बहन चोदे पति, एस्कॉर्ट चोदे बीवी!
Husband Affair & Cheating Wife : पति ने दिवाली की रात चोदी चचेरी बहन की चूत! यह देख बीवी पूर्णिमा ने एस्कॉर्ट शोएब से office में चुदवाकर उसे बनाया पर्सनल PA!
किसी दार्शनिक ने बहुत सही कहा है कि औरतों को सफलता के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक क़ीमत चुकानी पढ़ती है. पूर्णिमा की ज़िंदगी बाहर से जितनी चमकदार थी, भीतर से उतनी ही खोखली और अंधेरी हो चुकी थी.
एक बहुत ही सफल और बुद्धिमान बिज़नेस वुमन, मार्केटिंग कंपनी की हेड होने के नाते वह बोर्डरूम में बड़े-बड़े फैसले लेती थी, लेकिन घर की दहलीज पार करते ही उसका सामना विक्रम की कड़वाहट और उपेक्षा से होता था।
विक्रम का व्यवहार केवल उदासी का कारण नहीं था, वह पूर्णिमा के आत्मविश्वास को धीरे-धीरे खत्म कर रहा था. विक्रम उसे “बॉडी सेम” का अहसास कराता था. उसे अपनी हाईप्रोफ़ाइल पत्नी पूर्णिमा पसंद नहीं थी।
कारण कि उसका गोल- मटोल, च्यूबी और भारी शरीर. उसे अपनी पत्नी अच्छी नहीं लगती थी क्योंकि वह फ़िल्मी हीरोइन की तरह छरहरी और सैक्सी नहीं थी. उससे पसीने की बदबू आती थी, उसे सलीक़े से बन-संवर कर रहना नहीं आता था।
पति कि सेवा नहीं करती थी, एक कप चाय बनानी नहीं आती थी, बगैरह- बगैरह. पूर्णिमा हर अत्याचार सहती रही, लोक लाज के डर से उसने तलाक़ की भी कोशिश नहीं की.
विक्रम की एक छोटी सी सरकारी नौकरी, पूर्णिमा के मल्टीनेशनल कम्पनी के हेड की आकर्षक सैलरी के आगे एक फूटी कौड़ी के जैसे थी फिर भी उसे पूर्णिमा को अपने साथ किसी सामाजिक समारोह में ले जाने में शर्म महसूस होती थी.
विक्रम, पूर्णिमा की चचेरी बहिन सोनल से प्रभावित था. एक सिमपल ग्रेजुएट, घरेलू लेकिन क़ायदे की लड़की. वह उसे गिफ़्ट देता रहता था, फ़ोन पर बतियाते रहते थे और शायद मिलते भी हो।
पूर्णिमा सभी बातें नज़रअंदाज़ करती रहती थी लेकिन एक दिन पानी सर के ऊपर से गुजरने लगा. दीपावली की उस रात, जब पूरा घर दीपों की रोशनी से जगमगा रहा था, पूर्णिमा के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उसे अंदर तक तोड़ दिया।
पूर्णिमा ने रंगे हाथों दोनों को एक कमरे में निर्वस्त्र पकड़ लिया.
दरवाजा पूरी तरह खुला नहीं था। पूर्णिमा ने कुंडी धीरे दबाई और अंदर झाँका।
सोनल बिस्तर पर पीठ के बल लेटी थी। जाँघें फैली हुईं। साड़ी कमर तक उखड़ी पड़ी थी, ब्लाउज एक तरफ गिरा था। विक्रम उनके ऊपर सवार था - पैंट घुटनों तक, कमर चल रही थी। हर धक्के पर बिस्तर की खटिया चरमरा रही थी।
“आह्ह्ह… विक्रम… और… अह्ह्ह धीरे नहीं… अंदर…” सोनल की आवाज दबी थी, लेकिन साफ। विक्रम ने उनके कूल्हे कसकर पकड़े हुए थे। लंड चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। फच-फच की आवाज दीयों की रोशनी वाले घर में ऊपर तक आ रही थी।
“तेरी चूदी जैसी बहन से बेहतर है तू,” विक्रम हाँफते हुए बोला। “इतनी गीली… अह्ह्ह सोनल… ले…”
सोनल ने टाँगें उसकी कमर पर लपेट लीं। “आह्हhhhh… झड़ मत बाहर… अंदर ही… अह्ह्ह…”
पूर्णिमा दरवाजे पर पत्थर की तरह खड़ी रही। नीचे घर में पूजा की थाली बज रही थी। ऊपर पति चचेरी बहन की चूत फाड़ रहा था। विक्रम ने एक गहरा झटका मारा।
सोनल की कमर उठी, चीख दबी - “आह्ह्ह… आ गया… अह्ह्ह…” विक्रम भी अंदर ही झड़ गया, शरीर अकड़ा। दोनों की साँसें एक हो गईं।
नीचे, पूरा घर दीपावली की पूजा की तैयारी कर रहा था और ऊपर दोनों एक बंद कमरे में क्या कर रहे थे? विक्रम ने बहाना बना दिया कि उसे पता नहीं था कि सोनल बाथरूम में नहा रही है.
