नैनीताल में बुआ की चूत पर भतीजे का टैटू! 02
Desi Antarvasna Kahani : भतीजे ने बुआ की चूत-गांड दोनों फाड़ी, घर-दुकान-बालकनी में डेली चोदा! फिर बुआ ने चूत पर हाश्मी का टैटू बनवाकर बन गई भतीजे की घरेलू रखैल!
अभी तक आपने "नैनीताल में बुआ की चूत पर भतीजे का टैटू!" में पढ़ा :-
हम एक दूसरे के होठों से रस चूस रहे थे। आंटी मुझे अपन ऊपर खींच रही थी उन्होंने अपनी टांगे खोली और मुझे अपन ऊपर लेकर कमर पर टांगे बांधी।
वो बेतहाशा मुझे चूम रही थी उनकी जीभ मेरे मुंह के अंदर कोने कोने में घूम रही थी। फिर मैने उनको उठाकर ब्रा को निकाल फेंका उनके मोटे सांवले चूचे मेरे सामने झूम रहे थे काले निप्पल बिल्कुल चॉकलेट जैसे लग रहे थे।
मैने आंटी से कहा “ मैं आपका बजाऊंगा मगर फिर मेरे अलावा इस जिस्म को कोई दूसरा नहीं छुएगा।” आंटी ने मेरे लंड को पकड़कर कहा “मैं तेरी हूं हमेशा के लिए तेरी रण्डी बनकर रहूंगी।”
अब आगे :-
फिर हमने जोश से भरे 10 मिनट तक होठ चूसे। उसके बाद मैने अपना कच्छा उतार दिया और उनके पेटीकोट को भी निकल फेंका हम दो नंगे गर्म जिस्म अब वासना की आग में जलने के लिए तैयार थे।
मैं उठा और लंड को हाथ में लेकर आंटी को आने का इशारा दिया आंटी एक कातिल मुस्कान के साथ मेरे लंड पर झुक गई और मेरे 7 इंच के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी वो बहुत खूबसूरती के साथ लंड चूस रही थी।
आंटी ने अपने थूक से मेरे लंड को अच्छी तरह से चिकना बना दिया था। उसके बाद उन्होंने प्यासी आंखों में हवस भर के बोला “आजा मेरी जान मेरी प्यास बुझा दे और मेरी चूत पर अपना नाम लिखदे।”
मैने उन्हें पीछे गिराया और टांगे खोलकर चूत के छेद पर अपना लंड लगा दिया। आंटी तड़प रही थी मैने पहले लंड छेद पर लंड सहलाया उसके बाद एक धक्का लगाया तो वो चीख पड़ी।
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“अआआह! आराम से डाल बहुत समय से अंदर कुछ नहीं गया है।” मैने इस बार एक आराम से धक्का लगाया लेकिन कुछ नहीं हुआ फिर एक जोरका धक्का मार कर उनके होठों पर होठ रख दिया।
आंटी ने अपने नाखून मेरी पीठ पर गाड़ दिए फिर हमारी चुदाई की शुरुआत हो गई। मैने चूत पर धक्के लगाकर चुदाई शुरू की आंटी भी गांड़ उठाकर चूत से ज़ोर लगा रही थी।
मैने आंटी के होठ छोड़े और तेज़ी से चोद ने लगा आंटी “आगाह! हाशमी ओहो अआआह मेरे बच्चे चोद अआह चोद अपनी रण्डी को ।
ओह मैं बहुत प्यासी हूं अआआह आह ओह अआआह आह हम्ममम हम उफ्फ ओहो अआआह हाशमी और तेज़ अआआह और तेज़ आगाह।” की आह निकल रही थी।
ताबड़तोड़ चुदाई के 15 मिनट बाद मेरा पानी निकला जिसे मैने उनकी चूत के बाहर निकाल दिया लेकिन आंटी को अभी शांति नहीं मिली थी। मैं थोड़ा आराम करने के लिए रुका तो आंटी मेरे जिस्म को चूमने लगी मेरे लंड को फिर से जगाने लगी।
