गर्लफ्रेंड की शादीशुदा सहेली - अफ़सा!
Muslim Sex Story : पढ़ाकू गौरव ने गर्लफ्रेंड की शादीशुदा सहेली अफ़सा को कॉलेज में ललचाया, फिर गाँव में फाड़ दी! उसकी गीली चुत और टाइट गांड! Antarvasna से भरपूर!
दोस्तो, मेरा नाम गौरव है। उम्र उन्नीस साल। कॉलेज के पहले साल में था मैं। नाम तो कॉलेज का था, लेकिन असल में वो एक छोटा-सा प्राइवेट इंस्टिट्यूट था शहर के किनारे। वहाँ लड़के-लड़कियाँ दोनों पढ़ते थे।
मैं बाहर से शांत दिखता था। किताबें खोले बैठा रहता था, नोट्स बनाता था, टीचर की बात ध्यान से सुनता था। लेकिन अंदर से हालत कुछ और थी। 18 साल की उम्र से ही लड़कियों के साथ खेलना शुरू कर दिया था।
हॉस्टल की रातों में, पार्टियों में, कॉलेज के खाली क्लासरूम में… कई लड़कियों को चोद चुका था। कुछ ने खुद मेरे लंड को मुँह में लिया था, कुछ को मैंने दीवार से सटाकर तेज़-तेज़ धक्के मारे थे।
अनुभव था मेरे पास। लेकिन फिर भी लोग मुझे “पढ़ाकू गौरव” ही समझते थे।
रिया से मुलाकात दूसरे सेमेस्टर में हुई। वो मेरे सेक्शन में थी। गोरी, लंबे बाल, हल्की हँसी। हम दोनों एक ही ग्रुप प्रोजेक्ट में पड़ गए। पहले तो सिर्फ पढ़ाई की बातें होती थीं। फिर धीरे-धीरे वो मेरे साथ कैंटीन में बैठने लगी।
एक दिन बारिश में हम दोनों कॉलेज के पीछे वाले बगीचे में फँस गए। छतरी नहीं थी। उसके गीले बाल उसके गालों पर चिपक गए थे। मैंने अपने शर्ट से उसके बाल पोछे।
वो हँसी और बोली, “तुम हमेशा इतने ध्यान देने वाले होते हो क्या?” उसी दिन शाम को हमने हाथ पकड़े। दो हफ्ते बाद वो मेरी गर्लफ्रेंड बन गई।
रिया अच्छी थी। प्यार करती थी। मेरे साथ सिनेमा जाती थी, मेरे हाथ में हाथ डालकर घूमती थी। कभी-कभी मेरे रूम में आती तो दरवाज़ा बंद करके मेरे ऊपर बैठ जाती।
उसके छोटे-छोटे स्तन, मुलायम कमर… मैं उसे धीरे-धीरे चोदता था। वो आहें भरती थी,
“आह गौरव… और अंदर…” लेकिन वो कभी बहुत गंदी बातें नहीं करती थी। साफ-सुथरी सी चुदाई होती थी हमारी।
और फिर अफ़सा आई।
रिया की सबसे अच्छी सहेली। पाँच साल बड़ी। करीब चौबीस की होगी। कॉलेज में वो फाइनल ईयर में थी। पहली बार देखा तो लगा जैसे कोई गलत जगह आ गई हो।
बाकी लड़कियाँ जीन्स-टॉप में थीं, अफ़सा साड़ी पहने खड़ी थी। लेकिन वो साड़ी इतनी टाइट थी कि उसकी कमर की लकीर साफ दिख रही थी। 34-28-36 का बदन। ऊपर से गोल-गोल स्तन, नीचे से चौड़ी कुल्हें।
चेहरा भी ऐसा कि एक बार देखो तो दूसरी बार देखने का मन हो जाए। बड़ी-बड़ी आँखें, पतले होंठ, और गर्दन पर हल्की-सी मोल।
रिया ने मुझे उससे मिलवाया। “ये गौरव, मेरा बॉयफ्रेंड। और ये अफ़सा दीदी।”
अफ़सा ने मुस्कुराकर कहा, “नमस्ते।” उसकी आवाज़ भारी थी, धीमी। आँखें मेरी आँखों में एक पल के लिए अटकीं और फिर हट गईं। लेकिन उस एक पल में मुझे लगा जैसे किसी ने सीने में आग लगा दी हो।
उसके बाद हर दिन अफ़सा दिखने लगी। कभी रिया के साथ कैंटीन में, कभी लाइब्रेरी में, कभी कॉलेज गेट पर। मैं जानबूझकर उस तरफ़ देखने लगा।
वो जब चलती तो उसकी साड़ी के पल्लू में उसकी कमर हिलती थी। कभी-कभी वो जीन्स पहन लेती। तब उसकी गांड की शक्ल साफ दिख जाती। गोल, कसी हुई, और जब वो झुकती तो जीन्स और भी टाइट हो जाती।
एक दिन लाइब्रेरी में अकेला था मैं। अफ़सा अचानक किताबों की अलमारी के पीछे से निकली। हाथ में कोई नॉवेल था। वो मेरे पास आई और बोली, “रिया कहाँ है?”
