मदारचोद बेटे ने फाड़ दी चूत! - घर की बातें!
Antarvasna Family Sex Story : माँ की प्यासी चुत को 8 इंची लंड से फाड़ के भरी कोख! नंगी उँगली करती मिली दीदी! तो माँ बोली - मदारचोद के साथ अब बहनचोद भी बनाऊँगी!
भाग एक "सोते बेटे का माँ ने निचोडा लंड! - घर की बातें!" में आपने पढ़ा :-
शाम को जिम से लौटा तो घर खाली लगा। जूते उतारे, तभी किचन से बर्तन की आवाज़ आई। दोनों दीदी शॉपिंग गई थीं। सिर्फ़ माँ थीं।
दरवाज़े के फ्रेम से देखा - वही सुबह वाली पतली ड्रेस, गैस के सामने खड़ी, बाल कान के पीछे किए। मैं एक पल खड़ा रहा। फिर बाथरूम की तरफ़ बढ़ा, जैसे नहाना ही मकसद हो।
पानी गिरने लगा। याद आई सुबह की पिचकारी, किचन में गाँड पर दबा लंड, कॉफ़ी देते वक्त झुके बूब्स, माँ की उस एक पंक्ति में पिताजी का जिक्र। लंड फिर खड़ा हो गया। हाथ चलने लगा। आँखें बंद थीं।
मुँह से निकल पड़ा, “शीना, तुम्हारे बूब्स कितने सुंदर हैं… गाँड भी कितनी सुंदर है… आज इसे फाड़ देना चाहता हूँ।”
उसी वक्त बाथरूम का दूसरा दरवाज़ा खुला।
सामने श्रुति दीदी खड़ी थीं।
और मैं पूरा नंगा था!
आगे की कहानी :-
पिताजी की ट्रेन निकले हुए पंद्रह घंटे भी नहीं हुए थे। सुबह माँ ने सोए हुए संदीप का लंड हाथ में लिया था, किचन में गाँड पर दबाव लौटाया था, कॉफ़ी देते हुए स्तन झुका दिए थे। शाम को घर में सिर्फ़ माँ थीं।
संदीप बाथरूम में उसी सुबह को दोहरा रहा था। लंड हाथ में था, मुँह से माँ का नाम निकल रहा था - और दरवाज़ा खुल गया।
श्रुति दीदी शॉवर वाले दरवाज़े पर खड़ी थीं। पानी की आवाज़ के नीचे भी उनका ध्यान मेरे खड़े लंड पर अटका हुआ था। मैं कुछ बोलने की हालत में नहीं था।
मुँह से वही शब्द निकल रहे थे जो मैं अकेले में गुनगुना रहा था, “शीना, तुम्हारे बूब्स कितने सुंदर हैं… गाँड भी कितनी सुंदर है… आज इसे फाड़ देना चाहता हूँ।”
दीदी ने सुना। ये मैं बाद में समझा, उस वक्त नहीं। वो हटी नहीं। निगाह लंड के सिर से नीचे नसों तक गई, फिर वापस मेरे चेहरे पर आई।
उस निगाह में डर कम था, भूख ज़्यादा। घर की औरतों में जो खुलपन पहले से चल रहा था - माँ और बेटियों के बीच छुए गए बदन, रात की दबी आहें - उसकी एक और दरार उसी बाथरूम के मुँह पर खुल गई।
तभी किचन से माँ की आवाज़ आई। दोनों होश में आए।
श्रुति ने आवाज़ कम रखी, “दरवाज़ा तो कम से कम लॉक किया कर।”
“सॉरी दी।”
वो मुड़ी और चली गईं। मैंने शावर तेज़ कर दिया, ताकि चेहरा छिप जाए। लंड अभी भी हाथ में था।
रात को चारों डाइनिंग टेबल पर बैठे। श्रेया मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रही थी। वो मुस्कान मासूम नहीं थी। सुबह बाथरूम वाला दृश्य उनके कान तक पहुँच चुका था, या उन्होंने खुद कुछ और देख लिया था - तब पता नहीं चला।
माँ ने पूछा, “क्या हुआ? तू क्यों मुस्कुरा रही है?”
