बिना कंडोम माँ की कोख में भरा माल!
Family Sex : माँ की कमर दबाते सोफे पर किया गर्म! ब्लाउज खोल चूसे चूचे! पैंटी उतार चाटी चूत! बिना कंडोम लंड अंदर डाल, कोख में भरा माल! माँ बोली आखिरी बार!!
अभी तक आपने "माँ की चुदाई की चाहत! 02" में पढ़ा :-
माँ ने करवट बदली। नाइटी खिसकी। गली की रोशनी में उनकी जांघ की सफेदी दिखी, पैंटी की लेस। उन्होंने कंबल खींचा, पूरी नहीं ढकी।
“जा… अपने कमरे में जा। मेरी माँ वाली इज्जत अभी भी बचाकर रख। बाकी… बाकी सुबह बात करेंगे।”
“सुबह आप फिर सख्त बन जाओगी।”
बहुत पतली आवाज आई। “रात की बात रात में रहनी चाहिए। सुबह मैं पराठा बनाऊँगी। तू बेटा बनकर खाना। इतना कर सकता है?”
मैं पीछे हटा। “कर सकता हूँ। लेकिन रात फिर आएगी माँ।”
अपने कमरे में आकर दरवाजा बंद किया। लंड तना था, हाथ बढ़ा… फिर रोका। कल हाथ से निकाला था। आज नहीं। आज भूख जमा करनी थी।
अब आगे :-
अगला दिन घर में सामान्य बनने की कोशिश से भरा था। माँ ने पराठा बनाया, चाय दी, “जूते बाहर निकालो” कहा। चेहरा सख्त था। रात वाले खुले दरवाजे का कोई जिक्र नहीं। मैंने भी नहीं किया। सविता आंटी उस दिन नहीं आईं - और अच्छा रहा। आज का खेल सिर्फ दो लोगों का रहना था।
शाम को माँ सोफे पर बैठीं, कमर पकड़े। टीवी चल रहा था, देख नहीं रही थीं। मैंने पास जाकर कहा, “कमर फिर दर्द कर रही है?”
“हर रोज का है। खड़े-खड़े बर्तन, झूला कपड़ा… आदत हो गई है।”
“दबा दूँ?”
वो देखने लगीं। सुबह वाली माँ जवाब में ना कहती। रात वाली माँ ने एक सेकंड देर की। फिर बहुत संभलकर बोलीं, “सिर्फ कमर। और दरवाजा खुला रहना चाहिए। कोई बात नहीं बननी चाहिए इससे।”
मैं उनके पीछे फर्श पर बैठ गया। साड़ी की गांठ ढीली थी। हाथ कमर पर रखा तो वो तन गईं। हथेली के नीचे नाइटी नहीं, साड़ी की पतली गोट और गरम त्वचा थी। मैंने धीरे दबाया। माँ की साँस बदली।
“जोर से नहीं… हाँ, वहीं… बाईं तरफ गाँठ पड़ जाती है।”
हाथ नीचे सरका - कमर से कूल्हे की हड्डी तक। साड़ी थोड़ी खिसकी। गोरी कमर दिखी। माँ ने पकड़ा नहीं, सिर्फ कहा, “ऊपर ही रख हाथ। नीचे मत ले जा।”
“नीचे दर्द नहीं है?”