“क्लास में होगी।”
वो किताब टेबल पर रखकर मेरे सामने बैठ गई। इतनी करीब कि उसकी खुशबू आ रही थी। हल्की सी परफ्यूम और उसके शरीर की अपनी गंध। उसने पूछा, “तुम हमेशा इतने चुप रहते हो। रिया कहती है तुम बहुत पढ़ते हो।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “पढ़ना पड़ता है।”
वो हँसी। उसकी हँसी में एक हल्की सी गहरी आवाज़ थी। फिर उसने अपनी कुर्सी थोड़ी और करीब खींच ली। उसके घुटने मेरे घुटने से छू गए। उसने कोई हरकत नहीं की। बस बैठे रहे। मैंने भी नहीं हटाया।
“तुम्हारे बारे में रिया बहुत बात करती है,” उसने धीरे से कहा। “कहती है तुम अच्छे हो।”
“और तुम क्या सोचती हो?” मैंने पूछा।
वो चुप रही। फिर बोली, “मैं अभी सोच रही हूँ।” उसकी आँखें मेरे होंठों पर चली गईं एक पल के लिए। फिर उसने किताब उठाई और चली गई। लेकिन जाते हुए उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
उस रात मैं सो नहीं पाया। रिया मेरे पास थी। उसने मेरे ऊपर चढ़कर चुदाई करवाई। “आह… गौरव… धीरे…” लेकिन मेरी आँखों के सामने अफ़सा की साड़ी में बँधी कमर घूम रही थी।
मैंने रिया को और ज़ोर से पकड़ा। वो चिल्लाई, “आह्ह्ह… इतना ज़ोर से मत…” लेकिन मैं रुक नहीं पाया।
अगले कुछ हफ्तों में अफ़सा और मैं अक्सर आमने-सामने आने लगे। कभी कॉरिडोर में, कभी बस स्टॉप पर। एक दिन बारिश हो रही थी। हम दोनों एक ही शेड के नीचे खड़े हो गए। रिया क्लास में थी।
अफ़सा की साड़ी भीग चुकी थी। उसका ब्लाउज़ गीला होकर उसके स्तनों से चिपक गया था। निप्पल्स की शक्ल साफ दिख रही थी। मैंने जानबूझकर दूसरी तरफ़ देखा।
वो बोली, “देख रहे हो ना?”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “क्या?”
“मेरा ब्लाउज़।” उसने हँसते हुए कहा। “भीग गया है।”
फिर उसने अपना पल्लू ठीक किया, लेकिन जानबूझकर धीरे-धीरे। उसके स्तन हल्के से ऊपर-नीचे हुए। मेरा लंड जीन्स के अंदर सख्त हो गया।
“तुम शादीशुदा हो?” मैंने अचानक पूछ लिया।
वो चुप हो गई। फिर बोली, “हाँ। पिछले साल हो गई थी। पति गाँव में रहते हैं। मैं यहाँ पढ़ाई खत्म करने आई हूँ।”
“और वो… ठीक हैं?”
वो हँसी। हँसी में एक कड़वाहट थी। “ठीक हैं। बस… दूर हैं।”
उस दिन के बाद अफ़सा ने मुझे और करीब आने दिया। कभी-कभी रिया के सामने भी वो मेरे कंधे पर हाथ रख देती। कभी कैंटीन में मेरी तरफ झुककर बात करती तो उसके स्तन टेबल पर दब जाते।
एक दिन उसने मुझे अकेले में कहा, “तुम रिया को बहुत प्यार करते हो ना?”
“हाँ।”
“अच्छा लगता है देखने में। कोई किसी को इतना चाहे।” उसकी आवाज़ में कुछ छिपा हुआ था।
मैंने हिम्मत करके पूछा, “तुम्हें कोई चाहता है?”
वो मुस्कुराई। “शायद। लेकिन वो बोल नहीं पाता।”
उसकी आँखें मेरी आँखों में घुस गईं। मैं समझ गया वो किसकी बात कर रही है। लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। रिया की वजह से।
एक शाम कॉलेज खत्म होने के बाद अफ़सा अकेली गेट के बाहर खड़ी थी। मैं निकला तो उसने मुझे बुलाया। “गौरव, थोड़ी देर रुकोगे?”
रिया होमवर्क करने घर चली गई थी। मैं रुक गया। अफ़सा ने अपना फोन निकाला और कहा, “रिया का नंबर नहीं लग रहा। तुमसे पूछूँ?”
बात फोन की नहीं थी। वो मेरे करीब आ गई। इतनी करीब कि उसके स्तन मेरे सीने से छू रहे थे। उसने धीरे से कहा, “तुम जानते हो ना… मैं तुम्हें देखती हूँ।”
मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा। “क्या मतलब?”