पूर्णिमा ने भी ऐसे व्यक्त किया कि उसे उनके झूठ पर विश्वास हो गया है कि ऐसा ही है. उस दिन पूर्णिमा पूरी तरह टूट गई, शहर आने के बाद वह दिनोंदिन और ज़्यादा डिप्रेशन में आने लगी, उसने बहुत ज़्यादा शराब और सिगरेट पीना शुरू कर दिया.
उसका बीपी और शुगर गड़बड़ होना शुरू हो गया. किसी हमदर्द ने डेटिंग ऐप्स का सुझाव दिया, आख़िर पूर्णिमा भी किसी सच्चे और हमदर्द साथी की तलाश में डेटिंग ऐप स्क्रोल करने लगी.
कॉफी शाप में एक मीटिंग के बाद पूर्णिमा को शोएब पसंद आ गया था.
उसी दिन वह एक होटल के कमरे में अंतरंग हुए.
कमरे की लाइट पीली थी। शोएब ने दरवाजा बंद किया और पूर्णिमा को आईने के सामने खड़ा कर दिया।
“कपड़े खुद मत उतारना,” उसने धीरे कहा। “मैं उतारूँगा। तुम्हारा शरीर छुपाने लायक नहीं है।”
ब्लाउज के बटन एक-एक खुलते गए। ब्रा के नीचे भारी स्तन निकले — गोल, नरम, निपल गाढ़े। शोएब ने दोनों हाथों से उठाकर तौला।
“इतने भरपूर… और कोई कहता है सेक्सी नहीं हो।” मुँह लगाया। निपल चूसा, दाँत से हल्का काटा। पूर्णिमा की कमर पीछे झुकी।
“आह्ह्ह… शोएब… ऐसा… पहले किसी ने… अह्ह्ह…”
स्कर्ट नीचे गिरी। मोटी जाँघें, चौड़ी कमर, पैंटी के बीच पहले से गीला निशान। शोएब घुटनों के बल बैठा, पैंटी खींची और जीभ चूत पर फेरी।
पूर्णिमा ने आईना पकड़ लिया। “आह्हhhhh… वहाँ… ऊपर… अह्ह्ह चाटो…” सालों बाद किसी मर्द की जीभ थी। वो काँप रही थी, शर्मा रही थी, फिर खुद जाँघें और फैला रही थी।
शोएब उठा, उसे बिस्तर पर लिटाया, जाँघें कंधों तक उठाईं। लंड चूत के मुँह पर रगड़ा। “बोल, डालूँ?”
पूर्णिमा ने आँखें बंद कीं। “डाल… अह्ह्ह धीरे… बहुत दिन बाद…”
एक झटका। पूरा अंदर। साँस अटक गई।
“आह्हhhhh… भरा… अह्ह्ह शोएब…” उसने धीरे शुरू किया, फिर लय बढ़ाई। हर धक्के पर स्तन काँपते। पूर्णिमा के नाखून उसकी पीठ में गड़ गए। “और… जोर से… मुझे नाकाफी मत समझना… आह्ह्ह चोदो…”
पहली बार किसी ने उसके शरीर को भूख से लिया, घृणा से नहीं। जब शोएब निकला और पैंटी पर माल गिराया, पूर्णिमा ने उस पैंटी को मुट्ठी में भींच लिया। वो निशान उसने बाद में संभालकर रखा।
शोएब दिल से उसके शरीर और एक एक कर्व की तारीफ़ करते हुए उन्हें चूम रहा था, सहला रहा था. पहली बार पूर्णिमा को बॉडी सेम की जगह अपने शरीर की ख़ूबसूरती का अहसास हो रहा था.