“है। लेकिन वहाँ बेटे का हाथ नहीं जाना चाहिए।”
मैं रुक गया। फिर एक इंच और नीचे गया। उंगलियाँ साड़ी के अंदर, पेटीकोट के ऊपर। माँ का शरीर काँपा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा — हटाने जितना जोर नहीं था।
“आरव… मैंने कहा था सुबह बात करेंगे। यह बात नहीं है। यह… यह छूना है।”
“रात आपने दरवाजा खुला छोड़ा था। सुबह सख्त बन गईं। अब कमर दुख रही है और हाथ रोक भी रही हैं, हटा भी नहीं रही हैं।”
वो चुप रहीं। टीवी की आवाज बीच में भर रही थी। मैंने माथा उनकी पीठ से लगाया। इत्र नहीं, साबुन और पसीने की गंध। “माँ, मैं आज सिर्फ दबा रहा हूँ। आप कहोगी तो रुक जाऊँगा।”
बहुत देर बाद उनकी आवाज आई, फटी हुई। “रुक मत… कमर दबाता रह। बाकी मत कर। मैं माँ हूँ अभी भी।”
हाथ और नीचे गया। पेटीकोट के नाड़े तक। माँ ने दाँत भींचे। जब उंगलियाँ नाड़े के अंदर गईं तो उन्होंने गर्दन पीछे कर ली, सिर मेरे कंधे से लगा।
“आह्ह्ह… आरव मत… वहाँ मत… मैं तेरी माँ हूँ… अह्ह्ह…”
जांघ के ऊपरी हिस्से की त्वचा जल रही थी। पैंटी की इलास्टिक मिली। गीली नहीं - अभी से नहीं, लेकिन गरम। मैंने सिर्फ बाहर से सहलाया। माँ की टांगें खुद थोड़ी खुलीं, फिर शर्म से बंद हुईं।
“पापा का ख्याल आता है तुझे?” मैंने कान के पास पूछा।
“आता है। इसीलिए रुक… अह्ह्ह… रुक न…” उन्होंने हाथ दबाया, हटाया नहीं। “वो पायलट हैं। फ्लाइट पर हैं। घर की इज्जत उनके नाम से चलती है। तू अगर… तू अगर आगे बढ़ा तो मैं उनकी बीवी कैसे रहूँगी?”
“गैर मर्द से नहीं हो रही बात।” मैंने कहा। “आपने सविता आंटी से खुद कहा था - गैर मर्द से नहीं चुदवाऊँगी। घर का लड़का सामने है।”
नाम आते ही वो जैसे झटकीं। “उसका नाम मत ले आज। वो घर में नहीं है। आज… आज सिर्फ तू और मैं। और मैं डर रही हूँ।”
मैं उनके सामने आ गया। घुटनों के बल। माँ की आँखें गीली थीं। साड़ी का पल्लू स्तनों पर था, साँस से उठ-गिर रहा था। मैंने पल्लू हटाया नहीं। सिर्फ चेहरा पास ले गया।
“एक बार कह दो जाओ तो चला जाऊँगा।”
वो बोलीं, “जाओ।” आवाज में जान नहीं थी।
मैं हिला नहीं। फिर उन्होंने आँखें बंद कीं और बहुत धीमे कहा, “मत जा। बस पागल मत बन। धीरे रहना। मैं चीखूँगी नहीं… लेकिन रो सकती हूँ।”
पहला किस उनके माथे पर था। दूसरा गाल पर। तीसरा होंठों के कोने पर। माँ के होंठ बंद थे। चौथे पर खुल गए। जीभ काँपती हुई मिली, जैसे खुद से लड़ रही हो।
मैंने कमर पकड़ी, उन्हें सोफे से और अपनी तरफ खींचा। साड़ी की गांठ खुल गई। ब्लाउज के हुक उंगलियों के नीचे आए।
“आरव… ब्लाउज मत खोल… अह्ह्ह… खोल रहा है तू… रुक…”
दो हुक खुले। 46 साल के भारी स्तन ब्रा में दबे थे, ऊपर से उमड़ रहे थे। मैंने ब्रा के ऊपर मुँह रखा। माँ के हाथ मेरे बालों में फंस गए - धक्का देने को उठे, दबाने को रुक गए।
“बेटा मत कर… तेरा मुँह वहाँ… अह्ह्ह श्रेया क्या कर रही है तू… आरव… धीरे…”
मैंने उन्हें खड़ा किया और कमरे की तरफ ले चला। वो साथ-साथ आईं। मना करती रहीं, कदम उठाती रहीं। उनके कमरे में वही बिस्तर था, वही लैपटॉप बंद पड़ा था, वही दरवाजा जिसे अब मैंने अंदर से बंद किया।
