रोशनी की गैंगबैंग: एक रात सात लंड
Gangbang Group Sex Stories - शादीशुदा रोशनी ने ग्रुप में मंगवाई गैंगबैंग! 7 मर्दों ने दोनों होल एक साथ फाड़े! चेहरे और कोख में माल भरकर बनाया हवस की मालकिन!
मेरा नाम रोशनी है। उम्र बत्तीस साल। शादी को आठ साल हो चुके थे। पति अच्छा था, घर चलाता था, बातों में मधुर था - लेकिन बिस्तर पर अब बिल्कुल नाकाफी। महीनों से मेरी चूत तरस रही थी।
रात भर उंगलियाँ डाल-डालकर थकान निकालती, कभी तकिया के नीचे मुँह दबाकर कराहती, लेकिन मन नहीं भरता था। शरीर में आग सुलगती रहती। सुबह आईने में चेहरा सामान्य दिखता, अंदर कुछ और जलता।
एक शाम मैंने फैसला कर लिया। अब और इंतजार नहीं।
मैंने एक प्राइवेट ग्रुप में मैसेज किया -
“बत्तीस साल की औरत हूँ। आज रात गैंगबैंग चाहिए। जितने लंड आ सकें, सब आ जाएँ। कोई सीमा नहीं। सिर्फ सहमति वाले मर्द आएँ। जबरदस्ती का कोई काम नहीं चलेगा।”
मैसेज जाते ही दिल की धड़कन तेज हो गई। डर भी था, उत्साह भी। उंगली स्क्रीन पर काँप रही थी। एक घंटे में जवाब आने लगे। सात आदमी तैयार हो गए। सबने साफ लिखा कि वो सहमति से आ रहे हैं।
कोई अठारह से कम नहीं था। उम्र पच्चीस से चालीस के बीच थी। किसी ने फोटो भेजी, किसी ने सिर्फ एक लाइन - “रात ग्यारह बजे।”
रात के ग्यारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने काले रंग की पतली ब्रा और पैंटी पहन रखी थी। बाल खुले थे। होंठ हल्के लाल।
आईने में खुद को देखा - साँस तेज चल रही थी, पैंटी पहले से थोड़ी गीली। दरवाजा खोला तो सात जोड़ी आँखें मुझ पर टिक गईं।
सबसे पहले एक लंबा, मजबूत आदमी अंदर आया। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा और बोला, “बिल्कुल वैसी ही हो जैसी मैसेज में लिखा था।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “अंदर आ जाओ। सब आ जाओ।”
दरवाजा बंद होते ही माहौल बदल गया। एक ने मुझे दीवार से सटा दिया। उसके हाथ सीधे मेरे स्तनों पर चले गए। ब्रा खोल दी गई। 36 D के नरम स्तन बाहर निकल आए।
उसने दोनों निपल्स मुँह में ले लिए और जोर-जोर से चूसने लगा। दाँत हल्के से काटे तो मुँह से कराह निकली - “आह्ह्ह… हाँ… ऐसे… अह्ह्ह काटो…”
पीछे से दूसरे आदमी ने पैंटी खींच ली। पैंटी गीली हो चुकी थी, जाँघ से चिपककर नीचे आई। उसने दो उंगलियाँ चूत में डाल दीं और तेजी से हिलाने लगा। “कितनी गीली है पहले से,” उसने कहा।
सिर पीछे किया। “बहुत दिनों से तरस रही हूँ… आज पूरा निकालना है। अह्ह्ह… उंगली और अंदर… हाँ…”
तीसरे ने मुँह में अपना लंड ठूँस दिया। गर्म, कठोर और नमकीन। गला खोलकर चूसना शुरू किया। थूक बहने लगा, ठुड्डी तक आया। “उम्मम्म… गप… गप…” चारों तरफ हाथ थे।
कोई स्तन मसल रहा था, कोई गांड दबा रहा था, कोई बाल पकड़कर मुँह में और गहरा लंड धकेल रहा था। आँखें भर आईं, लेकिन सिर पीछे नहीं किया।
फिर उन्होंने बिस्तर पर लिटा दिया।
एक मोटे लंड वाला आदमी ऊपर चढ़ा। लंड चूत के मुँह पर रगड़ा - ऊपर-नीचे, चिपकता हुआ - फिर एक झटके में अंदर घुसा दिया। इतना जोरदार धक्का था कि साँस रुक गई।
“आह्हhhhh… साले… इतना मोटा… अह्ह्ह…” बिना रुके पेलना शुरू कर दिया। बिस्तर चरमरा रहा था। कंधे पकड़कर कराह रही थी। हर धक्के पर चूत खुलती जा रही थी।
“और जोर से… तोड़ डाल इसे… आह्ह्ह… फाड़… अह्ह्ह…”
तभी दूसरा सिर की तरफ आया। लंड मुँह में डाल दिया। ये Group Sex Gangbang की Hindi Sex Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