अपनी ज़िंदगी में पूर्णिमा मुश्किल से चौथी बार किसी मर्द से शारीरिक सुख हासिल कर रही थी और यह पल उसकी ज़िंदगी के यादगार लम्हों बन गए थे, जिसे उसने अपनी पैंटी पर गिरे हुए शोएब के सीमेन की शक्ल में सहेज कर रख लिया था.
शोएब, जो असल में एक मेल एस्कॉर्ट था. असंतुष्ट महिलाओं को शारीरिक संतुष्टि देना उसका पेशा था. उसने ट्रेनिंग ली थी—कैसे शरीर की हर वक्र की तारीफ़ करनी है, कैसे धीरे-धीरे प्रेम जगाना है.
शोएब ने मजबूरी में यह धंधा ज्वाइन किया था लेकिन अब एक सफल और अमीर औरत से शादी करके वह अपनी गृहस्थी वसाना चाहता था इसीलिए उसने पूर्णिमा का तरीक़े से शिकार किया था.
हर दिन मैसेज, फोन कॉल, तारीफ़ें. “तेरे बिना मेरा दिन अधूरा है.” “तेरा शरीर मुझे पागल कर देता है.”
इन बातों को सुनकर पूर्णिमा पिघल जाती थी. पहले वे महीने में एक बार मिले थे, अब हर हफ़्ते. वह शोएब के बताए रंग और डिज़ाइन के कपड़े पहनती - टाइट ब्लाउज़ जो उसके स्तनों को उभारते, स्कर्ट जो उसकी मोटी जांघों को दिखाते.
शोएब उसे हर जगह ले जाता और हर जगह लेता. कभी हँसते हुए पूर्णिमा कहती, “तुम तो पेड़-पौधों को भी सिड्यूस कर सकते हो.” शोएब लहराते हुए भद्दी हँसी हँसता, फिर उसके शरीर को बाँहों में भर लेता.
वह कभी सस्ते धर्मशाला के कमरे में, जहाँ पुरानी चारपाई चरमराती थी. कभी लग्ज़री होटल के सुइट में, जहाँ शीशे की दीवारें थीं. कभी अंधेरे पार्क में, पेड़ों की छाँव में. कभी कार की पिछली सीट पर.
एक शाम कार में, शोएब ने पूर्णिमा को पीछे की सीट पर लिटाया. स्कर्ट ऊपर की, पैंटी नीचे. यह Antarvasna Hindi Sex Kahani आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है।
पार्किंग अंधेरी थी। शीशा हल्का फॉग था। पूर्णिमा ने मुँह हाथ से दबाया। शोएब ने जाँघें फैलाए रखीं, दो उंगलियाँ पहले चूत में कीं - “इतनी गीली सिर्फ स्कर्ट उठाने से?” फिर लंड लगाया, एक ही धक्के में अंदर।
“उम्मम्म्म… आह्ह्ह… कोई देख लेगा… अह्ह्ह शोएब धीरे…”
कार हिल रही थी। उसी लय में उसके बड़े स्तन ब्लाउज के अंदर उछल रहे थे। शोएब ने ब्लाउज ऊपर किया, एक स्तन मुँह में लिया, दाँत से निपल दबाया और कमर तेज की। फच-फच सीट पर गूँजने लगी। पूर्णिमा का हाथ शीशे पर फिसला।
“आह्हhhhh… और गहरा… गाड़ी मत रोक… अह्ह्ह झड़ने वाली हूँ…” शोएब ने जाँघें और चौड़ा कीं, आखिरी शॉट अंदर तक मारे। पूर्णिमा की कमर अकड़ गई, आवाज मुँह के पीछे फूट पड़ी — “आह्ह्ह… भर… अह्ह्ह…” गरम माल चूत में फैला, जाँघ तक बहने लगा।
शोएब निकला नहीं । कुछ देर अंदर ही रहा, माथे से माथा सटाए।
“अब समझी अपने शरीर की कीमत?” पूर्णिमा हांफती रही। जवाब में सिर्फ सिर हिलाया।
शोएब की बातें, उसका ध्यान से सुनना और पूर्णिमा को एक सफल, खूबसूरत महिला के रूप में देखना—यह सब पूर्णिमा के लिए बिल्कुल नया अनुभव था. पहली बार, उसे अपने शरीर या अपनी पर्सनालिटी को लेकर किसी शर्मिंदगी का अहसास नहीं हुआ.