साड़ी उतरने में समय लगा। माँ ने खुद नहीं उतारी, रोकने जितना भी नहीं किया। पेटीकोट गिरा। ब्रा बची, पैंटी बची।
मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। ऊपर से देखा तो सख्त माँ नहीं थीं - साँस फूलती औरत थीं, जांघें भींचे, आँखें छत पर।
“लाइट बुझा दे।”
मैंने एक बल्ब छोड़ा। अंधेरा पूरा नहीं हुआ। ब्रा खोली तो स्तन बाहर आए — बड़े, गोरे, निप्पल काले और सख्त। मैंने एक मुँह में लिया। माँ की कमर उछली।
“आह्ह्ह… मत चूस ऐसे… मैंने तुझे दूध पिलाया था… अब तू… अह्ह्ह… काट मत… हाँ वहीं… भगवान आरव…”
पैंटी के ऊपर हाथ रखा तो गीली मिल गई। कल वाली उंगलियों वाली जगह अभी भी संवेदनशील थी। मैंने पैंटी खींच दी। चूत सामने थी — हल्के बाल, फूली फाँकें, चमक। माँ ने दोनों हाथों से ढकना चाहा। मैंने हाथ हटाए।
“देख मत… गंदी लग रही हूँगी… अह्ह्ह मत देख…”
“सुबह आपने मुझे गंदगी कहा था।” मैंने नीचे जाकर साँस उनकी जांघ पर छोड़ी। “अब वही गंदगी आपकी है।”
जीभ लगते ही माँ ने तकिया मुँह पर दबा लिया। आवाज दबकर निकली, “आह्हhhhh… मत चाटो… बेटा वहाँ मत… अह्ह्ह आरव रुक… नहीं… वहीं रख… धीरे…”
फाँकें मीठी-नमकीन थीं, गरम। क्लिट पर जीभ फेरी तो उनकी टांगें मेरे सिर को कस गईं। मैंने उंगली अंदर की — वही रास्ता जो कल उनकी अपनी उंगली ने लिया था। अंदर गरम और तंग। माँ का तकिया गिर गया।
“उह्ह्ह… अंगुली… निकल… नहीं मत निकाल… अह्ह्ह… पापा अगर… अगर फ्लाइट कैंसिल हो गई… अह्ह्ह मत सोच… आरव ऊपर आ…”
मैं ऊपर आया। पजामा नीचे किया। छह इंच का तना लंड उनकी जांघ पर पड़ा। माँ ने देखा और मुँह फेर लिया, फिर वापस देखा जैसे नजर हट ही न सके।
“कंडोम… ला… गैर…” शब्द अटका। उन्होंने आँखें बंद कीं। “गैर मर्द होता तो डालती। तू… तू मेरे पेट से आया है। मत डाल वो… बस… धीरे करना। दर्द होगा।”
नोक चूत के मुँह पर रखी। माँ की नाखून मेरी बाँह में गड़े। पहला धक्का छोटा था। आधा अंदर गया। माँ की आँखों से आँसू निकल आए।
“आह्ह्ह… दर्द… निकल… बेटा निकल… अह्ह्ह बहुत मोटा लग रहा है… रुक…”
मैं रुका। उनके माथे से पसीना पोंछा। बाहर नहीं निकाला। “कहोगी तो निकाल दूँगा।”
बहुत देर बाद उन्होंने सिर हिलाया — नहीं की तरफ नहीं, अंदर की तरफ। “धीरे… पूरा… कर ले… फिर सोचूँगी मैं क्या बची हूँ…”
मैं रुका रहा। आधा लंड उनकी चूत में था, दीवारें काँप रही थीं। माँ के आँसू गालों पर थे, नाखून बाँह में गड़े थे। फिर उन्होंने बहुत छोटी सी हामी भरी।
“धीरे… पूरा… कर ले…”
मैंने कमर दबाई। बाकी लंड अंदर खिसक गया। जड़ तक। माँ की चूत ने एक झटके में निगल लिया। उनकी कमर उठकर अटकी, मुँह खुला, आवाज पहले रुकी फिर फटी।
“आह्हhhhh… पूरा… पूरा अंदर है… आरव… माँ की चूत में पूरा लंड… अह्ह्ह… दर्द… दर्द के साथ मजा भी… मत हिल अभी…”
मैं नहीं हिला। सिर्फ अंदर धड़कन गिनी। उनके स्तन मेरे सीने से दबे थे, निप्पल चुभ रहे थे। माँ की साँस मेरे गले पर फूट रही थी।
“बोलो माँ, कैसा लग रहा है अपने बेटे का लंड?”
