गन्ने के खेत में फाड़ी भाभी की गांड!
Desi Sex Kahani : पति शहर में था तो देवर ने गन्ने के खेत की झोपड़ी में चाटी-पेली प्यासी परिणिति भाभी की चूत! थूक लगाकर फाड़ी मोटी गांड! दोनों छेदो में भरा माल!
दोस्तों, मेरा नाम गौरव है। उम्र उन्नीस साल। गाँव का लड़का हूँ। शरीर थोड़ा बलिष्ठ है, क्योंकि खेत और कुएँ का काम बचपन से करता आया हूँ। लंड करीब सात इंच का है, मोटा।
दोस्तों के बीच मेरी चर्चा रहती थी कि मैं गाँव की तीन भाभियों को चोद चुका हूँ, लेकिन सच यह है कि वो तीनों भी एक दिन में नहीं हुई थीं। हर बार हफ्तों की नजर, दो-चार बातें, और फिर मौका।
पड़ोस में परिणिति भाभी रहती थीं। उम्र तीस के आसपास होगी। पति शहर में मिस्त्री का काम करते थे, महीने में एक बार आते थे। भाभी दिखने में कड़क थीं। बाहर निकले बड़े चूचे, चौड़ी गांड, होंठ मोटे और हमेशा हल्के गीले से।
जब वो गली से गुजरतीं तो साड़ी की कमर पर गांड दोनों तरफ हिलती थी। अच्छे-अच्छे मर्द मुड़कर देखते थे। मैं भी देखता था, लेकिन पहले सिर्फ देखता था।
उस हफ्ते मैंने उन्हें तीन बार गली में देखा। एक दिन हरा सूट और लाल लेगिंग। सूट में चूचे उभरे थे, लेगिंग में गांड का पूरा गोल उभार साफ था। वो बाल्टी लेकर कुएँ की तरफ जा रही थीं।
मेरी नजर उन पर अटक गई। भाभी ने देखा। मुस्कुराईं नहीं, लेकिन नजर भी नहीं फेरीं। बस आगे बढ़ गईं। उसी शाम मैं छत पर खड़ा था। उनके आँगन में वो कपड़े सुखा रही थीं।
झुकने पर साड़ी का पल्लू सरक गया। पीठ और कमर का गोरा-साँवला हिस्सा दिखा। मैंने कुछ नहीं कहा। दिल में सिर्फ यही बैठा - इस गांड को एक दिन हाथ लगाना है।
अगले दिन दोपहर को मैं अपने आँगन में चारपाई पर बैठा था। भाभी फिर गली से निकलीं। इस बार साड़ी में। गांड पहले से ज्यादा मटक रही थी, शायद जानबूझकर। मैंने हिम्मत जुटाई। आवाज धीमी रखी, ताकि गली के दूसरे घरों तक न जाए।
“भाभी, कभी अकेले मिलिए तो सही। बात करनी है।”
भाभी रुक गईं। बाल्टी हाथ में थी। चारों तरफ देखा। कोई नहीं था।
“क्या बात है? यहीं बोल दो।”
“यहाँ नहीं। लोग देख लेंगे।”
वो एक पल चुप रहीं। फिर बहुत हल्की आवाज में बोलीं, “कल दोपहर। पीछे वाले गन्ने के खेत में। जहाँ पुरानी झोपड़ी है। और किसी को मत बताना।”
मैंने सिर हिलाया। रात भर नींद नहीं आई। सुबह पिताजी खेत गए, माँ रसोई में थीं। मैंने बहाना बनाया कि दोस्त के यहाँ जाना है।
घर से निकलने से पहले एक गोली खा ली, ताकि लंड बीच में न बैठे। गर्मी थी। हवा गरम, गन्ने की पत्तियाँ खड़खड़ा रही थीं। मैं समय से पहले पहुँच गया। झोपड़ी के पीछे बैठ गया। दिल धड़क रहा था।
वो न आए तो क्या मुँह दिखाऊँगा। आए तो क्या करूँगा, यह भी साफ नहीं था।
करीब आधे घंटे बाद साड़ी की खड़खड़ाहट सुनाई दी। भाभी आईं। हल्की नीली साड़ी, हरा ब्लाउज, माथे पर सिंदूर, नीली बिंदी। बाल खुले थे। पास आकर बोलीं, “जल्दी आ गया। कोई देखा तो नहीं रास्ते में?”
“नहीं भाभी। मैं खेत के किनारे से आया।”
वो झोपड़ी की छाया में खड़ी रहीं। साँस थोड़ी तेज थी। मैंने हाथ बढ़ाने की कोशिश की तो उन्होंने कलाई पकड़ ली।
“धीरे। पहले बात कर। तू सच में आया क्यों?”