शोएब के साथ बिताए उन शुरुआती पलों में पूर्णिमा को यह अहसास हुआ कि आकर्षण और अपनापन क्या होता है. सालों बाद वह खुद को किसी के करीब महसूस कर रही थी.
लेकिन पूर्णिमा इस बात से बेखबर थी कि शोएब की इस नज़दीकी के पीछे एक सोची-समझी योजना थी. शोएब, जो जीवन की मुश्किलों से जूझ रहा था, एक समृद्ध और स्थापित जीवन की तलाश में था.
पूर्णिमा के साथ अपने रिश्ते को आगे बढ़ाते हुए उसने 'लव-बॉमिंग' का सहारा लिया—लगातार ध्यान देना, तारीफें करना और हर पल अपनी मौजूदगी का अहसास कराना.
पूर्णिमा, जो लंबे समय से स्नेह और सम्मान की भूखी थी, धीरे-धीरे उसकी इन बातों के जाल में उलझती चली गई.
जैसे-जैसे हफ्ते बीते, पूर्णिमा का ध्यान अपने अतीत की कड़वाहट से हटने लगा. विक्रम और सोनल का धोखा अब उसके लिए मायने नहीं रखता था.
शोएब के साथ घूमना, सप्ताहांत पर समय बिताना और अपनी पसंद के हिसाब से जीना उसे एक नई आज़ादी का अहसास कराने लगा. उसके चेहरे की रंगत वापस लौटने लगी थी और उसका बीपी तथा तनाव भी धीरे-धीरे सामान्य होने लगा था.
तीन महीने के समय में पूर्णिमा ने महसूस किया कि वह शोएब को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहती है. जब शोएब ने अपनी आर्थिक तंगी, बीमार माँ और बेरोज़गारी की स्थिति का ज़िक्र किया, तो पूर्णिमा ने बिना झिझक उसकी मदद करने का फैसला किया.
उसने शोएब को अपनी कंपनी में पर्सनल असिस्टेंट के पद पर नियुक्त किया और उसके रहने के लिए एक फ्लैट का डाउन पेमेंट भी किया.
शोएब ने पूर्णिमा को एक वफादार साथी की तरह हमेशा उसके साथ रहने का आश्वासन दिया.
पूर्णिमा को लगा कि उसने अंततः अपनी ज़िंदगी पर नियंत्रण पा लिया है और वह एक ऐसे रिश्ते में है जहाँ उसे सराहा जा रहा है, भले ही इस नए रिश्ते की नींव की सच्चाई से वह पूरी तरह वाकिफ न थी.
शोएब को कंपनी में पर्सनल असिस्टेंट का पद मिले अभी दो ही महीने हुए थे, और पूर्णिमा की ज़िंदगी एक अलग ही रफ्तार पकड़ चुकी थी.
रपोरेट वर्ल्ड में पूर्णिमा का रौब पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया था, और उसके पीछे की वजह थी उसका नया आत्मविश्वास. लेकिन जिस बुनियाद पर यह रिश्ता टिका था, उसकी दरारें अब धीरे-धीरे सतह पर आने लगी थीं.
शोएब अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा था. ऑफिस में वह एक अनुशासित और पेशेवर कर्मचारी की तरह रहता, लेकिन बंद कमरों में और वीकेंड्स पर वह पूर्णिमा को पूरी तरह अपने काबू में रखता.
पूर्णिमा को लगता था कि शोएब उससे बेपनाह प्यार करता है, लेकिन शोएब के दिमाग में गणित की सीधी-सपाट कैलकुलेशन चल रही थी.
उसने पूर्णिमा के दिए हुए फ्लैट का इंटीरियर अपनी पसंद से करवाया, लग्जरी गाड़ियों के सपने देखे और धीरे-धीरे कंपनी के अंदरूनी मामलों में अपनी दखलअंदाज़ी बढ़ानी शुरू कर दी.
