माँ की चुदाई की चाहत! 02
Family Sex : बेटे ने पोर्न देखती माँ की खोली वासना! सहेली ने याद दिलाया बेटे का लंड! माँ ने जानबूझकर रात को दरवाजा छोड़ दिया खुला! फिर शुरू हुई Antarvasna Sex!
अभी तक आपने "माँ की चुदाई की चाहत!" में पढ़ा :-
मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। मेरा लंड पूरा तना हुआ था। मैंने उस रात पहली बार अपनी सगी माँ के बारे में सोचकर मुठ मारी। माँ की नंगी चूत, उनके बड़े-बड़े स्तन और उनकी कराहें मेरे दिमाग में घूम रही थीं।
“आह… उह…” उनकी आवाजें मेरे कानों में गूँज रही थीं। उस रात मैंने ठान लिया कि मैं अपनी माँ की चुदाई करके रहूँगा। लेकिन इसके लिए मुझे एक पक्का प्लान बनाना होगा।
मैं पूरी रात यही सोचता रहा कि कैसे अपनी माँ को चोदने का मौका मिलेगा!
अब आगे :-
सुबह आँख खुली तो कमरे में वही गेम की स्क्रीन बंद पड़ी थी। लेकिन दिमाग में गेम नहीं घूम रहा था।
माँ नंगी बिस्तर पर, लैपटॉप की रोशनी उनके गोरे स्तनों पर, उंगलियाँ चूत में, और फोन पर सविता आंटी की हँसी - “तेरे बेटे को ही देख ले, जब भी वो मुझे देखता है उसका लंड खड़ा हो जाता है।”
मैंने पजामा नीचे किया। लंड रात से तना हुआ था। माँ की कराह याद करके हाथ चलाया, लेकिन मुठ पूरी नहीं की। ठान ली थी - अब हाथ से नहीं, उनसे लेना है। उसके लिए प्लान चाहिए था, भूख नहीं।
प्लान तीन बातों पर टिका।
पहला - माँ को यह याद दिलाना कि सुबह उन्होंने मुझे गुनाहगार बनाया, रात खुद वही कर रही थीं।
दूसरा - सविता आंटी को पास रखना, वो पहले से दरवाजा खोल चुकी हैं।
तीसरा - पापा हफ्ते भर बाद आएँगे, समय है। जल्दबाजी की तो माँ फिर से सख्त हो जाएँगी और खाल उधेड़ने वाली बात सच कर देंगी।
नाश्ते पर माँ सामान्य थीं। पराठा लगाया, दही निकाला, जैसे कल कुछ हुआ ही न हो। मैंने जानबूझकर तौलिया कमर पर बाँधे निकला। छाती खुली। माँ की निगाह एक पल पेट पर रुकी, फिर उन्होंने मुँह फेर लिया।
“कपड़े पहनकर आया कर। घर में तौलिया लपेटे नहीं घूमा करते।”
“माँ, गर्मी है। पापा भी तो ऐसे ही रहते हैं जब घर पर होते हैं।”
उन्होंने चाय का कप मेरे हाथ में थमाया। उंगलियाँ एक सेकंड ज्यादा लगीं। “पापा और तुम एक जैसे नहीं हो। तू मेरा बेटा है। समझ गया ना?”