“आपकी गांड देखने के बाद नींद नहीं आती। आपने खुद बुलाया।”
भाभी हँसीं, लेकिन आँखें गंभीर थीं। “देवर लगता है तू। मजाक भी कर सकती हूँ। अगर बुरा माना तो चला जा।”
मैं मुँह लटकाकर दो कदम पीछे हटा। सच में जाने लगा। पीछे से आवाज आई, पहले से नरम।
“रुक। मजाक कर रही थी। तू बुरा मान गया?”
मैं रुका। भाभी पास आईं। साड़ी से हल्की देह की महक आ रही थी, पसीने की। उन्होंने मेरी कमीज का बटन नहीं खोला। सिर्फ कमर पर हाथ रखा और धीरे से अपनी तरफ खींचा।
“पैंट खोल। लेकिन जोर-जोर से मत चिल्लाना। खेत खाली है, फिर भी आवाज दूर जाती है।”
मैंने बटन खोला। लंड पहले से खड़ा था, गर्मी और गोली की वजह से। भाभी ने नीचे देखा। नाक थोड़ी सिकोड़ी।
“बदबू आ रही है। धोया नहीं क्या?”
“सुबह से नहीं।”
वो एक पल झिझकीं। फिर घुटनों के बल बैठ गईं। लंड हाथ में लिया, सिरा सूँघा, और धीरे से मुँह में लिया। जीभ सुपारे पर घूमी। मैंने उनके बाल नहीं खींचे। बस सिर पर हाथ रखा।
“भाभी… चूसो… धीरे… आह्ह…”
गप-गप की आवाज गन्नों के बीच दब रही थी। थोड़ी देर बाद मेरा पानी मुँह में निकल गया। भाभी ने उगल दिया, होंठ साड़ी के पल्लू से पोंछे।
“जल्दी झड़ गया। चूत भी चाहिए, या बस इतना ही काफी है?”
मैंने कुछ नहीं कहा। साड़ी की कमर ढीली की। अंदर पैंटी नहीं थी। गाँव की औरतें अक्सर नहीं पहनतीं। टाँगें मध्यम साँवली थीं। चूत पर घने काले बाल थे। भाभी खुद जमीन पर लेट गईं, एक हाथ मुँह पर रखा, ताकि आवाज न निकले।
“धीरे डालना। पति को गए दो महीने हो गए। चूत सिकुड़ गई होगी।”
मैं उनके ऊपर आया। लंड छेद पर घिसा। भाभी की साँस अटक गई।
“आह्ह… गौरव… धीरे…”
मैंने लंड को छेद पर और एक बार घिसा। भाभी की चूत पहले से गीली थी, लेकिन मुँह सिकुड़ा हुआ था। सिरा अंदर गया तो उनकी कमर ऊपर उठी।
“आह्ह… गौरव… रुक… आह्ह्ह… मोटा है…”
मैं रुक गया। पूरा नहीं घुसा था। भाभी ने आँखें बंद कर लीं, दोनों हाथ मेरी कमर पर रखे, और धीरे से अपनी तरफ खींचा।
“थोड़ा और… लेकिन एकदम से नहीं। आह्ह…” ये देसी हिन्दी सेक्स कहानी आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
मैंने आधा लंड और अंदर किया। भाभी के मुँह से लंबी साँस निकली। दर्द था, लेकिन वो भाग नहीं रही थीं। मैं उनके ऊपर लेटा रहा, हिलाया नहीं। उनके बड़े चूचे ब्लाउज में दबे थे।
मैंने ब्लाउज का हुक खोला। दोनों स्तन बाहर आ गए, भारी, निप्पल सख्त। एक को मुँह में लिया और धीरे चूसा। भाभी का हाथ मेरे बालों में गया।
“आह्ह… चूस… लेकिन चूत में अभी मत हिलाना… आह्ह्ह… भर गया लगता है…”
दो मिनट बाद उन्होंने खुद कमर हिलाई। मैं समझ गया। धीरे-धीरे धक्के शुरू किए। हर बार लंड थोड़ा और अंदर जाता। आखिरी झटके में पूरा समा गया। भाभी ने दाँत भींच लिए।
“आह्हhhhh… फट गई… मादरचोद धीरे… मैं मर जाऊँगी… आह्ह्ह…”
मैं धीमा रहा। गन्ने की पत्तियाँ ऊपर खड़खड़ा रही थीं। नीचे सिर्फ फच-फच की हल्की आवाज थी। भाभी रो रही थीं और चिल्ला भी रही थीं, लेकिन आवाज मुँह पर हाथ रखकर दबा रही थीं।
“छोड़ दे… जाने दे… आह्ह्ह बहुत दर्द… नहीं… निकाल मत… आह्ह… अब थोड़ा अच्छा लग रहा है…”
मैंने एक टाँग झोपड़ी के बाँस पर टिका दी और खड़े-खड़े चोदना शुरू किया। चूचे हाथ में आटे की तरह मसल रहा था। भाभी की गांड हर धक्के पर काँप रही थी।