दूसरी तरफ, विक्रम की ज़िंदगी में सब कुछ सही नहीं चल रहा था. पूर्णिमा का घर पर न के बराबर रहना, उसका बदलता पहनावा और उसकी बेफिक्री विक्रम को खटकने लगी थी.
जिस पत्नी को वह ताने दिया करता था, वही पत्नी अब उसकी तरफ देखती तक नहीं थी. विक्रम का अहंकार आहत होने लगा.
उसने पूर्णिमा का पीछा करना शुरू किया और जल्द ही उसे पता चल गया कि पूर्णिमा की ज़िंदगी में कोई नया शख्स आ चुका है - और वह कोई और नहीं, बल्कि उसकी ही कंपनी का पीए शोएब है.
एक शाम, जब पूर्णिमा ऑफिस के देर तक चले काम के बाद शोएब के साथ अपने नए अपार्टमेंट में समय बिता रही थी, विक्रम वहाँ अचानक पहुँच गया.
उसने पूर्णिमा पर चरित्रहीनता का आरोप लगाते हुए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया.
विक्रम को लगा था कि पूर्णिमा हमेशा की तरह डर जाएगी, समाज का दुहाई देकर रोने लगेगी या माफ़ी माँगेगी.
लेकिन इस बार पूर्णिमा का रूप बदला हुआ था. उसने शांति से अपने पर्स से कुछ कागजात निकाले - वे तस्वीरें और सबूत थे, जो उसने दिवाली वाली रात के बाद विक्रम और सोनल के खिलाफ एक प्राइवेट डिटेक्टिव से इकट्ठा करवाए थे.
पूर्णिमा ने एक ठंडी मुस्कान के साथ विक्रम की तरफ देखते हुए कहा,
"जिस कांच के घर में तुम सालों से रह रहे थे विक्रम, उसकी छत बहुत पहले गिर चुकी है. कोर्ट में जब ये दस्तावेज़ जाएँगे, तो तुम्हारी सरकारी नौकरी और बची-कुची इज़्ज़त दोनों नीलाम हो जाएँगी.
चुपचाप तलाक़ के कागज़ों पर दस्तखत करो और मेरी ज़िंदगी से निकल जाओ."
विक्रम बदहवास होकर वहाँ से चला गया. उस रात पूर्णिमा को लगा कि उसने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत ली है. उसने शोएब को गले लगाया, यह सोचकर कि शोएब ही उसका असली सहारा है.
लेकिन कहानी में असली मोड़ आना अभी बाकी था.
विक्रम से पीछा छूटने के कुछ ही हफ्तों बाद, पूर्णिमा को अपनी कंपनी के अकाउंट्स में कुछ बड़ी वित्तीय अनियमितताओं का पता चला.
कंपनी के एक बड़े क्लाइंट का फंड एक अज्ञात अकाउंट में ट्रांसफर किया जा रहा था. जब पूर्णिमा ने गहराई से छानबीन की, तो डिजिटल फुट्रिंप्ट्स सीधे शोएब के सिस्टम तक पहुँचे.
पूर्णिमा का दिल बैठ गया. उसने जिस इंसान को अपना हमदर्द, अपना प्रेमी और अपना रक्षक समझा था, वह केवल उसकी संपत्ति और रुतबे का इस्तेमाल कर रहा था.
शोएब की माँ की बीमारी, बहन की शादी—सब एक रची हुई पटकथा का हिस्सा थे. शोएब का मकसद कभी पूर्णिमा से शादी करके बसना नहीं था, बल्कि उसे भावनात्मक रूप से इतना निर्भर बना देना था कि वह कंपनी का एक बड़ा हिस्सा उसके नाम कर दे.
शोएब की चोरी पकड़ने के बाद पूर्णिमा ने उसे, उसी कैंडल-लाइट डिनर पर बुलाया जहाँ वे पहली बार मिले थे. शोएब को लग रहा था कि पूर्णिमा उसे कंपनी में पार्टनर बनाने की घोषणा करने वाली है.
उस रात उन्होंने अपना अंतिम जश्न मनाया. शोएब ने कहा- “आज काले रंग का लैस वाला सेट पहनना, और कोई अंदरवाला नहीं.” खाना खत्म होने के बाद, होटल के सुइट में शोएब ने पूर्णिमा को नग्न किया.