“समझ गया।” मैंने कहा, लेकिन आँखें उनकी नाइटी के गले पर थीं। बिना ब्रा के स्तन कपड़े में भारी लग रहे थे। कल रात मैंने उन्हें नंगा देखा था। अब ढके हुए और खतरनाक लग रहे थे।
दोपहर तक माँ मेरे पीछे पड़ी रहीं — कमरा साफ कर, कपड़े रख, गेम कम खेल। सख्ती बढ़ गई थी। मुझे लगा वो खुद से डर रही हैं। जिसने बेटे को मुठ पर पकड़ा, उसने रात को खुद उंगली की। गुनाह छुपाने वाली माँ ज्यादा डाँटती है।
शाम को डोरबेल बजी। माँ किचन से निकलीं, बाल खुले, माथे पर पसीना। “जा देख कौन है।”
गेट खोला तो सविता आंटी खड़ी थीं। पीली साड़ी, टाइट ब्लाउज, पल्लू बार-बार गिर रहा था। 46 की माँ से उम्र में छोटी नहीं, लेकिन जिस्म वैसा ही — भरे स्तन, पतली कमर, साड़ी में हिलती गांड। उन्होंने मुझे देखते ही गाल पर हाथ फेरा।
“अरे आरव? और लंबे हो गए हो। तू तो अब लड़का नहीं रहा बेटा, जवान आदमी लग रहा है।”
उनकी हथेली गाल से गर्दन तक फिसली। इत्र की गंध आई। लंड तौलिया के नीचे तन गया। उन्होंने देखा — निगाह एक पल नीचे गई, मुस्कुराईं, कुछ नहीं बोला।
माँ पीछे से आईं और दोनों गले मिल गईं। स्तन एक-दूसरे से दबे। मैं खड़ा देखता रहा। माँ ने कहा, “अंदर आ। आरव, पानी ले आ।”
रसोई में गिलास भरते समय मुझे उनकी बात का टुकड़ा सुनाई दिया। सविता आंटी बोल रही थीं, “पेनड्राइव लाई हूँ। कल वाला खत्म कर दिया ना तूने? इसमें वाला देखकर तू सो नहीं पाएगी।”
माँ ने आवाज दबाई, “चुप रह। आरव घर में है।”
“इसीलिए तो कह रही हूँ। घर में है तो क्या हुआ? वो भी तो…” बाकी दब गया।
मैं पानी लेकर गया। सविता आंटी सोफे पर ऐसी बैठी थीं कि साड़ी घुटनों से ऊपर खिसक गई थी। मोटी गोरी जांघें। माँ उनके पास थीं, चेहरा थोड़ा लाल। मैंने गिलास रखा तो सविता आंटी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“बैठ ना साथ में। माँ-बेटे की जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है आजकल। अजय तो रहता ही नहीं घर पर।”
माँ ने सख्ती से कहा, “सविता, बकवास कम कर। आरव जा अपने कमरे में। हम दोनों की बात है।”
“जाने दूँ? इतना बड़ा हो गया है, अभी भी भगाती हो कमरे में?” सविता आंटी हँसीं। “चल ठीक है। जा बेटा, बड़े हो गए हो तो समझदार भी बनो। माँ को अकेला मत छोड़ना ज्यादा।”
मैं कमरे में आया, दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। अंदर से हल्की हँसी आ रही थी, फिर माँ की दबी आवाज — “तू मेरे बेटे के सामने ऐसे बातें करती है तो मुझे गुस्सा आता है।”
“गुस्सा आता है या शर्म? फर्क बता।” सविता आंटी की आवाज साफ थी। “कल रात तूने फोन पर खुद कहा था चूत में खुजली है। आज सती-सावित्री बन रही है।”
“बस कर।”
“नहीं करूँगी। तूने उसे मुठ मारते पकड़ा और खाल उधेड़ने की धमकी दी। रात तू खुद वही कर रही थी। झूठ का बोझ भारी पड़ता है श्रेया।”
माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर बहुत धीमे बोलीं, “वो बच्चा है।”
“बीस साल का बच्चा नहीं होता। और तूने देखा है ना जब वो तुझे देखता है। मैंने तो देखा है जब वो मुझे देखता है। लंड खड़ा हो जाता है। तू अंधी नहीं है।”
मेरा कान दरवाजे से लगा था। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि लगा माँ सुन लेंगी। सविता आंटी ने आगे कहा, “मैं इंतजाम कर दूँ किसी का, तू माने नहीं रही। घर का लंड पड़ा है तो उस पर गुस्सा क्यों?”