उन्होंने अपनी गांड़ मेरे मुंह पर रगड़ी और लंड को चूसा जिससे लंड फिर से तन गया आंटी ने खुद को सुबह शांत कर लिया था इसलिए वो जल्दी नहीं झाड़ी थी अब मैं भी दूसरी बार के लिए तैयार था।
खड़ा लंड देखकर आंटी उसके ऊपर चूत लेकर बैठ गई और घोड़े के सवारी जैसे कुद कुद कर चुदने लगी।
वो आह ओह अआआह आह की आवाज़ों से मुझे जोश दिला रही थी उन्होंने अपने चूचे मेरे मुंह पर कर के बोला “पीले इन्हें।”
आंटी मेरे लंड पर बैठकर कुद रही थीं। हर बार नीचे बैठते ही उनकी चूत मेरे लंड को जड़ तक निगल लेती। चूचे मेरे मुँह पर दबे थे। मैं दोनों को बारी-बारी चूस रहा था, दाँतों से निप्पल दबा रहा था।
आंटी का सिर पीछे की तरफ था, बाल बिखरे हुए, मुँह से सिर्फ कराहें निकल रही थीं।
“आह ओह अआआह… पी ले… जोर से पी… हाश्मी… अआआह आह… मेरी जान…”
मैंने उनके चूचों को दोनों हाथों से दबाया और नीचे से कमर उठा-उठा कर धक्के देने लगा। आंटी की गांड मेरे जांघों पर पट-पट बैठ रही थी। पसीना दोनों के जिस्म से बह रहा था।
कमरे की खिड़की खुली थी। पहाड़ी हवा आ रही थी, लेकिन बिस्तर जल रहा था।
आधी घंटे की सवारी के बाद आंटी की गति धीमी पड़ने लगी। मैंने उन्हें उल्टा किया। अब वो नीचे थीं, मैं ऊपर। टांगें उनके कंधों तक उठाईं और लंड फिर से चूत में उतार दिया। इस बार और गहरा।
आंटी ने आँखें बंद कर लीं। नाखून मेरी पीठ पर फिर गड़ गए।
“अआआह… आराम से नहीं… अब जोर से… चोद… अपनी बुढ़िया को चोद… आह्ह्ह…”
मैंने ताबड़तोड़ धक्के लगाए। बिस्तर की चर्र-चर्र आवाज पूरे घर में गूँज रही थी, लेकिन घर में हम दो ही थे। बेटा कैंप में था। दुकान बंद थी। कोई आने वाला नहीं था।
मैंने एक हाथ उनके गले पर रखा, दूसरा चूचे पर। आंटी की आँखें खुल गईं। उनमें गुस्सा नहीं था, सिर्फ भूख थी।
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पंद्रह मिनट बाद मैंने लंड निकाला। आंटी समझ गईं। वो तुरंत घोड़ी बन गईं। गांड मेरे सामने उठी हुई, चूत से मेरा पहला राउंड का पानी मिला रस टपक रहा था। मैंने गांड पर जोर का थप्पड़ मारा। आंटी ने मजे से कराह भरी।
“मार… और मार… अह्ह्ह…”
मैंने थूक लगाकर लंड उनके गांड के छेद पर रखा। आंटी का शरीर तन गया।
“वहाँ…? हाश्मी…”
“हाँ आंटी। आज पूरा लेना है।”
नोक अंदर गई तो उनकी आवाज दब गई। मैं रुका। कमर सहलाई। फिर धीरे-धीरे आधा, फिर पूरा। आंटी तकिया मुँह में दबाए काँप रही थीं। कुछ पल बाद उन्होंने खुद गांड पीछे की तरफ धकेली।
“अंदर रख… निकाल मत… अह्ह्ह… फाड़ दे…”
मैंने गांड पकड़कर धक्के शुरू किए। पहले धीमे, फिर तेज। आंटी की मोटी गांड मेरे पेट से टकरा-टकरा कर लहरा रही थी। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।
“बोल आंटी… ये गांड किसकी है?”
