फौजी अंकल, अंदर मत छोड़ना… प्रेग्नेंट हो जाऊँगी!
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अभी तक आपने "फौजी किराएदार ने छेड़ी निशा की कुँवारी चुत! 02" में पढ़ा :-
“आआह… ह्ह्ह… उह्ह्ह…” फौजी ने मेरी दोनों टाँगों को उठाकर अपने कंधों पर रख दिया और जोर-जोर से लंड गहराई में मेरी चूत में धक्के लगाने लगा।
“आआह… मम्म… ठठ… उह्ह्ह…” मैं भी अपने चूतड़ों को ऊपर उठा रही थी। लंड मेरी बच्चेदानी में जा रहा था। मैं फिर से झड़ गई। लेकिन फौजी धक्के लगाने में लगा रहा।
मैं अपनी जीभ और उँगली से फौजी के चुचियों के निप्पल को चूसने और मसलने लगी। लगभग पंद्रह मिनट और ताबड़तोड़ धक्के से मेरी चुदाई करते हुए मैं तीन बार फिर झड़ गई।
साथ ही फौजी ने जड़ तक लंड फँसाकर ढेर सारा गर्म वीर्य मेरी चूत में लबालब भर दिया।
“आआह… ह्ह्ह… गड़… उह्ह्ह…” मैं काँप रही थी। वीर्य की धार अंदर तक जा रही थी।
काफी देर तक हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे। साँसें धीमी हो रही थीं। फिर फौजी ने लंड धीरे से खींचकर निकाला। मेरी चूत से ढेर सारा वीर्य खून से मिला-जुला निकलकर बेडशीट पर गिरने लगा। मेरी चूत सूज गई थी, दर्द हो रहा था।
मैं पेशाब के लिए उठी तो दर्द से कराह उठी और उठ नहीं पाई। फौजी ने सहारा दिया और मुझे गोद में लेकर बाथरूम ले गया। वहाँ से वापस लाकर बैड पर लिटाया और मेरे ऊपर चढ़ गया।
फौजी ने पूरी रात मेरी चार बार जमकर चुदाई की। हर बार अंदर वीर्य छोड़ा। मेरी चूत पूरी तरह खुल गई थी। सुबह तक हम दोनों थककर सो गए।
फौजी ने मुझे सहारा दिया। मैं दर्द से कराह रही थी, उठ नहीं पा रही थी। उसने मुझे गोद में उठा लिया और बाथरूम ले गया। वहाँ मैंने पेशाब किया। चूत से खून और वीर्य मिला हुआ पानी निकल रहा था।
दर्द इतना था कि मैं खड़ी नहीं हो पा रही थी। फौजी ने मुझे साफ किया, फिर गोद में लेकर वापस बैड पर लिटाया।
वह मेरे ऊपर चढ़ गया। उसका लंड अभी भी अर्ध-खड़ा था। उसने मेरी दोनों टाँगों को फैलाया और धीरे-धीरे लंड को मेरी सूजी हुई चूत में घुसा दिया। पहली रात की चार बार की चुदाई के बाद मेरी चूत पूरी खुल चुकी थी, लेकिन दर्द अभी भी था।
फौजी ने पूरी रात मुझे चार बार जमकर चोदा। हर बार अलग-अलग अंदाज में। कभी दोनों टाँगें कंधों पर रखकर, कभी घोड़ी बनाकर, कभी मुझे ऊपर बैठाकर।
हर बार उसने जड़ तक लंड फँसाकर ढेर सारा गर्म वीर्य मेरी चूत में भर दिया। आखिरी बार जब वह झड़ा तो मैं भी काँपती हुई उसके साथ झड़ गई। हम दोनों थककर सो गए।
सुबह देर से आँख खुली। कमरे में हल्की रोशनी थी। मैंने देखा हम दोनों पूरी तरह नंगे एक-दूसरे की बाँहों में सो रहे थे।
फौजी का मोटा, काला, लंबा लंड अभी भी मेरे चूतड़ों के बीच से फँसकर मेरी चूत से चिपका हुआ था। रात भर अंदर रहने की वजह से मेरी चूत गीली और सूजी हुई थी। लंड की गर्माहट महसूस करके मेरे अंदर फिर से हलचल होने लगी।
