सौतेली बहन की चुत को भाई ने जवानी में बजाया!
Family Hindi Sex Kahani : सौतेली बहन नैना की चुत-गांड दोनों भाई ने फाड़ी! बचपन की करीबी को जवानी में निचोड़ा! भाई बहन की बचपन से लेकर जवानी तक की पूरी कामवासना!
मेरा नाम आरव शर्मा है। आजकल उम्र 25 हो गई है, लेकिन ये कहानी लगभग चार साल पहले की है। जब मैं 21 का था।
नैना मेरी सौतेली बहन है। पापा की दूसरी शादी से। जब वो हमारे घर आई थी तब मैं नौ साल का था और वो आठ की।
पहले तो हमें एक-दूसरे से चिढ़ थी। खिलौने छीनना, टीवी रिमोट के लिए लड़ना, खाने में आखिरी पूरी के लिए हाथापाई… रोज का कार्यक्रम था। लेकिन धीरे-धीरे वो लड़ाईयाँ बदल गईं।
हम एक ही स्कूल जाने लगे। एक ही गली में साइकिल चलाते। शाम को छत पर बैठकर आसमान में उड़ते हुए पतंगों को देखते। जब पापा देर से आते तो हम दोनों किचन में जाकर Maggi बनाते और चुपके से खा जाते।
नैना हमेशा मेरी वाली मैगी में ज्यादा मसाला डालती थी क्योंकि उसे पता था कि मुझे तीखा पसंद है। मैं उसके स्कूल बैग में चुपके से चॉकलेट रख देता था। छोटी-छोटी बातें थीं, लेकिन उन्हीं से हम करीब आने लगे।
जब मैं बारह-तेरह का हुआ और वो ग्यारह-बारह की, तब हम लगभग हर बात एक-दूसरे को बताने लगे। स्कूल में किसने क्या कहा, टीचर ने कैसे डाँटा, दोस्तों के झगड़े… सब। कभी-कभी रात को जब सब सो जाते तो वो मेरे कमरे में आ जाती।
फर्श पर बैठकर बातें करती रहती। मैं बिस्तर पर लेटा रहता। हम घंटों बात करते। कोई बड़ी बात नहीं होती थी। बस… साथ होना अच्छा लगता था।
उम्र बढ़ी तो जिस्म भी बदलने लगे। नैना की लंबाई बढ़ी, आवाज़ में नर्मी आई, और स्कूली यूनिफॉर्म में उसका अंदाज़ बदलने लगा। मैंने नोटिस किया, लेकिन कुछ कहा नहीं। अजीब सा लगता था।
जैसे कोई चीज़ बदल रही हो, लेकिन नाम नहीं दे सकते थे। कभी-कभी वो नहाकर निकलती तो बाल खुले होते, और मैं जानबूझकर दूसरी तरफ देख लेता। वो भी मेरे बारे में कुछ सोचती होगी, लेकिन हम दोनों ने कभी उस बारे में बात नहीं की।
हम अभी भी बेस्ट फ्रेंड की तरह थे। बल्कि उससे भी ज्यादा। घर में कोई मेहमान आता तो हम दोनों मिलकर प्लान बनाते कि कैसे उससे पिंड छुड़ाएँ। परीक्षा के दिनों में रात-रात भर साथ पढ़ते।
कभी मैं उसके बालों में तेल लगाता जब उसे सिर दर्द होता, कभी वो मेरे माथे पर ठंडा कपड़ा रखती जब मुझे बुखार आता। वो छूना बहुत साधारण था। जैसे भाई-बहन का होता है। लेकिन कभी-कभी वो छूना थोड़ा देर तक रह जाता था… और दोनों में से कोई हटाता नहीं था।
जब नैना सत्रह की हुई तो उसे पुणे के कॉलेज में एडमिशन मिल गया। जाने से पहले वाली रात हम दोनों छत पर बैठे थे। बहुत देर तक चुप रहे। फिर उसने धीरे से कहा, “आरव… तुमसे बात नहीं कर पाऊँगी रोज। अजीब लगेगा।”
मैंने सिर्फ इतना कहा, “फोन कर लिया करो।” उसने सिर हिलाया। फिर अचानक मेरे कंधे पर सिर रख दिया। मैंने भी कुछ नहीं कहा। बस बैठा रहा। उस रात हमें नींद नहीं आई।
कॉलेज के बाद बातें कम होती गईं। पहले रोज़, फिर हफ्ते में दो-तीन बार, फिर कभी-कभी। फिर एक दिन पापा ने बताया कि नैना की शादी तय हो गई है। अच्छा लड़का है, बिजनेस फैमिली से। मैं शादी में गया। लाल जोड़े में वो बहुत सुंदर लग रही थी।
जब हमारी नज़रें मिलीं तो उसने मुस्कुराकर देखा, लेकिन वो मुस्कान पुरानी वाली नहीं थी। जैसे कुछ खो गया हो।
डेढ़ साल बाद एक रात फोन आया। आवाज़ उसकी थी, लेकिन बहुत थकी हुई।
“आरव… मैं घर आ रही हूँ।”
“क्या हुआ?”
थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर उसने कहा, “शादी… नहीं चल रही। वो मुझे समझता ही नहीं। बात भी नहीं करता ठीक से। मैं… मैं घर आना चाहती हूँ।”
तीन दिन बाद वो इंदौर पहुँची। मैं स्टेशन गया था। उसे देखते ही लगा जैसे सालों पुरानी कोई चीज़ वापस मिल गई हो। उसने मुझसे गले मिला। वो गले मिलना थोड़ा लंबा हो गया। दोनों में से कोई पहले नहीं हटा।
घर आकर पहले दो दिन सिर्फ बातें हुईं। लंबे-लंबे। छत पर, उसके पुराने कमरे में, किचन में चाय बनाते हुए। उसने बताया कि शादी में कितनी अकेली महसूस करती थी।
मैंने सिर्फ सुना। कभी-कभी उसकी आँखें भर आतीं तो मैं चुपचाप पानी का गिलास पकड़ा देता।
चौथे दिन शाम को हम फिर छत पर बैठे। हवा में हल्की ठंडक थी। नैना ने पैर फैला रखे थे। मैं उसके बगल में बैठा था। काफी देर तक कुछ नहीं बोला कोई।
फिर उसने धीरे से कहा, “याद है… जब हम छोटे थे और रात को चुपके से मैगी बनाते थे?”
मैं मुस्कुराया, “हाँ। तू हमेशा मेरी वाली में ज्यादा मसाला डालती थी।”
वो भी हँसी। फिर चुप हो गई। कुछ देर बाद बोली, “आरव… तुम्हारे साथ बैठकर बात करना… बहुत अच्छा लग रहा है। बहुत दिनों बाद ऐसा लगा है जैसे कोई सच में सुन रहा हो।”
मैंने उसकी तरफ देखा। वो भी मुझे देख रही थी। नज़रें कुछ सेकंड ज्यादा रुक गईं। फिर दोनों ने दूसरी तरफ देख लिया।
उस रात हम बहुत देर तक बैठे रहे। कोई छूने की बात नहीं हुई। कोई गंदी बात नहीं हुई। बस… पुरानी सी करीबी वापस आ रही थी। धीरे-धीरे। बहुत धीरे।
और कहीं अंदर… दोनों को अहसास हो रहा था कि ये करीबी अब पहले जैसी साधारण नहीं रह गई है।
अगले तीन-चार दिन घर में अजीब-सा माहौल रहा। पापा ऑफिस चले जाते, मम्मी अपने कामों में व्यस्त रहतीं। नैना और मैं घर में रह जाते।
सुबह वो देर से उठती। मैं उसके लिए चाय बना देता। पहले तो वो बस “धन्यवाद” कहकर ले लेती थी। फिर एक दिन उसने मग मेरे हाथ से लिया और उँगलियाँ हल्के से छू गईं। दोनों ने नज़रें मिलाईं… और तुरंत हटा लीं। छोटी-सी बात थी, लेकिन रह गई।
दोपहर को हम पुरानी फोटो एलबम निकालकर बैठे। बचपन की तस्वीरें। दोनों मैले कपड़ों में, मुँह में आइसक्रीम लगाए, छत पर पतंग के साथ। नैना हँस रही थी।
अचानक वो चुप हो गई और एक फोटो पर उँगली रखकर बोली, “ये वाला दिन याद है? तूने मेरी साइकिल ठीक की थी और मैं रो रही थी क्योंकि घुटने में चोट लग गई थी।”
मैंने सिर हिलाया। “तुझे कंधे पर बैठाकर घर तक ले आया था।”
“हाँ…” उसने धीरे से कहा। “तब तू बहुत… सुरक्षित लगता था।”
उस दिन के बाद से वो बात बार-बार मेरे दिमाग में घूमने लगी। सुरक्षित।
शाम को हम गली में घूमने निकले। पुरानी दुकानें, वही पानवाला, वही नुक्कड़। नैना ने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया। जैसे बचपन में पकड़ती थी जब कोई कुत्ता भौंकता था।
लेकिन अब हाथ पकड़ना अलग लग रहा था। उसके हाथ नरम थे, थोड़े ठंडे। मैंने छुड़ाने की कोशिश नहीं की। हम दोनों चुपचाप चलते रहे। कुछ देर बाद उसने हाथ छोड़ दिया, लेकिन उँगलियों का अहसास देर तक रहा।
रात को छत पर बैठना अब रोज की आदत बन गया था। एक रात हवा थोड़ी तेज़ चल रही थी। नैना ने अपने बालों को बाँधते हुए कहा, “आरव, क्या तुमने कभी सोचा कि हम बड़े होकर भी इतने करीब रहेंगे?”
