गर्लफ्रेंड की शादीशुदा सहेली - अफ़सा! 02


GF Ki Saheli Ki Chudai : रिया चोदते अफ़सा सोची, कॉलेज में लंड दबवाया-चुत छुवाई, गाँव में घर खाली पाते ही चाटी अफ़सा की गीली चुत! मोटे लंड से मुख मैथुन!  


अभी तक "गर्लफ्रेंड की शादीशुदा सहेली - अफ़सा!" में आपने पढ़ा :-


उस रात रिया मेरे रूम में आई। दरवाज़ा बंद होते ही वो मेरे ऊपर चिपक गई। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। उसके कपड़े उतारे। उसके छोटे स्तन मुँह में लिए और चूसने लगा।


वो कराह उठी, “आह्ह गौरव… हम्म…” लेकिन मेरी आँखें बंद थीं। दिमाग में अफ़सा की गीली साड़ी, उसके निप्पल्स, उसकी भारी साँसें घूम रही थीं। मैंने रिया की चूत में उंगलियाँ डाल दीं। वो भीगी हुई थी।


“आह्ह… अंदर… और गहरा…” मैंने अपने लंड को उसकी चूत पर लगाया और एक ही धक्के में अंदर घुसा दिया। रिया चिल्लाई, “आह्ह्ह… इतना ज़ोर से!” लेकिन मैं रुकने वाला नहीं था। हर धक्के के साथ अफ़सा का चेहरा याद आ रहा था।


अब आगे :-


“अगर रिया न होती…” वाली बात बार-बार गूँज रही थी।


मैंने रिया की कमर पकड़कर ताबड़तोड़ चुदाई की। वो “आह… आह… गौरव… धीरे…” कह रही थी, लेकिन मेरा दिमाग कहीं और था। जब वीर्य निकला तो मैंने अफ़सा का नाम मन ही मन लिया।


अगले दिन कॉलेज में अफ़सा मिली तो उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं। जैसे कल कुछ हुआ ही न हो। लेकिन दोपहर को लाइब्रेरी में वो अचानक मेरे पास आ गई।


किताबों के पीछे छिपकर बोली, “कल रात… तुमने सोचा होगा ना मेरे बारे में?”


मैंने कुछ नहीं कहा। बस देखा।


उसने धीरे से अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। “रिया के सामने कुछ मत कहना। लेकिन मैं तुम्हें चाहती हूँ गौरव। बहुत।”


मेरा लंड फिर से तन गया। उसने महसूस किया। मुस्कुराई और बोली, “देखो… तुम्हारा भी यही हाल है।” फिर उसने अपना हाथ हटाया और चली गई। जाते हुए जानबूझकर अपनी गांड को थोड़ा और हिलाया।


कॉलेज के आखिरी दस दिन जैसे नरक बन गए। अफ़सा अब खुलकर खेलने लगी थी। एक दिन कैंटीन में रिया के सामने ही उसने अपने पैर से मेरे लंड को दबाया। मैंने प्लेट गिरा दी।


रिया हैरान होकर बोली, “क्या हुआ?” अफ़सा हँस पड़ी, “कुछ नहीं, गौरव शायद भूखे हैं।”


एक और दिन बारिश हो रही थी। हम तीनों बस स्टॉप पर खड़े थे। अफ़सा की सलवार भीग गई थी। कपड़ा उसकी जाँघों से चिपक गया था। उसने मेरे कान में फुसफुसाया,


🔥 एक और कामुक स्टोरी : गर्लफ्रेंड की शादीशुदा सहेली - अफ़सा! 03


“देख रहे हो ना… मेरी जाँघें?” फिर रिया की तरफ मुस्कुरा दी जैसे कुछ कहा ही न हो।


एक शाम अफ़सा ने मुझे कॉलेज के खाली क्लासरूम में बुलाया। रिया होमवर्क करने चली गई थी। कमरा अंधेरा था। सिर्फ खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी।