मैंने धीरे से अपना मुँह उसके मुँह पर रखा और होंठों से चुंबन देकर जगाया। फौजी की आँखें खुलीं। उसने तुरंत मुझे अपनी मज़बूत बाँहों में कसकर भर लिया। उसके बड़े-बड़े हाथ मेरी चुचियों पर चले गए।
उसने दोनों चुचियों को जोर-जोर से मसला, निप्पल्स को उँगलियों के बीच दबाकर खींचा।
“आआआहहहहहह… मम्म… सस्स… धीरे…” मेरे मुँह से निकल पड़ा।
फौजी ने मेरी एक टाँग को ऊपर उठाया। उसका लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था। नसें उभर रही थीं। उसने लंड को हाथ में लिया और मेरी चूत के मुँह पर सुपारा रगड़ने लगा।
अभी पूरी तरह गीली नहीं थी, लेकिन उसने दो जोरदार धक्के मारे ही थे कि पूरा लंड मेरी चूत में जड़ तक घुस गया।
“उईईईईईईईईई… मम्मी… आआआहहहह… मर गई… ऊऊऊऊऊछ… ईघघघघघघ… इइइइगगगगगग…”
मेरी चूत अभी सूजी हुई थी। दर्द हुआ, लेकिन फौजी रुकने वाला नहीं था। उसने मेरे होंठों को अपने होंठों में चूस लिया और ताबड़तोड़ धक्के लगाने शुरू कर दिए। पूरा लंड गहराई तक अंदर-बाहर हो रहा था।
हर धक्के पर मैं उछल रही थी। बैडशीट पर खून और वीर्य के दाग और गहरे हो रहे थे।
“मममममममम… ईईईईईईईईईईई… ससससससससिइइइइइइइइइ… ईईईईईईईईईईईईई…”
फौजी ने मेरी दोनों टाँगों को अपने कंधों पर रख दिया। अब लंड और भी गहराई तक जा रहा था। सुपारा मेरी बच्चेदानी से ठोकर खा रहा था। दर्द और मजा दोनों साथ-साथ बढ़ रहे थे।
मैं अपने सिर को इधर-उधर पटक रही थी। मेरे मुँह से लगातार कराहें निकल रही थीं। फौजी रुक नहीं रहा था। कमरे में फच-फच की आवाज़ गूँज रही थी।
काफी देर तक इसी तरह चोदने के बाद फौजी ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। मैं उसके लंड पर बैठी हुई थी। उसने मुझे ऊपर-नीचे उछालना शुरू किया। हर बार पूरा लंड जड़ तक घुस रहा था।
मेरी चूचियाँ जोर-जोर से उछल रही थीं। फौजी उन्हें मुँह में लेने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उछाल के कारण चूचियाँ इधर-उधर हो रही थीं।
मैंने खुद अपने दोनों हाथों से चुचियों को पकड़कर उसके मुँह में डाल दिया। फौजी ने जोर से चूसना शुरू कर दिया। निप्पल्स को दाँतों से काटता, जीभ से चाटता। साथ ही मुझे अपने लंड पर उछाल-उछालकर ताबड़तोड़ चोद रहा था।
“आआआइइइ… हहहहहहहहह… सीईईईईईईईईईईई… आआआआइइइइइइ…”
कुछ देर बाद उसने मुझे बैड पर घोड़ी बना दिया।
मेरी गाँड ऊपर, चेहरा बैडशीट पर। उसने पीछे से लंड को चूत में डालकर जोर से मेरे चूतड़ों को पकड़ लिया और ताबड़तोड़ धक्के लगाने शुरू कर दिए। उसके लंड की नसें मेरी चूत की दीवारों पर रगड़ खा रही थीं।
“ममममररररररर… गगगड… ईईईईईईईई… आआआआआआआ… हहहहहहहहहह…”
बहुत देर तक घोड़ी बनाकर चोदता रहा।
मेरी चूत से पानी निकल-निकलकर उसकी जाँघों पर टपक रहा था। आखिर हम दोनों साथ-साथ झड़ गए। फौजी ने जड़ तक लंड फँसाकर ढेर सारा गर्म वीर्य मेरी चूत में उड़ेल दिया। मैं काँप रही थी, उसकी वीर्य की धार अंदर तक जा रही थी।