“सविता, एक और शब्द बोला ना बेटे के बारे में तो दोस्ती खत्म।” माँ की आवाज काँपी, सख्त होते-होते टूट गई।
सविता आंटी हँसीं। “दोस्ती खत्म नहीं होगी। प्यास खत्म होगी जब तू कबूल करेगी। चल, पेनड्राइव रखे देती हूँ तकिए के नीचे। रात को देखना। अकेली मत देखना… डर लगता हो तो।”
थोड़ी देर बाद आंटी निकलने लगीं। गेट पर उन्होंने मुझे फिर से देखा। इस बार पास आईं, फुसफुसाया ताकि माँ किचन में न सुने।
“कल रात जो तूने सोचा, वो गलत नहीं है। तेरी माँ गुस्से में नहीं, डर में है। डर को समय दो। और हाँ - दरवाजा बंद रखना सीख ले अगली बार। आज मैंने देखा तू सुन रहा था।”
मेरा चेहरा सुन्न पड़ गया। उन्होंने गाल पर एक और किस किया, होठ कान के पास आए। “लंड संभाल के रखना बेटा। जल्दी निकालोगे तो माँ भाग जाएगी।”
गेट बंद हुआ। माँ ने पूछा, “क्या कहा तुझसे?”
“कुछ नहीं। बस… बड़ा हो गया है, कहा।”
माँ ने मेरी आँखों में देखा। बहुत देर तक। फिर बोलीं, “उसकी बातों में मत आना। सविता की नजरें गंदी हैं। तू मेरा लड़का है। याद रखना।”
रात के खाने पर खामोशी थी। माँ ने दो बार मेरा नाम लिया और बात अधूरी छोड़ दी। सोने से पहले उनके कमरे का दरवाजा हल्का खुला रह गया - जानबूझकर या भूल से, पता नहीं चला।
मैं अपने बिस्तर पर लेटा रहा। पेनड्राइव माँ के तकिए के नीचे थी। सविता आंटी ने बीज बो दिया था। अब दूसरी रात आने वाली थी। और इस बार मैं सिर्फ देखने नहीं जाने वाला था।
बारह बजकर बीस मिनट पर नींद नहीं आ रही थी। घर में सन्नाटा था, बस घड़ी की टिक-टिक। मैं पानी के बहाने उठा। गलियारे में माँ के कमरे से वही हल्की रोशनी आ रही थी जो कल रात आई थी। दरवाजा एक बित्ता खुला था।
अंदर से लैपटॉप की आवाज आ रही थी - कराहें, गीली चप-चप, औरत की आवाज “आह्ह्ह… और अंदर…”
मैंने साँस रोकी और झाँका।
माँ नाइटी कमर तक उठाए बिस्तर पर लेटी थीं। पैंटी एक टांग पर अटकी थी। लैपटॉप तकिए के पास। स्क्रीन पर जवान लड़का किसी औरत को पीछे से चोद रहा था।
माँ की दो उंगलियाँ अपनी चूत में अंदर-बाहर हो रही थीं। गोरे स्तन नाइटी से बाहर निकले थे, निप्पल तने हुए। जांघें काँप रही थीं।
“आह्ह्ह… उह्ह्ह… कितना मोटा है… यहीं… अह्ह्ह…”
कल वाली बात दोहराई जा रही थी। फर्क सिर्फ इतना था कि आज मैं जानता था सविता आंटी ने पेनड्राइव दी है, और माँ ने मुझे सुबह खाल उधेड़ने की धमकी दी थी। गुस्सा और लंड एक साथ उठे। मैंने दरवाजा और धक्का दिया। क्रेक की आवाज आई।
माँ की उंगलियाँ थम गईं। आँखें मेरी तरफ गईं। लैपटॉप की रोशनी में उनका चेहरा पहले सफेद पड़ा, फिर लाल।
“आरव?” आवाज फटी हुई निकली। उन्होंने नाइटी खींचने की कोशिश की, लैपटॉप बंद करने की भी, दोनों में कोई पूरा न हो सका। चूत अभी भी खुली थी, उंगलियाँ चमक रही थीं।
“तू यहाँ क्या कर रहा है? बाहर जा! अभी जा!”
मैं अंदर घुस गया और दरवाजा बंद कर दिया। इस बार कुंडी भी लगाई।
“माँ, कल सुबह आपने मुझसे कहा था यह सब मेरी उम्र के लायक नहीं। आज रात आप खुद वही कर रही हैं।”
“मैं तेरी माँ हूँ। तुझे हक नहीं पूछने का।” उन्होंने कंबल खींचा, लेकिन कंबल उनकी जांघों तक ही आया। एक स्तन बाहर ही रह गया।
“निकल यहाँ से। पागल हो गया है क्या?”