अफ़सा ने दरवाज़ा बंद किया। मेरे करीब आई। इतनी करीब कि उसके स्तन मेरे सीने से दब गए।


“आज आखिरी मौका है शायद,” उसने धीरे से कहा। “कल मेरा आखिरी पेपर है। फिर मैं गाँव चली जाऊँगी।”


मैंने उसकी कमर पकड़ ली। हाथ में उसका नरम शरीर महसूस हुआ। “अफ़सा…”


उसने मेरा मुँह बंद कर दिया अपनी उंगली से। “मत बोलो। बस छू लो।”


मैंने उसके स्तन पकड़े। साड़ी के ऊपर से। वो भारी थे, गोल। उसने आह भरी, “आह्ह… हल्के से…” मैंने ब्लाउज़ के ऊपर से निप्पल्स दबाए। वो सख्त हो चुके थे।


अफ़सा ने मेरा हाथ पकड़कर और नीचे सरका दिया। अपनी चूत पर। सलवार के ऊपर से उसकी चूत गरम और थोड़ी गीली लग रही थी। उसने मेरा हाथ वहीं दबाए रखा।


“यहाँ… महसूस करो कितनी गीली हूँ तुम्हारे लिए…”


मैं पागल हो रहा था। लंड फटने वाला था। मैंने उसके होंठ चूम लिए। पहले धीरे, फिर जोर से। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई।


वो कराह रही थी, “हम्म… आह्ह गौरव…” मैंने उसकी गांड पकड़ ली। दोनों हाथों से। गोल, सख्त, और जब मैंने दबाया तो उसने और जोर से मेरी तरफ अपने आप को धकेला।


अचानक बाहर से आवाज़ आई। कोई आ रहा था। अफ़सा झटके से पीछे हटी। साँस तेज़ चल रही थी। उसके होंठ सूजे हुए थे। “जा… अभी निकल जा। कल मिलते हैं।”


मैं बाहर निकला। पूरे शरीर में आग लगी हुई थी। उस रात फिर से रिया के साथ चुदाई की, लेकिन दिमाग में सिर्फ अफ़सा की गीली चूत और उसकी कराहें घूम रही थीं।


कॉलेज खत्म हो गया। अफ़सा चली गई। कोई अलविदा भी नहीं कहा। सिर्फ एक मैसेज आया रात को - “याद रखना गौरव। जो बात अधूरी रह गई।”


मैं शहर में ही रुक गया कुछ महीने। पढ़ाई पूरी की। रिया के साथ रिश्ता चलता रहा। लेकिन हर रात अफ़सा याद आती। उसके स्तन, उसकी गांड, उसकी आवाज़। कभी-कभी हिलाते हुए मैं उसका नाम ले लेता।


फिर एक दिन फैसला किया – गाँव वापस चलना है। घर वाले बुला रहे थे। रिया को बताया तो वो थोड़ी उदास हो गई, लेकिन बोली, “जाओ, मिलने आ जाना।”


गाँव पहुँचा। घर का माहौल वैसा ही था। लेकिन दिमाग में अफ़सा घूम रही थी। पता था वो यहीं कहीं रहती है। शादीशुदा। पति के साथ।


तीसरे दिन बाजार गया तो अचानक वो दिख गई। सलवार-कमीज में। पहले से और भी भरी हुई लग रही थी। स्तन और बड़े, कमर और पतली। उसने मुझे देखा तो पल भर के लिए रुक गई। फिर मुस्कुराई।


“गौरव? तुम यहाँ?”


“हाँ… घर आया हूँ।”


वो करीब आई। “कैसी हो रिया?”


“ठीक है।”


थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर उसने धीरे से कहा, “मेरे घर चलोगे? पति खेत गए हैं। घर खाली है। बातें कर लें पुरानी।”


👉 ये कहानी भी जरूर पढ़ें : गर्लफ्रेंड की शादीशुदा सहेली - अफ़सा!