“तेरी… हाश्मी… तेरी रंडी की गांड… अआआह… चोद…”
हम दोनों लगभग साथ झड़े। मैंने सारा माल उनकी गांड में छोड़ दिया। आंटी बिस्तर पर ढेर हो गईं। मैं उनके बगल में लेट गया। दोनों की साँसें पहाड़ी रात की खामोशी में गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद आंटी ने मेरा लंड हाथ में लिया। वो अभी भी गरम था। उन्होंने धीरे-धीरे सहलाते हुए कहा, “सुबह वाले वाले नाटक की सजा यही थी… अब हर रात लेनी है।”
मैंने उनके माथे पर किस किया। “पूरी छुट्टियाँ।”
सुबह मैं देर से उठा। आंटी किचन में थीं, लेकिन इस बार नाराज़ नहीं। उन्होंने मुझे चाय देते हुए कमर में हाथ फेरा। कुर्ती के नीचे ब्रा नहीं थी। चूचे साफ उभर रहे थे। मैंने पीछे से गले लगाया तो वो हटी नहीं।
मेरा हाथ उनके पेट से होता हुआ चूत तक चला गया। पेटीकोट के अंदर वो फिर से गीली थीं।
“नाश्ता ठंडा हो जाएगा,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा, लेकिन टांगें थोड़ी और खोल दीं।
मैंने उंगली अंदर कर दी। आंटी सिंक पकड़कर खड़ी रहीं। मैंने दो उंगलियाँ चलाते हुए उनके कान में कहा, “आज दुकान बंद रखो।”
उन्होंने सिर हिलाया।
उस दिन हमने घर से बाहर कदम नहीं निकाला। दोपहर सोफे पर हुई। आंटी ने कुर्ती उतार दी, पेटीकोट कमर तक उठा लिया। मैं नीचे बैठकर उनकी चूत चाट रहा था। आंटी के हाथ मेरे बालों में थे।
खिड़की से नैनीताल की पहाड़ियाँ दिख रही थीं और कमरे में सिर्फ उनकी सिसकियाँ।
“जीभ अंदर… हाँ वहीं… अआआह… मर गई…”
वो मेरे मुँह पर झड़ गईं। मैं उठा और उन्हें गोद में बिठा लिया। लंड चूत में बैठते ही आंटी ने गर्दन मेरे कंधे से लगा ली। मैंने नीचे से धक्के दिए। आंटी की गांड मेरी जांघों पर बैठ-बैठ कर गोल घूम रही थी।
शाम को बारिश फिर शुरू हुई। बिजली की रोशनी कमरे में आ-जा रही थी। हमने कपड़े नहीं पहने। आंटी ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, उल्टा होकर मुँह में लंड लिया और चूत मेरे चेहरे पर रख दी।
मैंने दोनों हाथों से गांड फैलाकर चाटा। आंटी लंड गले तक ले रही थीं। जब मैंने उनकी गांड के छेद पर जीभ फेरी तो वो लंड मुँह से निकालकर चीख पड़ीं।
“वहाँ मत… नहीं… अह्ह्ह… कर… कर ले…”
रात के दूसरे राउंड में मैंने फिर गांड ली। इस बार आंटी खुद तेल लेकर आईं। घोड़ी बनीं, सिर पलंग में दबाए। मैंने धीरे प्रवेश किया, फिर पकड़कर चलाया। आंटी एक हाथ पीछे लाकर मेरी जांघ पकड़े हुए थीं।
“भर दे… आज गांड में भर… अआआह…”
मैंने भरा। निकलते समय सफेद माल उनके छेद से बाहर आया। आंटी ने उंगली से लिया और मुँह में डाल लिया। मेरी आँखें चौड़ी हो गईं। वो मुस्कुराईं।
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तीसरे दिन हम बाहर निकले। आंटी ने हल्की साड़ी पहनी थी, ब्लाउज टाइट। मल्लीताल की भीड़ में उनका हाथ बार-बार मेरे हाथ को खोजता। एक सुनसान मोड़ पर उन्होंने मुझे दीवार से सटाया और किस कर लिया।
लोगों की आहट पर अलग हुए, लेकिन उनकी साँसें बता रही थीं कि घर पहुँचते ही क्या होना है।
घर की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते मेरा हाथ उनकी गांड पर था। दरवाजा बंद होते ही साड़ी उखड़ गई। मैंने उन्हें दीवार से लगाकर एक टांग उठाई और खड़े-खड़े चूत में घुस गया।