“मैंने कल रात भी देखा था।” बात निकलते ही कमरे की हवा रुक गई। माँ की आँखें फटी रह गईं।
आप पोर्न देख रही थीं। सविता आंटी का फोन आया था।
"आपने कहा था जब पापा ट्रिप पर रहते हैं तो चूत में खुजली होती है। और आंटी ने कहा था जवान लड़के आपकी जैसी औरतों पर मरते हैं। मेरे लंड की भी बात हुई थी।”
“तू… तू सुन रहा था?” माँ की आवाज अब गुस्से से ज्यादा डरी हुई थी। “नीच लड़का। अपनी माँ की… अपनी माँ को ऐसे…”
“आपने मुझे नीच बनाया जब मुठ पर पकड़ा। खुद वही करके मुझे गुनाहगार ठहराया।”
मैं बिस्तर से तीन कदम दूर खड़ा रहा। पास नहीं गया।
“मैं पूछ रहा हूँ माँ - जो मैं कर रहा था वो गलत था, तो आप जो कर रही हैं वो सही कैसे है?”
वो चुप हो गईं। लैपटॉप की स्क्रीन अभी भी मंद रोशनी दे रही थी। उनकी साँसें तेज चल रही थीं। नाइटी गीली थी जांघों के बीच। उन्होंने चेहरा हाथों में छुपा लिया।
“तू समझ नहीं सकता। मैं औरत हूँ। तेरे पिता महीनों बाहर रहते हैं। शरीर की… भूख रह जाती है। यह पाप है, मैं जानती हूँ। लेकिन मैं किसी गैर मर्द के पास नहीं गई। सिर्फ… सिर्फ खुद से…”
“उंगली से।” मैंने कहा। “और जवान लड़के वाली पोर्न से।
सविता आंटी पूछ रही थीं कि बेटे से चुदवाने का प्लान तो नहीं। आप नाराज हुईं। नाराज इसलिए हुईं क्योंकि बात गलत थी… या इसलिए कि बात आपके मन में आ चुकी थी?”
“आरव!” उन्होंने तकिया फेंका। आवाज गली तक जा सकती थी, लेकिन गली सो रही थी।
“मुँह से ऐसी बात मत निकाल। मैं तेरी माँ हूँ। मैंने तुझे जनम दिया है। तू मेरे पेट से आया है। और तू खड़ा होकर मेरी चूत की बात कर रहा है?”
लंड पजामे में इतना तन चुका था कि छुप नहीं रहा था। माँ की निगाह एक पल वहाँ गई। उन्होंने मुँह फेरा, गला साफ किया।
“जा अपने कमरे में। यह रात यहाँ दब जाए। कल सुबह मैं तेरी माँ रहूँगी, तू मेरा बेटा। बाकी कुछ नहीं।”
मैं एक कदम और करीब गया।
“दब नहीं पाएगी माँ। मैंने आपको नंगा देखा है। आपकी कराह सुनी है। आपकी उंगली आपकी चूत में देखी है। अब मैं दस साल का बच्चा बनकर नहीं सो सकता।”
माँ की आँखें भर आईं। “तो क्या करना चाहता है तू? अपनी माँ को नीचा दिखाना है? बदला लेना है सुबह वाली बात का?”