मेरा दिल धड़क उठा। मैंने हाँ कह दिया।


उसका घर गाँव के किनारे था। शांत। कोई आसपास नहीं। अंदर जाते ही उसने दरवाज़ा बंद कर दिया। सलवार में उसका बदन और निखरा लग रहा था। उसने पानी दिया। दोनों बैठ गए।


“बहुत दिन हो गए,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में वही पुरानी गुनगुनाहट थी। “कॉलेज के दिन याद हैं?”


“हाँ।”


वो मेरे करीब खिसक आई। “वो वाली बात… क्लासरूम वाली… याद है?”


मैंने गर्दन हिलाई।


उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी जाँघ पर रख दिया। “तब तुमने मुझे छुआ था। आज भी वैसा ही महसूस होता है।”


मैंने उसकी जाँघ सहलाई। नरम। उसने आह भरी, “आह्ह… हाथ मत हटाना।”


फिर उसने मेरा चेहरा अपने करीब खींचा। होंठ मिले। इस बार कोई बाधा नहीं थी। कोई रिया नहीं, कोई आवाज़ नहीं। बस हम दोनों। चुंबन गहरा होता गया। मेरी जीभ उसके मुँह में, उसकी जीभ मेरे मुँह में।


वो कराह रही थी, “हम्म… गौरव… कितना याद किया तुम्हें…”


मैंने उसके स्तन पकड़े। सलवार के ऊपर से। भारी। निप्पल्स तने हुए। उसने मेरा हाथ अंदर डालने दिया। ब्लाउज़ खोल दिया मैंने। उसके नंगे स्तन बाहर आ गए। बड़े, गोल, काले निप्पल्स। मैंने मुँह में ले लिया। चूसने लगा।


वो जोर से कराह उठी, “आह्ह्ह… हां… चूसो… जोर से चूसो गौरव…”


मेरा लंड फटने वाला था। उसने खुद ही मेरी जीन्स का बटन खोला। लंड बाहर निकाला। हाथ में लिया। “उफ्फ… कितना मोटा… कॉलेज में भी ऐसा ही था क्या?” वो हँसते हुए बोली और फिर सिर नीचे किया।


उसके गर्म होंठ मेरे लंड पर पड़े। पहले चाटा, फिर मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे। आँखें बंद किए। “हम्म…” की आवाज़ निकालती हुई चूसने लगी। मैंने उसका सिर पकड़ लिया। “आह्ह अफ़सा… और गहरा…”


वो लंड को गले तक लेने की कोशिश कर रही थी। लार बह रही थी। चूसते हुए वो कराह रही थी। मैं पागल हो रहा था।


तभी उसने लंड छोड़ा और बोली, “आज पूरी बात निपटानी है गौरव। मैं अब और इंतजार नहीं कर सकती…”


अफ़सा ने मेरा लंड हाथ में पकड़े रखा था। उसकी हथेली गरम थी और वो धीरे-धीरे ऊपर-नीचे कर रही थी। उसकी आँखें मेरे लंड पर टिकी थीं। वो बोली, “आज पूरी बात निपटानी है गौरव।


मैं अब और इंतजार नहीं कर सकती। कॉलेज से लेकर आज तक जो अधूरा रह गया है, वो आज पूरा होगा।”


मैंने उसके बालों में उंगलियाँ फेर दीं। उसने फिर से सिर झुकाया और मेरे लंड को मुँह में ले लिया। इस बार और गहराई तक। उसके गर्म होंठ लंड के चारों तरफ कस गए।


वो धीरे-धीरे चूसने लगी। लार की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। हर बार जब वो लंड को गले की तरफ ले जाती तो “ग्लक… ग्लक…” की आवाज़ निकलती।


मैंने सिर पीछे किया और कराह उठा, “आह्ह्ह अफ़सा… कितना अच्छा चूस रही हो… और गहरा लो…”


उसने आँखें ऊपर उठाकर मेरी तरफ देखा। मुँह में लंड लिए हुए ही वो मुस्कुराई।


💋 आपको ये कहानी पसंद आएगी : छिनाल गर्लफ्रेंड की छिनालगिरी!