“अह्ह… अह्ह्ह… गौरव… चूचे मत मसल इतना… आह्ह… चूत में और धीरे…”
खड़े-खड़े देर नहीं हो पा रही थी। घुटने काँप रहे थे। मैंने उन्हें फिर जमीन पर लिटाया, दोनों टाँगें कंधों पर उठाईं, और सात इंच का लंड एक बार में अंदर कर दिया। इस बार चीख दबी रही।
“आह्हhhhh… गहरा… आह्ह्ह… हाँ… ऐसे…”
कुछ मिनट बाद भाभी ने मुझे छाती पर धकेला। “नीचे लेट। मैं ऊपर आऊँगी। तू जोर से मार रहा है, मैं खुद चलाऊँगी।”
मैं लेट गया। भाभी साड़ी कमर पर लपेटे मेरे ऊपर बैठीं। लंड पकड़कर चूत पर सेट किया और धीरे-धीरे बैठ गईं। पूरा अंदर जाते ही उनकी आँखें बंद हो गईं। फिर उछलना शुरू किया।
भारी चूतड़ मेरे पेट पर टकरा रहे थे। चूचे झूल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से पकड़कर मसला।
“और जोर से… आह्ह्ह… इतना मजा पति के साथ कभी नहीं आया… आआह… और… फाड़ दे आज मेरी चूत को…”
मैं नीचे से धक्के मार रहा था। भाभी गालियाँ देने लगीं, आवाज अभी भी दबाकर।
“भोसड़ी वाले… बहूत बड़ा जल्लाद निकला… अपनी भाभी के भोसड़े को भी नहीं छोड़ा… मादरचोद… आह्ह्ह और जोर…”
मैंने भी जवाब दिया। “साली रांड, बड़ी कमीनी है तू। खुद बुलाया, अब दर्द का रोना रो रही है। ले।”
भाभी हँसीं между कराह के। “हाय रे… इसका मादरचोद कितना मोटा लंड है… इससे तो दो-तीन बच्चे पैदा कर लूँ… आह्ह्ह चोद…”
उन्होंने बताया, हाँफते हुए। “पति को बरसों हो गए सही से चोदा नहीं। एक बार भी गांड नहीं मारी। नामर्द है, पीता है, शहर में औरतों के चक्कर में रहता है। आज तू जमकर चोद। मुझे रंडी बना दे।”
मैंने स्पीड बढ़ा दी। उनकी घनी झाँटें मेरी जाँघों से टकरा रही थीं। पच-पच की आवाज गन्नों के बीच घुट रही थी। गांड का छेद हर धक्के पर खुल-बंद हो रहा था। भाभी अपनी चूत ऊपर-नीचे करके लंड को जड़ तक निगल रही थीं।
“आज मुझे जमकर चोदो… फाड़ दे… और तेज… आहह आहहह… ऊहह… मेरे रंडी बना दे आज…”
करीब दस मिनट बाद उनका शरीर अकड़ गया। चूत ने लंड कस लिया। गर्म पानी की धार निकली, झाँटें भीग गईं। भाभी पेड़ के तने से टिककर हाँफने लगीं।
“आह्ह्ह… झड़ गई… आह्ह… रुक एक मिनट…” ये Antarvasna Hindi Sex Kahani आप GaramKahani.com में पढ़ रहे है!
मैं अभी नहीं झड़ा था। लंड उनकी चूत से निकाला। गीला, कड़ा, चमक रहा था। भाभी ने देखा और समझ गईं।
“गांड भी मारेगा? जरा धीरे करना। गांड मरवाए हुए काफी दिन हो गए। पहले थूक लगा। एकदम से मत पेलना, वरना चीख निकलेगी और कोई सुन लेगा।”
मैंने उन्हें घोड़ी बनाया। मोटी काली गांड मेरे सामने थी। छेद छोटा, सिकुड़ा हुआ। थूक लगाया, उँगली से पहले ढीला किया। भाभी काँप रही थीं।
“आह्ह… उँगली भी मोटी लग रही है… लंड कैसे जाएगा… आह्ह्ह…”
मैंने उँगली धीरे बाहर निकाली। छेद थोड़ा ढीला हुआ था, फिर भी सिकुड़ा हुआ। थूक और लगाया, लंड का सिरा गांड पर सेट किया। भाभी ने दोनों हाथ जमीन पर जमाए, माथा नीचे किया।
“धीरे… एकदम से नहीं… आह्ह…”
मैंने दबाव दिया। सिरा अंदर गया। भाभी का शरीर अकड़ गया। मुँह से दबी चीख निकली।
“अह्ह्ह… मार दिया… निकाल… फाड़ दी मेरी गांड… साले…”
मैं रुक गया। आधा भी नहीं घुसा था। भाभी हाँफ रही थीं, आँखों से पानी आ गया था। मैंने बाल नहीं खींचे। कमर पर हाथ रखा और रुका रहा।
“बोलो, निकालूँ?”
