखें बंद थीं, मुंह खुला, लार टपक रही थी।
मैं और तेज हुआ। 20 मिनट तक wild चुदाई चली। मां तीन बार झड़ चुकी थी। आखिरकार मैं भी झड़ा – पूरा गर्म वीर्य उसकी चूत के अंदर। “मां… ले… मेरा सारा पानी…”
मां ने मुझे कसकर जकड़ लिया। “हां बेटा… भर दी मां की चूत… अच्छा लग रहा है…”
हम काफी देर तक लिपटे रहे। aftercare में मां मेरे बाल सहलाती रही। “पाप किया हमने… लेकिन मजा भी आया बहुत। तू मेरा सब कुछ है राहुल।” उसकी चूत से मेरा वीर्य निकल रहा था, लेकिन वो मुस्कुरा रही थी।
शाम को घर लौटे। रसोई में फिर हल्का touch। रात को छत पर वो मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी। “कल फिर करेंगे… लेकिन धीरे। अंजलि और दादी का ध्यान रखना पड़ेगा।”
इसके बाद हमारी दिनचर्या में wild sex regular हो गया – कभी खेत के छप्पर में, कभी रसोई में झुकाकर, कभी छत पर चांदनी में। हर बार guilt रहता, लेकिन lust उससे ज्यादा मजबूत था। मां अब पूरी तरह मेरी हो चुकी थी।
अगला भाग :- jald hi- "दादी ने माँ के बाद बेटे का मोटा लंड चूसा! भाग - 02"
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