“जो मतलब होता है।” उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। उसकी उंगलियाँ गरम थीं। “लेकिन तुम रिया के हो। इसलिए मैं कुछ नहीं कहती।”
फिर उसने हाथ हटाया और चली गई। जाते हुए उसकी गांड हिल रही थी। जीन्स में बंद वो गांड… मैंने मुट्ठी भींच ली।
रात भर मुझे नींद नहीं आई। रिया मेरे बगल में सोई हुई थी। उसका हाथ मेरे सीने पर था। लेकिन मेरा लंड अफ़सा की सोच में तना हुआ था। मैंने बाथरूम जाकर हिलाया।
आँखें बंद करके अफ़सा की गीली साड़ी, उसके निप्पल्स, उसकी भारी आवाज़ याद की। जब वीर्य निकला तो मैंने अफ़सा का नाम फुसफुसाया।
अगले दिन से अफ़सा और भी साहसिक हो गई। एक दिन लाइब्रेरी में उसने जानबूझकर मेरे पीछे से गुज़रते हुए अपना हाथ मेरे कूल्हे पर फेर दिया। एक दिन कैंटीन में उसने मेरी प्लेट से खाना चुराया और अपनी उंगली चाटी।
उंगली चाटते हुए उसकी आँखें मुझ पर थीं।
रिया को कुछ पता नहीं चला। वो खुश थी। हम दोनों के साथ घूमने जाती थी। लेकिन जब तीनों साथ होते तो अफ़सा कभी-कभी मेरे पैर को टेबल के नीचे छू देती। एक बार उसने अपने पैर से मेरे लंड को दबाया।
मैंने झटके से देखा। वो मुस्कुरा रही थी और रिया से बात कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मैं पागल होने लगा था। हर रात रिया को चोदते हुए अफ़सा का चेहरा याद आता।
रिया “आह गौरव… और तेज़…” कहती तो मैं और ज़ोर लगाता, लेकिन दिमाग में अफ़सा की आवाज़ गूँजती – “तुम जानते हो ना… मैं तुम्हें देखती हूँ।”
कॉलेज का आखिरी महीना आ गया। अफ़सा की पढ़ाई खत्म होने वाली थी। एक दिन उसने मुझे कॉलेज के पीछे वाले बगीचे में बुलाया। शाम हो रही थी। कोई नहीं था।
वो बेंच पर बैठी थी। साड़ी पहने। मैं पास गया। उसने जगह दी।
“मैं जा रही हूँ गौरव,” उसने कहा। “गाँव वापस।”
“पति के पास?”
“हाँ।” उसकी आवाज़ भारी थी। “लेकिन… मुझे नहीं जाना।”
मैं चुप रहा।
वो मेरे करीब आई। उसका चेहरा मेरे चेहरे के इतने पास था कि उसकी साँस मेरे होंठों पर पड़ रही थी। “अगर रिया न होती… तो?”
मैंने जवाब नहीं दिया। बस देखा।
उसने अपना हाथ मेरे गाल पर रखा। “बोलो गौरव।”
मैंने उसके हाथ को पकड़ लिया। “अफ़सा… मैं…”
उसी वक्त दूर से रिया की आवाज़ आई, “गौरव! कहाँ हो?”
अफ़सा ने तुरंत हाथ हटाया। खड़ी हो गई। “जा रही हूँ।”
और वो चली गई। बिना एक बार भी पीछे देखे।
मैं वहीं बैठा रहा। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। लंड पूरी तरह खड़ा था। और मन में सिर्फ एक बात घूम रही थी – अगर रिया न होती… तो क्या होता?
रिया की आवाज़ सुनते ही अफ़सा जैसे बिजली लग गई हो। वो उठकर चली गई। मैं बेंच पर ही बैठा रहा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। जीन्स के अंदर लंड पूरी तरह तन चुका था।
इतना सख्त कि दर्द हो रहा था। रिया पास आई तो मैंने जल्दी से बैग अपनी गोद में रख लिया।
“क्या कर रहे हो यहाँ अकेले?” उसने पूछा।
“कुछ नहीं… सोच रहा था।”
उसने मेरा हाथ पकड़ा। “चलो, घर चलते हैं।”
उस रात रिया मेरे रूम में आई। दरवाज़ा बंद होते ही वो मेरे ऊपर चिपक गई। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। उसके कपड़े उतारे। उसके छोटे स्तन मुँह में लिए और चूसने लगा।
वो कराह उठी, “आह्ह गौरव… हम्म…” लेकिन मेरी आँखें बंद थीं। दिमाग में अफ़सा की गीली साड़ी, उसके निप्पल्स, उसकी भारी साँसें घूम रही थीं। मैंने रिया की चूत में उंगलियाँ डाल दीं। वो भीगी हुई थी।
“आह्ह… अंदर… और गहरा…” मैंने अपने लंड को उसकी चूत पर लगाया और एक ही धक्के में अंदर घुसा दिया। रिया चिल्लाई, “आह्ह्ह… इतना ज़ोर से!” लेकिन मैं रुकने वाला नहीं था। हर धक्के के साथ अफ़सा का चेहरा याद आ रहा था।
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