श्रेया ने कौर मुँह में रखा, “कुछ नहीं। ऐसे ही कुछ याद आ गया था। कुछ अच्छी यादें मुस्कुराने का कारण होती हैं।” इतना कहकर फिर मेरी तरफ़ देखा।
माँ ने हँसते हुए कहा, “मुझे भी बता, ऐसी कौन-सी चीज़ है।”
“खाने के बाद अकेले में बताऊँगी।”
माँ ने थाली आगे सरकाई और बात बदल दी, “सुनो, तुम दोनों में से कोई एक मेरे साथ मेरे बेडरूम में सोना। तुम्हारे पिताजी नहीं हैं। मुझे अकेले में डर लगता है।”
श्रुति ने तुरंत सिर हिलाया, “नहीं माँ, मुझे अपने कमरे में सोना है।”
श्रेया ने साथ दिया, “माँ, मुझे भी अपने बिस्तर पर सोना है। आप भाई को अपने साथ सोने के लिए बोलो।”
मैंने फ़ोर्क रख दी, “मैं क्यों? आप दोनों लेडीज़ हो। आप माँ के साथ आराम से सो सकती हो।”
माँ एकदम से रुक गईं। आँखें भर आईं। आवाज़ काँपी, “मेरे बच्चे मुझे बिलकुल नहीं समझते।”
रोने लगीं। वो मौका मैं खोना नहीं चाहता था। सुबह उनके हाथ की गरमाहट अभी भी हथेली पर थी।
“माँ, तू रो मत। मैं तेरे पास बेडरूम में सोऊँगा।”
माँ ने आँसू पोंछे। श्रेया ने फिर वही छोटी सी मुस्कान दी। श्रुति चुप रही, लेकिन उनकी नज़र मेरे गले से नीचे तक एक बार फिर गई।
रात में कपड़े बदलकर माँ के कमरे में पहुँचा। माँ ने एक पतली नाइटी पहनी हुई थी। कपड़े के नीचे पूरा शरीर साफ़ झलक रहा था। मैंने कॉटन की टी-शर्ट और लुंगी ही रखी थी।
माँ को गौर से देखा तो लंड में तनाव आ गया। छुपाने के लिए तुरंत बिस्तर पर बैठ गया, हाथ नीचे की तरफ़ ले गया। माँ आईने में सब देख रही थीं। कुछ नहीं कहा।
मैं बिस्तर के बाएँ कोने में लेट गया, चेहरा दीवार की तरफ़ कर लिया। माँ दूसरी तरफ़ लेटीं, चेहरा अलमारी की तरफ़।
“संदीप बेटा, ज़रा लाइट बंद कर दे। और हाँ, डिम लाइट ऑन कर देना। मुझे अंधेरे में डर लगता है।”
मैंने स्विच दबाया। कमरा पीली रोशनी में डूब गया।
“मैं हूँ न आपके पास। डरने की क्या बात है।”
माँ की आवाज़ तकिये में दब गई, “मुझे कभी रात में डर लगता है तो मैं तेरे पिताजी को हग कर लेती थी।”
“अगर रात में डर लगे तो आप मुझे भी हग कर सकती हो।”
“थैंक्स बेटा।” यह Family Free Hindi Sex X Kamvasna Chudai Ki Kahani आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
माँ का रंग एकदम गोरा है। बूब्स छत्तीस, कमर बत्तीस, गाँड अड़तीस। घर में दुपट्टा मैंने उन पर कभी नहीं देखा। स्तन तने हुए हैं, तीन बच्चों के बाद भी ढीले नहीं पड़े। उसी नाइटी में वो पहाड़ जैसे उठे हुए थे।
माँ सोने की कोशिश करने लगीं। मैंने आँखें बंद कर लीं। थोड़ी देर बाद करवट बदली। जगह बदलने से नींद नहीं आ रही थी। माँ की तरफ़ पलटा तो देखा — नाइटी उनकी कमर तक खिसक चुकी थी।
डिम लाइट में गाँड एकदम साफ़ दिख रही थी। माँ पीठ करके लेटी थीं। साँस गहरी थी, जैसे गहरी नींद में हों।
मैं चुपचाप पास गया। नाइटी रेशमी थी, हाथ लगाते ही सरक गई। मैंने उसे खींचकर कमर के ऊपर कर दिया। दाहिना हाथ माँ की दाईं जाँघ पर रखा। कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। निचला बदन और नज़दीक किया। खड़ा लंड अब उनकी गाँड को छू रहा था।
हिम्मत बढ़ी। हाथ जाँघ से उठाकर स्तनों पर रखा। माँ ने कॉटन की बहुत नरम ब्रा पहनी हुई थी। छूते ही एक अजीब सा आराम और भूख एक साथ आई।
मै उसे धीरे-धीरे दबाने लगा। कुछ देर बाद बाएँ हाथ से ब्रा का हुक खोला। अब पूरे नंगे स्तन हथेली में थे। मैं उन्हें मसल रहा था, निपल्स उँगलियों के बीच ले रहा था।
माँ के मुँह से हल्की आवाज़ निकली, “आह… आह…”
समझ गया - जाग चुकी हैं। और मना नहीं कर रही हैं।
मैंने लंड धीरे से उनकी गाँड के बीच घिसाने लगा। लोहे जैसा गरम था, पत्थर जैसा कड़ा। माँ ने धीरे से अपनी पैंटी उतार दी। मेरे लिए उससे बड़ा इशारा और क्या होता।
लेकिन एकपल के लिए सोचा माँ इतनी खुली हुई कैसे है? (इसका जवाब मुझे घर की नौकरानी से बाद में मिला जिसे आप आगे के भागों में पढ़ेंगे!)