“बदला नहीं।” मेरी आवाज खुद मेरे गले में अटकी।
“मैं आपको चाहता हूँ। कल रात पहली बार आपके बारे में सोचकर हाथ लगाया। आपकी गांड, आपके स्तन, वो आवाज - आह्ह्ह उह्ह्ह - कान में घूम रही थी।"
मैं पाप कर रहा हूँ यह मैं जानता हूँ। लेकिन आप भी कर रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आप छुपा रही हैं।”
वो रोई नहीं, बस साँस भारी हो गई। “सविता ने तेरे दिमाग में जहर भर दिया है। उस औरत की नजरें गंदी हैं। तू उसकी बातों में मत आ।”
“उसने आज कहा था आप डर में हो, गुस्से में नहीं। और दरवाजा बंद रखना सीखूँ। आज आपने दरवाजा खुला छोड़ा।”
माँ ने कंबल और कस लिया। “भूल से खुला होगा।”
“भूल से नहीं खुलता माँ। कल भी खुला था।”
बहुत देर सन्नाटा रहा। लैपटॉप पर पोर्न रुक चुका था, सिर्फ औरत की आखिरी कराह लूप में अटक गई थी -
“आह्ह्ह… अंदर छोड़…” माँ ने झटके से ढक्कन बंद किया। अंधेरा हो गया। सिर्फ गली की रोशनी खिड़की से उनके नंगे कंधे पर पड़ रही थी।
फिर उनकी आवाज बहुत धीमी निकली।
“अगर मैं मान भी लूँ कि शरीर प्यासा है… तो भी तू हल नहीं है आरव। तू मेरा बेटा है। एक बार यह रेखा कटी तो वापस माँ-बेटा नहीं रहेंगे। घर टूट जाएगा। तेरे पिता का चेहरा मैं कैसे देखूँगी?”
“पापा हफ्ते भर बाद आएँगे। यह हफ्ता हमारे पास है।” मैंने हाथ बढ़ाया नहीं।
“मैं आज आपको छूने नहीं आया। आज सिर्फ यह कहने आया हूँ कि मैं जानता हूँ। और मैं रुकने वाला नहीं। आप सोच लो। दरवाजा कल रात भी खुला रह गया तो मैं समझ जाऊँगा।”
माँ ने सिर उठाया। आँखों में गुस्सा, शर्म और कुछ ऐसा था जो माँ वाली आँख में नहीं होना चाहिए। “तू धमकी दे रहा है अपने माँ को?”
“निमंत्रण दे रहा हूँ। लेने का नहीं, सोचने का।”
मैं दरवाजे तक गया। कुंडी खोली। पीछे मुड़कर कहा, “सविता आंटी कल फिर आएंगी शायद। उनकी बात मत काटना माँ। वो वही कह रही हैं जो आपका जिस्म पहले से जानता है।”
माँ ने जवाब नहीं दिया। जब मैं गलियारे में निकला तो उनके कमरे से एक लंबी, दबी सिसकी आई। कराह जैसी। रोने जैसी भी। फर्क उस रात समझ नहीं आया।
अपने बिस्तर पर लेटकर पजामा नीचे किया। लंड हाथ में था, लेकिन इस बार माँ की नंगी चूत की तस्वीर के साथ उनकी वो बात भी थी - “एक बार रेखा कटी तो वापस माँ-बेटा नहीं रहेंगे।”
मैंने मुठ मारी। झड़ते समय दाँत भींचे रखे ताकि आवाज न निकले। माल हाथ पर गिरा तो लगा यह आखिरी बार हाथ से निकला है। अगली बार उनका दरवाजा खुला रहा तो हाथ नहीं, कुछ और जाएगा।
बाहर माँ के कमरे की रोशनी देर तक जलती रही। बंद नहीं हुई।
सुबह किचन में माँ पहले से खड़ी थीं। आँखें सूजी हुईं, बाल बाँधे हुए, नाइटी की जगह साड़ी। जैसे रात को ढकना बाकी रह गया हो तो सुबह कपड़ों से ढक लिया हो। उन्होंने मेरी तरफ देखा और देखा नहीं - दोनों एक साथ।
“दूध पी लो। पराठा ठंडा हो जाएगा।”
मैं टेबल पर बैठा। खामोशी इतनी मोटी थी कि चम्मच की आवाज भी बड़ी लग रही थी। मैंने कहा, “माँ, कल रात वाली बात…”
“कोई बात नहीं हुई।” उन्होंने तवा पलट दिया। आवाज सख्त थी, हाथ काँप रहा था।