थोड़ी देर साँस लेती रहीं। फिर अपनी गांड खुद थोड़ी पीछे की। आवाज टूटी हुई थी।
“रहने दे अंदर। धीरे कर। पति ने कभी नहीं मारी, लेकिन पहले एक बार किसी और से हुई थी। भूल गई थी कितना भरता है। आह्ह्ह… हिल मत अभी…”
मैं दो मिनट रुका। फिर बहुत धीमे धक्के। हर बार थोड़ा और अंदर। जब पूरा लंड गांड में समाया, भाभी की कमर काँप रही थी। आँसू गिर रहे थे, लेकिन भाग नहीं रही थीं।
“आह्हhhhh… पूरा घुस गया… मादरचोद… कितना मोटा है… धीरे-धीरे निकाल और डाल…”
मैंने बाल पकड़े, लेकिन खींचा नहीं। धक्के बढ़े। गप-गप की आवाज गांड से आने लगी। भाभी पहले गालियाँ दे रही थीं।
“अबे मादरचोद… तू अपनी माँ की पैदाइश है या किसी रांड की… सांड की तरह चोदे जा रहा है… निकाल ले…”
फिर वही गांड आगे-पीछे होने लगी। गाली का सुर बदल गया।
“आह्ह… अब मजा आ रहा है… चोद… और जोर से… मेरे मर्द को तो बरसों हो गए। पियक्कड़ है, बीवी को छोड़ सबको चोदता है। आज तू इस गांड को खोल दे… आह्ह्ह… फौलादी लंड है तेरा…”
मैंने कहा, “साली चुदक्कड़, तेरी गांड कब से चोदनी थी। आज देख ले। हफ्ते भर ठीक से नहीं बैठ पाएगी।”
“मार… मादरचोद… और जोर… आह्ह्ह हाँ…”
पंद्रह-बीस मिनट तक यही चला। धूप सिर पर थी, पसीना दोनों की पीठ पर। आखिर मेरा लंड अकड़ा। मैंने गांड से निकाला और चूत में डालकर आखिरी झटके मारे। सारा माल चूत में छोड़ दिया।
भाभी झुककर हाँफती रहीं। चूत और गांड दोनों से रस और वीर्य टपक रहा था।
“आह्ह्ह… भर दिया… दोनों जगह की याद रह जाएगी…”
हम जल्दी उठे। साड़ी ठीक की, ब्लाउज के हुक बंद किए, मेरे पैंट की धूल झाड़ी। झोपड़ी के बाहर कान लगाया। कोई नहीं था। भाभी ने सिंदूर ठीक किया।
“यह बात गली तक नहीं जानी चाहिए। पति आएगा तो महीने में एक बार। तब तक तू खेत में आ सकता है। लेकिन अचानक घर मत आना।”
मैंने सिर हिलाया। अलग-अलग रास्ते लौटे।
उसके बाद दो-तीन हफ्ते में फिर खेत हुआ। कभी दोपहर, कभी जब माँ शहर गई। भाभी अब खुद बुलाती थीं। चूत तो हर बार लेतीं, गांड हर बार नहीं। कहतीं, “गांड अभी भी दुखती है पिछली बार से।”
करीब दो महीने बाद एक शाम भाभी खुद मेरे घर के पीछे मिलीं। पेट पर हाथ रखा था। आवाज धीमी थी।
“तेरा ही है। पति को गए चार महीने हो गए। और किसी से नहीं हुआ बीच में।”
मैं डर गया। गाँव में बात फैलती है। मैंने कहा, “किसी को मत बताना। नहीं तो मेरी भी बर्बादी है, तेरी भी।” धमकी जैसी बात मुँह से निकल गई, फोटो की। भाभी का चेहरा बिगड़ गया।
वो कुछ नहीं बोलीं। कुछ दिन बाद पता चला उन्होंने बच्चा गिरवा दिया। मैं न मिल पाया, न रोक पाया।
उसके कुछ महीने बाद गाँव में खबर आई कि परिणिति भाभी बुखार में चल बसीं। अस्पताल देर से पहुँचीं। लोग बोले कमजोरी थी। मैं जानता था कमजोरी कहाँ से आई थी। खेत वाला रास्ता उसके बाद मैंने नहीं लिया।
दोस्तों, कहानी यहीं खत्म होती है। मजा भी था, और अंत अच्छा नहीं था। जो लिखना था, लिख दिया।
- आपका ऋषभ!
💬 Leave a Comment :-
📝 Comments :
No comments yet. Be the first to comment!