मैंने उन्हें खींचकर पीठ के बल लिटा दिया। जैसे ही माँ पलटीं, दोनों नंगे स्तन आँखों के सामने आ गए। पिछले कई दिनों से सिर्फ़ झलक मिलती थी। आज पूरा दृश्य था। रुकना अब मुमकिन नहीं था।
एक स्तन मुँह में लिया, दूसरे को अंगूठे और दो उँगलियों से मसलने लगा। माँ की आहें मोअन में बदल गईं।
कुछ देर दोनों स्तन चूसने के बाद पेट की तरफ़ उतरा। नाभि पर चुंबन लिया, जीभ फेरी। माँ के लिए आँखें बंद रखना मुश्किल होता जा रहा था।
मैंने धीरे से कहा, “अब तुम आँखें खोल सकती हो। हमारे बीच अब कुछ छुपा नहीं है।”
माँ ने आँखें खोलीं। हाथ मेरे बालों में घुस गया। उस स्पर्श से एक अजीब सा जोश भर गया। और नीचे सरका। लक्ष्य के ठीक सामने पहुँच गया।
पहले उनकी चूत को देखा - छोटी सी, भीगी हुई, क्लिट रस से चमकीला। समय बर्बाद नहीं किया। मुँह पूरा खोला और पूरी चूत मुँह में लेकर चाटने लगा।
माँ एकदम से उछल पड़ीं। आवाज़ फट कर निकली, “मैं आज तक इस सुख के लिए तरसती रही। सिर्फ़ फ़िल्मों में देखती थी। मुझे लगता था ये सुख मेरे जीवन में लिखा ही नहीं है।”
मैंने चूत से मुँह हटाए बिना कहा, “माँ, तू चिंता न कर। जब भी तेरा मन करे, मुझे आदेश देना। मैं तेरी चूत चाट कर शांत कर दूँगा।”
मेरी लगातार कुत्ते जैसे चटाई से माँ का शरीर अकड़ने लगा। समझ गया - अब झड़ने वाली हैं। एकदम से पिचकारी छूटी। मैंने मुँह चूत से सटाए रखा और वो पूरा अमृत पी गया।
माँ की साँस टूट-टूटकर निकली। दोनों हाथ मेरे सिर पर दब गए। फिर आवाज़ आई, काँपती हुई, साफ़।
“बेटा… अब अपने इस मूसल लंड से मेरी चूत में लगी आग शांत कर दे। मेरे तन-बदन में आग बढ़ती ही जा रही है। अब और इंतज़ार नहीं कर सकती। ”
माँ की आवाज़ अभी भी काँप रही थी। “बेटा… अब अपने इस मूसल लंड से मेरी चूत में लगी आग शांत कर दे! और बन जा मदारचोद!” मैं उनके दोनों पैरों के बीच बैठ गया।
लंड का सुपाड़ा चूत के मुँह पर रखा। गर्मी एकदम पास थी। चाटने से वो पहले ही भीग चुकी थी, फिर भी मुँह छोटा लगा।
माँ ने आँखें भींच लीं। “ज़रा धीरे से अंदर डालना। इतना मोटा और बड़ा लंड आज तक मेरी चूत में घुसा नहीं है। तेरे पिताजी का तो इसका आधा होगा। तेरे इस साढ़े आठ इंच को देखकर तो फ़िल्मों वाले अफ़्रीकन लंड याद आते हैं।”
मैंने सुपाड़ा धीरे से अंदर किया। सिर्फ़ सिर घुसा। माँ की उँगलियाँ चादर भींच गईं। जब सुपाड़ा पूरा प्रवेश कर गया तो मैंने एक झटका मारा और बाकी लंड एक साथ भीतर चला गया।
माँ अपने आप को रोक न सकीं। आवाज़ फट गई, “मार डाला रे! मेरी चूत फाड़ दी तूने! बाहर निकाल इसे, नहीं तो मैं मर जाऊँगी। मदारचोद जल्दी निकाल!”