“मत पूछ… अह्ह्ह… गंदी बात मत पूछ… निकलेगा नहीं अब… फँस गया… कितना गरम है तू… भगवान श्रेया तूने क्या कर लिया…”
मैंने एक छोटा धक्का दिया। बाहर आधा, अंदर पूरा। चूत चप कर उठी। माँ ने आँखें भींचीं।
“बेटा मत… ऐसे मत चल… अह्ह्ह… धीरे… हाँ ऐसे… निकल… डाल… अह्ह्ह आरव…”
दूसरे धक्के पर उनकी टांगें खुद मेरी कमर पर लिपटने लगीं, शर्म से नहीं — दर्द संभालने से। तीसरे पर उन्होंने तकिया मुँह में दबाया। चौथे पर तकिया गिरा दिया।
“आवाज आ रही है… कोई सुन लेगा… अह्ह्ह… लेकिन मत रुक… धीरे ही सही… चोद… माँ को चोद रहा है तू… अह्ह्ह पाप लग रहा है और चूत मान नहीं रही…”
मैंने स्पीड एक पायदान बढ़ाई। बिस्तर की खटिया बोली। उनके भारी स्तन हर धक्के पर मेरे मुँह से टकराए। एक निप्पल मुँह में लिया, जोर से चूसा। माँ के हाथ मेरे बालों में और कस गए।
“आह्ह्ह… चूस… दूध नहीं निकलेगा… फिर भी चूस… हरामी बच्चे… अपनी माँ का चूचा मुँह में ले रखा है… अह्ह्ह काट मत… हल्का ले… हाँ…”
“सुबह खाल उधेड़ने वाली थीं। अब चूचा पिला रही हैं मदारचोद।”
“चुप कर… अह्ह्ह… सुबह की माँ मर गई रात को… अभी सिर्फ औरत बची है… जिसकी चूत में बेटे का लंड घुसा है… और जो… अह्ह्ह… जो मना नहीं कर पा रही…”
मैंने उनकी दोनों टांगें कंधों तक उठाईं। कोण बदला। लंड और गहरा चला। माँ की आँखें खुलीं, डर और नशा एक साथ।
“उफ्फ्फ… वहाँ… गर्भ तक लग रहा है… आरव रुक… नहीं मत रुक… मार… माँ की चूत मार… अह्ह्ह फाड़ दे… सख्त माँ की चूत फाड़…”
“पापा को याद है?”
शब्द लगते ही उनकी चूत ने लंड जकड़ लिया। आँखों में पानी आ गया, कमर रुकी नहीं।
“मत ले उनका नाम… अह्ह्ह… वो फ्लाइट पर हैं… आसमान में हैं… और उनकी बीवी बिस्तर पर बेटे से चुद रही है… अह्ह्ह गंदी… मैं रंडी हो गई आरव… और तेज़ कर… रंडी को तेज़ चोद…”
धक्के अब लय में थे। चप-चप तेज। उनकी गांड मेरे जांघों से पट रही थी। मैंने एक हाथ नीचे दिया, गांड की गोलाई मसली, थप्पड़ मारा। आवाज कड़की। माँ की चूत और भीगी।
“आह्ह्ह… मार गांड पर… सख्त माँ को थप्पड़ खाते मजा आ रहा है… अह्ह्ह… तूने खाल उधेड़ने कहा था ना… उधेड़… चूत उधेड़…”
“कितनी प्यासी थी माँ? उंगली से काम नहीं चल रहा था ना? जवान लंड चाहिए था।”
“चाहिए था… अह्ह्ह कबूल है… सविता सही कहती थी… जवान लड़के पर मरती हूँ… अपने लड़के पर… अह्ह्ह शर्म से मर जाऊँ… लेकिन अभी मत निकाल… अंदर रख… पूरा रख…”
मैंने उनके मुँह पर हाथ रखा, फिर हटाया। “चीखो। घर में हम ही हैं। पापा की फ्लाइट हफ्ते भर बाद है। आज चीखो।”
माँ ने दबी चीख खोली। “आह्हhhhh… आरव… माँ झड़ने वाली है… बेटे के लंड पर झड़ रही हूँ… अह्ह्ह आ गया… आ गया…”