“तूने सपना देखा होगा। और अगर कुछ देखा भी हो तो भूल जा। माँ-बेटे के बीच कुछ बातें दफ्न हो जाती हैं। समझ गया तो खाके अपने कमरे में बैठ।”
“सपना नहीं था।”
करछी सिंक में गिर गई। माँ ने पीछे मुड़कर देखा। गला साफ किया।
“आरव, मैं तेरी माँ हूँ। तू मेरी इज्जत रख। पापा को फोन करने से पहले मैं तुझे एक मौका दे रही हूँ - यह बात खत्म। आज से तेरा दरवाजा बंद, मेरा दरवाजा बंद। सविता से भी दूरी रख। उसकी जुबान गंदी है।”
मैंने पराठा तोड़ा। “आपने रोशनी जलाए रखी थी देर तक।”
वो जवाब नहीं दीं। चाय का कप मेरे पास धकेल दिया और अपने कमरे में चली गईं। दिन भर घर में वही सख्ती चली - कपड़े धो, कमरा साफ कर, गेम बंद, फोन कम चला।
लेकिन जब वो झुककर बर्तन माँज रही थीं तो साड़ी की गांड गोल उभर रही थी, और जब वो ऊपर उठतीं तो जानबूझकर मेरी तरफ पीठ करके खड़ी रहतीं। छुपा रही थीं या दिखा रही थीं, फर्क उस दोपहर समझ नहीं आया।
शाम को डोरबेल फिर बजी। सविता आंटी। इस बार हाथ में कोई पेनड्राइव नहीं, सिर्फ एक पेपर बैग - मिठाई का बहाना। माँ ने उन्हें अंदर तो लिया, चेहरा बंद था।
“कल वाली बात का गुस्सा अभी उतरा नहीं?” आंटी ने जूते उतारते हुए कहा।
“तेरी वजह से घर में आग लग गई सविता। चुपचाप बैठ।” माँ ने मुझे आँख दिखाई।
“आरव, बाहर जा। दही खत्म है, ले आ।”
“कल भी दही खत्म था।” मैं नहीं हिला।
“आज नहीं जाऊँगा।”
माँ का चेहरा तन गया। सविता आंटी हँसीं, वो वाली हँसी जो घर के नीचे से आग लगाती है।
“अरे श्रेया, लड़का समझ गया है। अब दही के बहाने मत भगा। बैठ आरव, तेरी माँ की सहेली हूँ, दुश्मन नहीं।”
वो सोफे पर माँ के इतने पास बैठीं कि उनके स्तन माँ के बाजू से छुए। फुसफुसाया, लेकिन इतनी धीमी नहीं कि मैं न सुनूँ।
“रात को क्या हुआ? तूने देखा इसके चेहरे पर? यह लड़का सोकर नहीं उठा।”
“कुछ नहीं हुआ।” माँ की दाँत भींचे थे। “और तू इसके सामने मुँह मत खोल।”
सविता आंटी ने मेरी तरफ देखा। निगाह नीचे गई, पजामे के उभार पर, फिर माँ पर।
“श्रेया, तू झूठ बोल रही है। कमरे में गंध रह जाती है। पोर्न की, शरीर की, डर की। मैं उम्र से जानती हूँ।” उन्होंने माँ की हथेली पकड़ ली।
“तूने इसे डाँटा, खुद उंगली की, फिर पकड़ी गई। अब सती नहीं बन सकती। या तो कबूल कर, या जलती रह।”
माँ ने हाथ छुड़ाया। “यह मेरा बेटा है।”
“यह तेरा बेटा है, इसलिए और खतरनाक है। गैर मर्द होता तो तू साड़ी सँभाल लेती। अपने बच्चे के लंड से तू भाग नहीं सकती घर के अंदर।” आंटी ने बैग मेरी तरफ बढ़ाया।
“मिठाई खा ले बेटा। और माँ का गुस्सा मत ले। गुस्सा भूख का दूसरा नाम है।”
माँ खड़ी हो गईं। “सविता, निकल जा आज। दोस्ती प्यारी है, लेकिन तू मेरे घर को रंडखाना मत बना।”
आंटी उठीं। गेट तक जाते-जाते मेरे कान में कहा, “दरवाजा देखना रात को। अगर खुला रहा तो समझ लेना माँ की जुबान झूठ बोल रही है, चूत सच। जल्दी मत करना। पहले बात, फिर हाथ। लंड सबसे बाद!”
गेट बंद हुआ। माँ किचन में बर्तन पीट रही थीं। आँखें लाल थीं। “उस औरत को फिर घर में मत आने देना। तूने बुलाया था क्या?”