“आज काले रंग का लेस वाला सेट पहनना, और कोई अंदरवाला नहीं” - उसने कहा था।
सेट अब फर्श पर पड़ा था। शोएब ने गर्म तेल हथेलियों में लिया। पहले स्तन - गोल-गोल मसलते, निपल चिकने कर दिए। फिर पेट, कमर की तह, मोटी जाँघें, चूत के दोनों तरफ। तेल चूत तक बह गया।
वह घंटों लेटा रहा। जीभ से चाटा - स्तन, नाभि, फिर चूत। दो उंगलियाँ अंदर, अंगूठा ऊपर की गांठ पर। पूर्णिमा की पहली झड़न दस मिनट में आ गई।
“आह्हhhhh… शोएब… रुक… अह्ह्ह बहुत…” उसने नहीं रुका। मुँह चूत पर सटाए रखा। दूसरी बार टाँगें काँपकर बंद हुईं उसके सिर पर। यह Desi Sex Ki XXX Chudai Ki Kahani आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है।
तीसरी बार उसने उसे घोड़ी बनाया, पीछे से चाटा, फिर लंड गांड के छेद पर रगड़ा लेकिन घुसाया नहीं - सिर्फ धमकी दी। पूर्णिमा पागल हो गई।
“आह्ह्ह… डाल… मत सता… अह्ह्ह चूत में डाल…” चौथी बार उसने उसे गोद में बिठाया। पूर्णिमा खुद ऊपर-नीचे हुई।
मोटे स्तन उसके चेहरे पर थप-थप कर रहे थे। तेल, पसीना, चूत का पानी — सब मिल गया। “आह्ह्ह… मैं झड़ रही हूँ… फिर… अह्ह्ह शोएब…” दोनों एक साथ गए। पूर्णिमा उसके सीने पर गिर गई।
आखिर में शोएब ने उसे गोद में बिठाया तो पूर्णिमा खुद ऊपर-नीचे हुई. उसके मोटे स्तन शोएब के चेहरे को थपथपा रहे थे. काम ख़त्म होने के बाद पूर्णिमा ने टेबल पर दो लिफाफे रखे.
"पहला लिफाफा तुम्हारे रेजिग्नेशन लेटर और फ्लैट के कैंसिलेशन पेपर्स का है," पूर्णिमा ने बहुत शांत आवाज़ में कहा. "और दूसरा लिफाफा उस पुलिस शिकायत की कॉपी है, जो वित्तीय धोखाधड़ी के जुर्म में तुम्हारे खिलाफ तैयार है."
शोएब का चेहरा फक पड़ गया. उसकी सारी ट्रेनिंग, उसका आकर्षण और उसकी चालाकियाँ पूर्णिमा के इस रूप के आगे धरी की धरी रह गईं.
उसने सफाई देने और पूर्णिमा को फिर से अपने प्यार के जाल में फंसाने की कोशिश की, लेकिन पूर्णिमा अब वो कमजोर औरत नहीं थी जो किसी के भी झूठे आकर्षण में आ जाए.
"तुमने मुझे शरीर की खूबसूरती का अहसास कराया, उसके लिए शुक्रिया.” लेकिन तुमने मुझे यह भी सिखाया कि मेरी असली ताकत किसी मर्द के दिए प्यार में नहीं, बल्कि मेरे अपने आत्म-सम्मान में है."
पूर्णिमा ने शोएब को कंपनी से बेदखल कर दिया और विक्रम से कानूनी तौर पर अलग हो गई.
कुछ महीनों बाद, पूर्णिमा ने अपनी कंपनी का विस्तार एक नए शहर में किया.
अब वह शराब या सिगरेट के सहारे नहीं जीती थी, न ही उसे अपना अकेलापन बांटने के लिए किसी ऐप या किसी मर्द की ज़रूरत थी. वह अपनी शर्तों पर जी रही थी - एक ऐसी औरत के रूप में जिसने टूटने से इंकार कर दिया था और अपनी नियति की खुद मालिक बनी थी.
- पूर्णिमा अतुल गोयल
बरुआसागर
purnimaagoyal@gmail.com
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