आंटी के दोनों हाथ मेरे कंधों पर थे। हर धक्के पर उनकी पीठ दीवार से पट रही थी।
“दरवाजा… ताला… अह्ह्ह… हाँ… ऐसे… हाश्मी…”
दोपहर दुकान के पीछे वाले छोटे स्टोर रूम में भी मौका निकाला। आंटी ने बोर्ड लगा दिया—थोड़ी देर बंद। अंदर अंधेरा था, कपड़ों के गट्ठर थे। आंटी काउंटर पर झुकीं। मैंने साड़ी कमर पर लपेटी और पीछे से मारा। बाहर कोई कॉल कर रहा था। आंटी मुँह दबाए सह रही थीं।
“जल्दी… अंदर छोड़… आह्ह्ह…”
मैंने अंदर छोड़ा। साड़ी संभालते समय उनके जांघ से माल बह रहा था। आंटी ने पल्लू से पोंछा और मुझे देखकर हँसीं। “अब दुकान खोल।”
चौथे और पाँचवें दिन एक ही लय चलती रही। सुबह चाय के साथ उंगली या मुँह। दोपहर घर या दुकान का पिछला कमरा। रात पूरा जिस्म। कभी आंटी ऊपर, कभी मैं। कभी चूत, कभी गांड, कभी दोनों बारी-बारी।
आंटी की आवाज अब संकोच वाली नहीं रही थी। वो साफ बोलतीं।
“आज गांड। कल चूत। आज दोनों।”
एक रात उन्होंने मेरे लंड को चूसते-चूसते कहा, “तू जाएगा तो ये भूख फिर अकेली रह जाएगी।”
मैंने उनके बाल सहलाए। “नंबर है। छुट्टियाँ फिर आएंगी।”
“इतना काफी नहीं।” आंटी मेरे लंड को गाल से रगड़ती हुई बोलीं, “मैं कुछ ऐसा करूँगी कि ये चूत तेरी रह जाए। दिखती रहे। याद दिलाती रहे।”
उस वक्त मैंने हँसकर टाल दिया। सोचा बातों-बातों में कह दिया।
छठे दिन सुबह पहाड़ी रास्ते पर वॉक के लिए निकले। वापस आकर नहाए। आंटी ने तौलिया कमर में बाँधा, ऊपर कुछ नहीं। बालकनी में खड़ी थीं। मैंने पीछे से तौलिया खोल दिया। ठंडी हवा उनके गीले जिस्म पर थी, मेरा लंड उनकी कमर से लगा था। मैंने उन्हें रेलिंग की तरफ झुकाया। नीचे घाटी थी, दूर झील चमक रही थी। मैंने चूत में डालकर धीमे-धीमे चलाया। आंटी की कराहें हवा में मिल गईं।
“कोई देख ले… अह्ह्ह… देखे तो देखे… चोद…”
उस शाम आंटी ने अचानक बोला, “कल शहर उतरना है। एक काम है।”
मैंने पूछा कौन सा। उन्होंने सिर्फ मुस्कुराकर जवाब दिया, “तेरा नाम।”
सातवें दिन हम नैनीताल बाजार की तरफ गए। आंटी ने मुझे एक छोटी सी दुकान के बाहर खड़ा कर दिया। आधे घंटे बाद निकलीं तो चलने में थोड़ी तकलीफ लग रही थी। मुँह पर कपड़ा था, आँखों में एक अजीब जीत। घर पहुँचकर उन्होंने पेटीकोट उठाया।
चूत के ऊपरी हिस्से पर, बालों के ठीक नीचे, अभी ताज़ा काला टैटू था। छोटा, साफ।
HAASHMI
मैं चुप देखता रहा। आंटी ने मेरा हाथ पकड़कर उस नाम पर फेरा।
“अब ये चूत सच में तेरे नाम है। जब तक जिऊँ… जब तक तू आए… ये तेरी रहेगी।”
उस रात मैंने बहुत संभलकर चोदा। टैटू की जलन थी। आंटी कभी दर्द से सिसकतीं, कभी मेरे कान में कहतीं, “देख… तेरा नाम… चोदते वक्त देख…”
गर्मियों की बाकी छुट्टियाँ मैंने आंटी को अपनी रंडी की तरह चोदकर बिताई।
बेटा कैंप से लौटने से एक दिन पहले आखिरी रात हमने लगभग सुबह तक ली। सुबह आंटी ने मुझे स्टेशन तक छोड़ा। गले मिलते समय उनके चूचे फिर मेरे सीने से दबे। इस बार दोनों जानते थे कि वो छूना अब अनजान वाला नहीं रहा।
अब जब भी नैनीताल का नाम आता है, मुझे पहाड़ नहीं, वो कमरा याद आता है। वो बारिश। वो घोड़ी। और वो टैटू, जो उनकी चूत पर मेरे नाम को हमेशा के लिए गाड़ गया।
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