मैंने जवाब नहीं दिया। वो खुद ही बोली, “मैंने सोचा था शादी के बाद सब बदल जाएगा। लेकिन… कुछ चीज़ें अंदर ही रह जाती हैं।”
उसने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया। इस बार मैंने हटाया नहीं। उसकी साँसें मेरे गले के पास महसूस हो रही थीं। कपड़ों के ऊपर से उसके शरीर की गर्माहट आ रही थी।
हम दोनों काफी देर तक ऐसे ही बैठे रहे। कोई नहीं बोला। बस शहर की हल्की आवाज़ें आ रही थीं – दूर कोई कुत्ता भौंक रहा था, कोई गाड़ी का हॉर्न।
जब वो उठी तो मेरे कंधे पर उसका वजन कुछ सेकंड और रहा। फिर उसने धीरे से कहा, “गुड नाईट, आरव।” आवाज़ में वो पुरानी बेफिक्री नहीं थी। कुछ और था।
अगले दिन बारिश हो गई। अचानक। हम दोनों घर के अंदर थे। बिजली चली गई। अंधेरा। मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई। नैना किचन से चाय बनाकर लाई। हम फर्श पर बैठ गए। टॉर्च की रोशनी में उसका चेहरा आधा अंधेरे में था।
बातें होने लगीं। पुरानी। कॉलेज की, स्कूल की, उन दिनों की जब हम दोनों बीमार पड़ जाते और एक-दूसरे को दवा खिलाते। फिर अचानक नैना ने पूछा, “तुम्हें कभी… अजीब लगता है? मेरे इतने करीब होने से?”
मैंने झूठ नहीं बोला। “कभी-कभी।”
वो मुस्कुराई। “मुझे भी।”
फिर चुप्पी। टॉर्च की रोशनी काँप रही थी। नैना ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरी हथेली पर रख दिया। उँगलियाँ धीरे-धीरे मेरी उँगलियों में फँस गईं। हमने एक-दूसरे को देखा। इस बार नज़रें नहीं हटीं। काफी देर तक।
बारिश बाहर जोरों से पड़ रही थी। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें सुनाई दे रही थीं।
नैना ने धीरे से अपना सर मेरे कंधे की तरफ झुकाया। मैंने भी सर थोड़ा झुका लिया। हमारे माथे लगभग छूने वाले थे। इतने करीब कि उसकी साँस मेरे होठों पर महसूस हो रही थी।
लेकिन किसी ने आगे नहीं बढ़ाया।
कुछ सेकंड बाद वो पीछे हट गई। मुस्कुराई… थोड़ी शर्माई हुई मुस्कान। “चाय ठंडी हो गई होगी।”
मैंने भी मुस्कुराकर हाँ कहा। लेकिन अंदर कुछ टूट रहा था। या बन रहा था। समझ नहीं आ रहा था।
उस रात सोते समय मैंने बार-बार छत की तरफ देखा। नैना के कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर अंधेरा था। मैंने सोचा कि उठकर जाऊँ… लेकिन नहीं गया।
अगली सुबह नाश्ते के टेबल पर हमारी नज़रें मिलीं। दोनों ने जल्दी से दूसरी तरफ देख लिया। मम्मी ने पूछा, “रात को देर तक बातें कर रहे थे क्या? आवाज़ आ रही थी।”
नैना ने हल्के से जवाब दिया, “हाँ… पुरानी बातें।” मेरी तरफ एक पल के लिए देखा। आँखों में कुछ था जो पहले कभी नहीं देखा था।
दो दिन और बीत गए। हम और करीब आते जा रहे थे… लेकिन छूने से बचने की कोशिश भी कर रहे थे। जैसे दोनों जानते हों कि एक बार सीमा पार हुई तो वापस नहीं आ पाएँगे।
एक शाम नैना ने कहा, “चलो, पुराना पार्क घूम आते हैं। जहाँ हम साइकिल चलाया करते थे।”
हम निकले। पार्क लगभग खाली था। पेड़ों के नीचे लंबी बेंच पर बैठ गए। सूरज डूब रहा था। नैना ने पैर मोड़ लिए और मेरे करीब खिसक आई। कंधे सट गए।
“आरव…” उसने बहुत धीमे से कहा, “मैं घर आकर… सबसे ज्यादा तुम्हें ही देखना चाहती थी।”
मैंने उसकी तरफ देखा। वो भी मुझे देख रही थी। आँखों में नमी थी।
मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसके बालों से एक तिनका हटाया। उँगलियाँ उसके गाल से हल्के से छू गईं। वो सिहर गई। लेकिन हटी नहीं।
हम दोनों ऐसे ही बैठे रहे। सूरज पूरी तरह डूब गया। आसमान में लालिमा फैल गई।
और कहीं दोनों के अंदर… एक खामोश सी आग सुलगने लगी थी। अभी भी काबू में। अभी भी धीमी। लेकिन अब बुझने वाली नहीं थी।
अगली सुबह नाश्ते पर अजीब सी खामोशी थी। नैना ने मुझसे नज़रें मिलाईं तो दोनों ने जल्दी से प्लेट की तरफ देख लिया।
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