अब दो लंड एक साथ - एक चूत में, एक मुँह में। गला भर गया, आँखों से पानी आ गया, फिर भी चूसती रही। तीसरा गांड के पास आ गया। थूक लगाया, उंगली से पहले ढीला किया।
“आह्ह्ह… वहाँ… धीरे… अह्ह्ह…” उंगली घुमी, फिर धीरे-धीरे लंड गांड में धकेलने लगा। छेद फैला, दर्द और मजा एक साथ चढ़े।
तीनों होल भर गए।
मुँह में लंड, चूत में लंड, गांड में लंड।
बीच में दबकर कराह रही थी। आवाजें निकल रही थीं लेकिन लंड की वजह से साफ नहीं आ रही थीं।
सिर्फ “उम्मम्म… आआआ… अह्ह्ह…” पूरे कमरे में गूँज रही थीं। किसी ने बाल पकड़े, किसी ने निपल मरोड़ा।
गांड वाले ने कमर पकड़कर गहरा किया। “आह्ह्ह… गांड फट रही है… मत निकाल… अह्ह्ह और…”
उन्होंने पोजीशन बदली।
कुत्ते की तरह कर दिया। एक ने पीछे से चूत में लंड डाला, जोर-जोर से पेलने लगा। हाथ कमर पर थे। हर धक्के के साथ गांड थरथरा रही थी — थप… थप… फच-फच। सामने वाले ने मुँह पकड़कर लंड अंदर किया।
तीसरे ने स्तन दोनों हाथों से मसलने शुरू कर दिए। निपल्स इतने सख्त हो गए कि दर्द होने लगा, लेकिन मजा भी आ रहा था।
“आह्ह्ह… मसलो… काटो… अह्ह्ह रंडी बना दो…”
“आज इसकी दोनों होल फाड़ दो,” एक ने कहा।
बाकी तीन इंतजार में खड़े थे। अपने लंड हिला-हिलाकर देख रहे थे। कभी कोई आकर मुँह में लंड डाल देता, थूक लगवाकर हटा लेता। मैं हाथ बढ़ाकर किसी का लंड पकड़ लेती, सहलाती, फिर छूट जाता जब पीछे वाला जोर से धक्का देता।
“आह्ह्ह… चूत… गांड… मुँह… सब ले लो… अह्ह्ह आज सीमा नहीं… आह्ह्ह…”
जब पहला झड़ने के करीब पहुँचा तो लंड निकाला और चेहरे पर, स्तनों पर, पेट पर गाढ़ा सफेद माल उड़ेल दिया। गर्म वीर्य होंठों और आँखों तक पहुँच गया। जीभ निकालकर चाटने लगी - नमकीन, गाढ़ा।
“उम्म… और दो… मुँह में भी…” तभी दूसरे ने सीधा चूत में ही झड़ दिया। गर्म-गरम वीर्य अंदर फैलते ही शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“आह्हhhhh… भर गया… अह्ह्ह अंदर… हाँ…” तीसरे ने गांड से लंड निकाला और पीठ पर माल छोड़ दिया। गरम लकीर कमर तक बह गई।
लेकिन खेल खत्म नहीं हुआ था।
उन्होंने थोड़ा आराम दिया। पानी का गिलास मुँह से लगाया। मैं हांफ रही थी, चूत और गांड दोनों से उनका माल बह रहा था, जाँघें काँप रही थीं। एक ने बाल सहलाए। “चल रही है अभी?”
मैंने आँखें खोलीं। मुस्कुराई। आवाज टूटी हुई थी। “हाँ… चल रही है। अभी तो बस… अह्ह्ह… शुरुआत है।”
दो आदमी फिर पास आए। लंड दोबारा तन चुके थे। बिस्तर गीला था। कमरे में वीर्य और पसीने की गंध फैल चुकी थी। मैंने टाँगें खुद फैला दीं।
“इस बार… दोनों एक साथ… चूत और गांड… आह्ह्ह जल्दी…”
इस बार दो आदमियों ने उठा लिया। एक ने नीचे से चूत में लंड डाला - पहले वाले का माल अभी अंदर ही था, इसलिए लंड फिसलकर गहरा चला गया।
“आह्हhhhh… भरा हुआ है… फिर भी अंदर… अह्ह्ह…” दूसरे ने ऊपर से गांड में धकेला। हवा में झूल रही थी। दोनों लंड एक साथ अंदर-बाहर। चूत और गांड दोनों फटने के कगार पर थे। दर्द हो रहा था, मजा पागलपन के स्तर का था।
“हाँ… ऐसे ही… रंडी बना दो मुझे… और जोर से… आह्ह्ह दोनों फाड़ दो… अह्ह्ह…” ये Antarvasna Nonveg Chudai Ki Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
नीचे वाले के कंधे नाखूनों से लाल हो गए। ऊपर वाले ने बाल पकड़ रखे थे। हर मिलान पर शरीर काँपता। बाकी चारों चारों तरफ खड़े थे।