“नहीं।”
“तो उसकी बातें क्यों सुनता है तू? तेरे कान में क्या भर गई वो?”
मैंने साफ कहा, “वही जो आप रात को लैपटॉप पर देखती हैं। जवान लड़का, बड़ी औरत, अंदर तक लंड। फर्क इतना है कि स्क्रीन पर पराया होता है… कमरे में अपना खड़ा होता है।”
माँ ने मेरा गाल थप्पड़ से नहीं, उंगली से पकड़ा। पास खींचा। साँसें मिल गईं। पहली बार उनकी छाती मेरे सीने से लगी, साड़ी के ऊपर से भी गर्मी आ रही थी।
“एक बार और मुँह खोला ना ऐसी बात का… तो पापा को फोन है मेरे पास। तेरी पढ़ाई, तेरा घर, सब छिन सकता है। डरता नहीं तू?”
“डरता हूँ।” मैंने उनके हाथ को अपने गाल पर रहने दिया।
“लेकिन आपकी चूत की कराह से ज्यादा नहीं डरता।”
हाथ छूट गया। माँ पीछे हटीं जैसे करंट लगा हो।
“सो जा। आज की रात मैं ताला लगाऊँगी।”
रात ग्यारह बजे उनके कमरे के सामने से गुजरा। कुंडी लगी थी। दिल बैठा। प्लान टूटता लगा। बारह बजकर दस मिनट पर प्यास के बहाने फिर निकला। इस बार कुंडी खुली थी। दरवाजा एक बित्ता। अंदर अंधेरा। लैपटॉप बंद।
माँ करवट लिए लेटी थीं, नाइटी में, कंबल कमर तक। साँसें सोने जैसी नहीं थीं - जानबूझकर संभाली हुईं।
मैं देहलीज पर खड़ा रहा। अंदर नहीं गया। सिर्फ कहा, बहुत धीमे, “माँ, दरवाजा खुला है।”
कुछ नहीं जवाब आया। फिर अंधेरे में उनकी आवाज टूटकर निकली, जैसे शब्द दाँत के पीछे दबे हों।
“भूल गई होगी। बंद करके सो जा।”
“भूल तीन रात एक साथ नहीं होती।”
सन्नाटा। फिर, “आरव… मैं माँ हूँ। तू अगर अंदर आया तो मैं चीखूँगी।”
“चीख नहीं रही हो अभी।”
और देर तक कोई नहीं बोला। मैं अंदर नहीं गया। सविता आंटी की बात याद थी - पहले बात, फिर हाथ, लंड बाद में।
मैंने सिर्फ इतना कहा, “कल रात मैं सोचने को कहा था। आपने सोच लिया तो दरवाजा खुला छोड़ दिया। अब मैं भी सोच रहा हूँ। जल्दी नहीं करूँगा। लेकिन यह दरवाजा अब दुर्घटना नहीं रहा।”
माँ ने करवट बदली। नाइटी खिसकी। गली की रोशनी में उनकी जांघ की सफेदी दिखी, पैंटी की लेस। उन्होंने कंबल खींचा, पूरी नहीं ढकी।
“जा… अपने कमरे में जा। मेरी माँ वाली इज्जत अभी भी बचाकर रख। बाकी… बाकी सुबह बात करेंगे।”
“सुबह आप फिर सख्त बन जाओगी।”
बहुत पतली आवाज आई। “रात की बात रात में रहनी चाहिए। सुबह मैं पराठा बनाऊँगी। तू बेटा बनकर खाना। इतना कर सकता है?”
मैं पीछे हटा। “कर सकता हूँ। लेकिन रात फिर आएगी माँ।”
अपने कमरे में आकर दरवाजा बंद किया। लंड तना था, हाथ बढ़ा… फिर रोका। कल हाथ से निकाला था। आज नहीं। आज भूख जमा करनी थी।
बाहर माँ के कमरे की कुंडी रात भर खुली रही।
सख्त माँ ने ताला नहीं लगाया।
सविता आंटी का बीज बैठ गया था।
और आरव शर्मा समझ गया था — अगली रात बात खत्म होकर हाथ शुरू होगा।
आगे की कहानी : "बिना कंडोम माँ की कोख में भरा माल!"
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