मैं हिला नहीं। उसी स्थिति में पड़ा रहा। लंड अंदर था, पूरा, जड़ तक। माँ की चूत धड़क रही थी, जैसे किसी ने दरवाज़ा जबरदस्ती खोला हो और दीवारें अब संभल रही हों। उनके माथे पर पसीना आ गया।
मैंने उनके होठों पर साँस रखी, कुछ कहा नहीं। दो-तीन मिनट ऐसे ही बीते। माँ की पकड़ ढीली पड़ी। साँस लंबी हुई। उन्होंने खुद एक बार कमर हिलाई - छोटी सी, जैसे जाँच रही हों कि दर्द अब भी वही है या उतर आया है।
तब मैंने धक्का शुरू किया। पहले छोटे। बाहर थोड़ा, अंदर थोड़ा। माँ की आँखें अभी भी बंद थीं, लेकिन मुँह से “निकाल” की जगह अब एक दबी हुई आह निकल रही थी। दस-बारह मिनट तक वही लय रही।
बिस्तर की चर्र-चर्र कम रखने की कोशिश की, क्योंकि दीदियों का कमरा दूर नहीं था। माँ के स्तन हर धक्के पर काँपते। मैं कभी एक निपल मुँह में ले लेता, कभी उनके गले पर मुँह रख देता। माँ के नाखून मेरी पीठ पर चलने लगे।
“और अंदर… हाँ… अब निकाल मत… यहीं…” उनकी आवाज़ टूट-टूटकर आ रही थी। यह Antarvasna Hindi Sex Kahani आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
“तेरे पिताजी ने कभी ऐसे नहीं चोदा… कभी इतनी देर… आह संदीप… मदारचोद जोर से.. आह आह्ह”
ये सुनकर लंड और कड़ा हुआ। मैंने रफ़्तार बढ़ाई। माँ की चूत अब रोकने की बजाय खिंचकर लपेट रही थी। उनकी जाँघें मेरे कमर से चिपक गईं। मैंने कहा, “माँ, अब मेरा माल निकलने वाला है।”
“मदारचोद अंदर ही छोड़ दे… बाहर मत निकालना! इस गर्म वीर्य को अपने अंदर फ़ील करना चाहती हूँ!”
दो झटके और पिचकारी छूटी। पूरा वीर्य उनकी चूत में गया। माँ की कमर उठी, एक लंबी आवाज़ निकली, फिर शरीर ढीला पड़ गया। मैं दो मिनट उनके ऊपर ही पड़ा रहा।
दोनों की साँसें एक दूसरे के गले में भर रही थीं। लंड अभी अंदर था, धीरे-धीरे नरम हो रहा था। माँ के हाथ मेरे बालों में थे, लेकिन बोल नहीं रही थीं।
फिर मैं उठा। बाथरूम जाकर खुद को साफ़ किया। आईने में चेहरा वैसा ही था - वही उन्नीस साल का लड़का - बस आँखों में नींद की जगह कुछ और था।
लौटकर अपनी जगह पर लेट गया, दीवार की तरफ़। माँ ने नाइटी समेट ली। पैंटी नहीं पहनी। डिम लाइट वैसी की वैसी जलती रही। थोड़ी देर बाद उन्होंने हाथ बढ़ाकर मेरी कमर पर रखा, लेकिन कुछ कहा नहीं।
फिर हम माँ बेटे दोनों नंगे ही सो गए।
सुबह माँ की आवाज़ आई। घड़ी में साढ़े आठ बज रहे थे।
“संदीप, उठ। साढ़े आठ हो गए।”
मैंने कम्बल खींचा। आँख नहीं खुली।
“उठ बेटा। आज एक दोस्त के घर जाना था ना तेरा।”
तब आँख खुली। माँ बिस्तर के किनारे खड़ी थीं। नाइटी पहन ली थी, बाल बिखरे थे। गर्दन पर मेरा एक निशान हल्का सा दिख रहा था। उन्होंने देखा कि मैं देख रहा हूँ, तो नाइटी का गला ठीक किया।
“तुझे रात में मज़ा आया?” उन्होंने सीधा पूछा। आवाज़ में शर्म कम थी, हिसाब और हवस ज़्यादा!