फिर दोनों हाथों से मेरे लंड को पकड़कर और तेज़ी से चूसने लगी। कभी सिर्फ अगला हिस्सा मुँह में लेकर जीभ घुमाती, कभी पूरा अंदर समाने की कोशिश करती। उसकी गर्दन की नसें तन गई थीं। 


मैंने उसके बालों को मुट्ठी में भर लिया और हल्के-हल्के उसकी गर्दन हिलाने लगा। वो कराह रही थी, “हम्म… हम्म… ग्लक…” उसकी आवाज़ लंड के अंदर गूँज रही थी।


थोड़ी देर बाद उसने लंड को मुँह से निकाला। लार की मोटी लकीर उसके होंठ से मेरे लंड तक लटक रही थी। वो साँस लेते हुए बोली, “उफ्फ… कितना मोटा और सख्त है तुम्हारा। कॉलेज में जब छुआ था तब भी ऐसा ही लगा था। आज पूरा लेना है।”


मैंने उसे उठाया और दीवार से सटा दिया। उसके होंठ फिर से चूमने लगा। इस बार चुंबन में और भूख थी। मेरी जीभ उसके मुँह में घुस गई। उसने भी उतनी ही शिद्दत से जवाब दिया।


मैंने उसके ब्लाउज़ के बाकी बचे हुक खोल दिए। उसके नंगे स्तन मेरे हाथों में आ गए। बड़े, भारी और नरम। निप्पल्स काले और पूरी तरह तने हुए थे। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। दाँत हल्के से दबाए।


अफ़सा जोर से कराह उठी, “आह्ह्ह… हाँ… जोर से चूसो… काटो भी… आह्ह गौरव… दूसरे को भी चूसो…”


मैंने दूसरा स्तन भी मुँह में लिया। दोनों हाथों से उसके स्तनों को मसल रहा था। वो मेरे बाल पकड़कर मेरे सिर को और अपने सीने से चिपकाए हुए थी। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।


“आह्ह… हम्म… बहुत अच्छा लग रहा है… और नीचे जाओ…”


मैंने उसके इशारे पर घुटनों के बल बैठ गया। उसकी सलवार का नाड़ा खोला। सलवार उसके पैरों से नीचे फिसल गई। अंदर गुलाबी रंग की पैंटी थी जो बीच से पूरी तरह गीली हो चुकी थी।


मैंने पैंटी को भी नीचे सरका दिया। उसकी चूत सामने आ गई। हल्के काले बालों वाली, फूली हुई, और चमक रही थी गीलेपन से। गुलाबी होंठ थोड़े खुले हुए थे और उनमें से पानी की एक बूंद टपक रही थी।


मैंने दोनों हाथों से उसकी जाँघें चौड़ी कीं और अपनी जीभ उसकी चूत पर फेर दी।


अफ़सा ने जोर से आह भरी, “आह्ह्ह्ह… हाँ… चाटो… जोर से चाटो गौरव…” मैंने उसकी चूत के दोनों होंठों को चूसा। फिर जीभ अंदर घुसा दी। उसका स्वाद हल्का खट्टा और गरम था। वो मेरे सिर को अपनी चूत पर और जोर से दबाने लगी।


“आह्ह… वहाँ… ऊपर वाली जगह… हाँ उसी को चाटो… आह्ह्ह… मत रोको…”


आगे की कहानी : ""


← Previous Story Next Story →

Share This Story :  

🎲 Feeling Lucky? Read a Random Story

यह कहानी आपको कैसी लगी?

❤️ Love 0
😍 Wow 0
😂 Funny 0
😢 Sad 0
😡 Angry 0
👏 Clap 0

💬 Leave a Comment :-


📝 Comments :

No comments yet. Be the first to comment!