कोई स्तन मसल रहा था, कोई मुँह में उंगली डाल रहा था, कोई अपना लंड मेरे हाथ में थमाए हुए था। मैं सहलाती, चूसती, फिर चीख पड़ती जब दोनों एक साथ गहराई तक जाते।
“उम्मम्म… आआआ… चूत फट गई… गांड भी… मत रोको… अह्ह्ह…”
एक-एक करके बाकी ने भी बारी ली। किसी ने मुँह में झड़कर पूरा वीर्य पिला दिया — गला भर गया, कुछ बाहर बह निकला, जीभ से चाट लिया। किसी ने स्तनों के बीच लंड रगड़कर माल गिराया, निपलों पर सफेद धब्बे चमकने लगे।
किसी ने जाँघों पर। किसी ने फिर चूत में घुसकर अंदर ही छोड़ा। कमरा वीर्य की गंध से भर गया था। पूरा शरीर चमक रहा था - चेहरा, बाल, पेट, पीठ।
एक ने मुझे दीवार से सटाया, एक टांग कंधे पर उठाई, चूत में ताबड़तोड़ पेलने लगा। “आह्ह्ह… खड़ी-खड़ी… अह्ह्ह साले और… तोड़…” पीछे से दूसरे ने गांड में उंगली कर दी, फिर लंड से बदल दिया। दोबारा दोनों होल भर गए।
मैं दीवार से सिर टिकाए कराह रही थी। आवाज अब दबाने की कोशिश नहीं थी। फ्लैट में गूँज रही थी - “आह्हhhhh… भर दो… सब भर दो… अह्ह्ह रंडी की चूत… रंडी की गांड…”
रात के लगभग तीन बज गए थे जब आखिरी आदमी भी झड़ लिया। उसने मुँह में छोड़ा। निगला। फिर बिस्तर पर गिर गई।
चूत और गांड दोनों से सफेद गाढ़ा माल बह रहा था। मुँह के कोनों पर, बालों में, स्तनों पर, पेट पर हर जगह उनके वीर्य के निशान थे।
शरीर दर्द कर रहा था - जाँघें काँप रही थीं, छेद सूजे हुए थे - लेकिन मन पहली बार पूरी तरह शांत और संतुष्ट था। साँसें धीमी पड़ रही थीं, फिर भी मुँह पर हल्की मुस्कान थी।
आँखें बंद करके कहा, “कल फिर आना। अगली बार दस लोग लाना। आज तो बस शुरुआत थी।”
सब हँसे। कमरे में कपड़े ढूँढ़ने की आवाज आने लगी। एक ने बाल सहलाते हुए कहा, “तू असली रंडी है। ऐसी औरत कम मिलती है।”
आँखें खोलीं। मुस्कुरा दी। आवाज अभी भी कटी हुई थी।
“मैं रंडी नहीं। मैं अपनी हवस की मालकिन हूँ।”
एक-एक करके निकले। दरवाजा बंद हुआ। फ्लैट अचानक बहुत शांत हो गया। सिर्फ पंखे की आवाज और अपनी ही साँस। बिस्तर देखा - चादरें भीगी, तकिया दागदार, हवा में वही गंध।
उठी तो जाँघों के बीच से और माल बह निकला। बाथरूम तक पैदल जाना भी काँपते कदमों से हुआ।
सुबह जब सब चले गए तो नहाई। पानी गरम था। शरीर पर उनके नाखूनों और दाँतों के निशान थे - गर्दन पर, स्तनों पर, कमर पर। चूत और गांड अभी भी हल्के सूजे हुए थे।
उंगली से छुआ तो दर्द के साथ एक हल्की सिहरन और दौड़ गई। आईने में खुद को देखा। चेहरा थका था, आँखें अलग थीं। आठ साल की शादी के बाद पहली बार ऐसा चेहरा लगा जो संतुष्ट हो।
निकलकर फोन उठाया। उंगलियाँ अभी भी काँप रही थीं, लेकिन इस बार डर से नहीं। मैसेज लिखा -
“अगली रात तैयार रहना। इस बार और लंबा खेल होगा।”
भेज दिया। फोन किनारे रखा। बिस्तर पर लेट गई - साफ चादर अभी बिछानी बाकी थी, गीली वाली को ही खींच लिया। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन में फिर से आग सुलगने लगी थी।
बंद आँखों में वही सात चेहरे घूम रहे थे, वही धक्के, वही गरम माल। बत्तीस साल की उम्र में पहली बार लगा कि सच में जी रही हूँ।
पति सुबह दफ्तर जाएगा। पूछेगा रात कैसी रही। जवाब वही पुराना होगा - सो गई थी जल्दी।
और रात को फिर दरवाजा खुलेगा।
अब पता था कि मेरी भूख आसानी से नहीं बुझने वाली।
और बुझाना भी नहीं चाहती थी।
आपकी रोशनी!
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