शरीर अकड़ा। चूत फड़क-फड़क कर निचोड़ने लगी। उनके पानी ने मेरा लंड और फिसलन भरा कर दिया। मैं रुकने वाला था बाहर निकालने को। माँ ने कमर पकड़कर अंदर खींच लिया।
“अंदर… कंडोम नहीं… गैर मर्द होता तो डालती… तू मेरे खून का है… अह्ह्ह छोड़ अंदर… माँ की चूत में माल भर… कोख में उतार…”
कमर अकड़ी। पहला झटका गहरा गया। गरम माल उनकी चूत में छूटा। माँ हर झटके पर काँपीं, नाखून पीठ पर लकीरें काटते रहे।
“उफ्फ्फ… कितना गरम… भर गया… अह्ह्ह आरव… और निकले तो और दे… निकाल मत अभी… अंदर धड़कने दे…”
मैं उनके ऊपर गिरा। लंड अभी भी अंदर था, ढीला पड़ता, उनकी दीवारें चूस रही थीं। माँ की साँस मेरे कान पर टूटी। बहुत देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ पसीना और चूत से रस मिलकर बहने की हल्की आवाज।
फिर उन्होंने छत की तरफ देखा। आवाज फिर माँ वाली हो चली, लेकिन शरीर अभी भी लिपटा था।
“यह आखिरी बार था। सुन रहा है? आखिरी। सुबह मैं पराठा बनाऊँगी। तू बेटा बनकर खाना। यह रात किसी को नहीं बतानी। सविता को भी नहीं। उस औरत को लगा कि दरवाजा खुल गया तो वो घुस आएगी।”
मैंने लंड बाहर निकाला। उनकी चूत से सफेद माल रिसने लगा, जांघों पर लकीरें बनाता। माँ ने टांगें जोड़ीं, जैसे छुपा सकें। छुप न सका।
“आखिरी बार कह रही हो, दरवाजा कल भी खुला रहेगा।”
वो मेरी तरफ देखीं। आँखों में पानी था, इंकार अधूरा था। “ताला लगाऊँगी।”
“तीन रात से नहीं लगाया।”
उन्होंने मेरा सिर अपने स्तनों से लगा लिया — बचपन वाला अंदाज, निप्पल मेरे होंठों से चिपकता। “सो जा। मेरे बगल में मत सो। अपने कमरे जा। मुझे माँ बनने दे कुछ घंटे।”
मैं उठा, पजामा पहना। दरवाजे पर मुड़ा। माँ नंगी पड़ी थीं, जांघों के बीच मेरा माल चमक रहा था, एक हाथ चूत पर रखा था जैसे खुद को सँभाल रही हों।
“माँ।”
“हम्म।”
“पापा की फ्लाइट कैंसिल हो गई तो?”
बहुत देर बाद जवाब आया। “तो तू बेटा बन जाना उसी वक्त। रात की भूख दिन में मत निकालना। मैं… मैं कोशिश करूँगी यह आखिरी रहे।”
कमरे से निकला। गलियारे में सन्नाटा था। उनके दरवाजे की कुंडी मैंने नहीं लगाई। उन्होंने भी नहीं लगाई।
सुबह पराठा मिला। चाय मिली। “जूते बाहर निकालो” मिला।
सख्त माँ वापस आ गई थी।
रात वाले निशान उनकी चलने की चाल में दबे थे।
और दरवाजा… दोपहर तक बंद रहा, रात ग्यारह बजे फिर एक बित्ता खुला था।
सविता आंटी का फोन सुबह आया। माँ ने दूसरी रिंग पर काट दिया।
पापा का मैसेज आया — फ्लाइट शेड्यूल वैसे का वैसा। अभी समय था।
माँ ने कहा था आखिरी बार।
कुंडी ने कहा था - झूठ!!!
आगे की कहानी सविता की जुबानी जल्द ही :...।
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