मैं उठकर बैठ गया। “हाँ माँ। मुझे तो बहुत मज़ा आया! तुझे मज़ा आया कि नहीं?”
माँ ने हल्की सी साँस ली। “तूने तो मेरी जान ही निकाल दी थी! मदारचोद मैंने तुझे कहा था ज़रा धीरे से। पर तू है कि एक झटके में पूरा डाल दिया।”
“माँ, अगर धीरे से डालता तो इतना मज़ा आता तुझे?”
वो जवाब के लिए मुँह खोलतीं, फिर रुक गईं। आईने की तरफ़ पीठ करके बोलीं, “चल, जल्दी नहा ले। मैं तेरे लिए नाश्ता बनाती हूँ।”
कमरे से निकलते हुए दरवाज़े पर खड़ी हुईं। बिना मुड़े कहा, “पैंटी वहीं पड़ी है। उठाकर टोकरी में डाल देना। दीदी नज़र न डाल दें।”
मैं बाथरूम की तरफ़ बढ़ा, अपने कमरे से कपड़े लिए। कॉमन बाथरूम का दरवाज़ा हाथ लगाते ही एक बात याद आई - इस बाथरूम का दूसरा मुँह दीदियों के कमरे में खुलता है। सुबह-सुबह लॉक की आदत अभी भी नहीं थी।
दरवाज़ा खोला। यह XXX Desi Sex वाली Parivarik Chudai Antarvasana Sex Story आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
शावर चल रहा था। भाप भरी थी। श्रुति दीदी पानी के नीचे खड़ी थीं। पूरा बदन नंगा। मुँह दूसरी तरफ़ था, गाँड मेरी तरफ़। संगमरमर जैसी गोरी त्वचा। फिगर चौंतीस-तीस-छत्तीस। एक हाथ नीचे था।
उँगली उनकी अपनी चूत में अंदर-बाहर हो रही थी। आँखें बंद थीं। उन्हें पता भी नहीं चला कि दरवाज़ा खुला है।
मैं दहलीज़ पर रुक गया। लंड जो सुबह नरम होकर सोया था, फिर तन गया। दीदी की उँगली की रफ़्तार धीमी थी, जैसे जल्दी में न हों, जैसे रात की कोई बात दोहरा रही हों। उनके होठों पर वही दबी आह थी जो कभी दीवार के उस पार से आती थी।
मैं कुछ सेकंड और खड़ा रहा। फिर पीछे किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
माँ थीं। बाल अभी भी बिखरे, नाइटी वही। उन्होंने मेरी आँखों का रास्ता देखा - श्रुति की नंगी पीठ, उनकी उँगली, मेरा खड़ा लंड। माँ के चेहरे पर गुस्सा नहीं आया। उन्होंने सिर्फ़ दरवाज़ा बंद करने का इशारा किया।
फुसफुसाहट में कहा, “माँ, मुझे दोनों सिस्टर्स का फिगर बहुत पसंद है।”
माँ की नज़र एक पल मेरे लंड पर गई, फिर अंदर भाप वाले शीशे पर। “अच्छा! मैं कुछ उपाय करती हूँ। मदारचोद के साथ बहनचोद बनाने के लिए!”
इतना कहकर वो खड़ी रहीं। मैंने हाथ उनकी गाँड पर रखा। नाइटी के नीचे पैंटी नहीं थी। माँ पीछे नहीं हटीं। मैंने उनके होठ अपने होठों पर रख दिए। सुबह की पहली चूत अभी सूखी भी नहीं थी, और बाथरूम के उस पार उनकी बेटी अपनी उँगली से वही आग बुझा रही थी।
माँ ने चुंबन तोड़ा। आवाज़ बहुत धीमी रखी, “पहले दरवाज़ा बंद कर मदारचोद! फिर मुझे अपने बिस्तर पर ले चलना!”
आगे की कहानी : "जल्द ही.."
💬 Leave a Comment :-
📝 Comments :
No comments yet. Be the first to comment!