वह मेरे ऊपर लेट गया। हम दोनों हाँफ रहे थे।
काफी देर बाद मैंने कहा, “अब तुम बाहर जाकर मेरे लिए पेनकिलर टैबलेट और प्रेग्नेंट रोकने की गोलियाँ ले आना… और खाने का कुछ सामान भी। मेरी हालत बहुत खस्ता है।
तुमने दोनों टाँगें कंधों पर रखकर इतना जोर से चोदा है, हर बार अंदर वीर्य भर दिया है… मुझे लगता है मैं प्रेग्नेंट हो जाऊँगी।”
फौजी ने मुझे चूमा और कहा, “घबरा मत। मैं अभी लेकर आता हूँ।”
वह कपड़े पहनकर निकल गया। उसके जाने के बाद भी मैं बैड पर नंगी पड़ी रही। चूत से वीर्य और खून मिला हुआ पानी निकलकर बैडशीट पर गिर रहा था। दर्द से कराहते हुए मेरी आँख लग गई।
दोपहर और शाम
काफी देर बाद फौजी वापस आया। हाथों में बैग था। उसने पेनकिलर, गर्भनिरोधक गोलियाँ, मछली, चिकन, सब्जियाँ और शराब की नई बोतल लाई थी। पिछली बोतल अभी आधी बची हुई थी।
मैंने धीरे-धीरे उठकर नहाया। चूत सूजकर डबल रोटी जैसी हो गई थी, छूने पर दर्द होता था। हमने साथ में खाना खाया। मैंने पेनकिलर और गर्भनिरोधक गोली खा ली। उसके बाद हम दोनों फिर बैड पर लेट गए और देर शाम तक सोते रहे।
जब आँख खुली तो शाम हो चुकी थी। शरीर में काफी आराम आ गया था। फौजी ने शराब निकाली। उसने मुझे भी चार पैग पिला दिए।
शराब का असर होते ही मेरे शरीर में फिर गर्मी बढ़ गई। निशान जो रात और सुबह की चुदाई से शरीर पर पड़ गए थे - गर्दन, चुचियों, जाँघों पर दाँतों और चुंबन के निशान - वे और साफ दिखने लगे। मेरे होंठ भी चूसने से मोटे हो गए थे।
रात को फौजी ने फिर से शुरू कर दिया। पूरी रात उसने चार बार जमकर मेरी चुदाई की।
हर बार अलग-अलग पोजीशन में - मिशनरी, घोड़ी, ऊपर बैठाकर, और आखिरी बार दोनों टाँगें कंधों पर रखकर। हर बार अंदर वीर्य भर दिया। बैडशीट बदलने का मौका ही नहीं मिला।
वो बैडशीट मेरी सील टूटने के खून और ढेर सारे वीर्य से पूरी गंदी हो चुकी थी।
दो दिन की लगातार चुदाई के बाद मेरे अंदर लड़की से औरत बनने का अहसास जाग गया था। शरीर दर्द से चूर था, लेकिन मजा भी बहुत आया था।
अगला दिन
अगले दिन सुबह फौजी ने बताया, “निशा, आज मेरे ऑफिस से मेरा खास दोस्त आ रहा है। वो यहाँ रुकेगा।”
मैंने उसकी तरफ देखा। आँखों में समझ थी। फौजी मुस्कुराया और कहा, “वो भी फौजी है। खास है। तुम समझ गई ना?”
मैंने सिर हिला दिया। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। अब दो-दो मोटे लंडों से चुदने का खयाल आते ही मेरी चूत फिर गीली होने लगी।
फौजी ने मुझे बाँहों में भरकर कहा, “आज रात तुम दोनों के बीच सैंडविच बनोगी। एक सामने से, एक पीछे से। तुम्हारी हालत खस्ता हो जाएगी, लेकिन मजा बहुत आएगा।”
मैं चुप रही। शरीर काँप रहा था - डर और उत्तेजना दोनों से।
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