मुस्लिम माँ-बेटी की खेत में चुदाई! 03


Antarvasna Sex Story : मुखिया के बेटे ने बनाया माँ-बेटी को रखेल वाली प्रॉपर्टी! खेत बन गया Group Sex का अड्डा! दो दो लंड से फटने लगी माँ बेटी की चुत और गांड!


अभी तक "मुस्लिम माँ-बेटी की खेत में चुदाई! 03" में आपने पढ़ा :-


10 मिनट बाद मैं भी सलमा की चूत में झड़ गया। सलमा ने मेरे लंड को कस लिया और खुद भी झड़ गई — “आह्हhhhh… बेटा… आह्ह्ह…”


हम चारों फिर से थककर गिर पड़े। सलमा ने मेरे लंड को मुँह में लेकर साफ किया। रुखसाना ने भी विक्रम का लंड चूस-चूसकर साफ कर दिया।


विक्रम ने दोनों को देखा और बोला, “आज से तुम दोनों हमारी रखैल हो। जब चाहेंगे, खेत में बुलाएंगे… या रात को तुम्हारे घर आ जाएंगे।”


सलमा ने आँखें बंद करके सिर हिलाया। रुखसाना भी चुपचाप लेटी हुई थी। उसके शरीर पर अभी भी मेरे और विक्रम के निशान थे।


मैंने सलमा के मोटे मम्मों को दबाते हुए कहा, “कल फिर आना… दोनों।”


सलमा ने धीरे से कहा, “आएंगे… बेटा… आएंगे…”


आगे की कहानी :-


हम चारों अभी भी खेत की मिट्टी पर नंगे लेटे हुए थे। हवा में सिर्फ हमारी तेज साँसें और दूर से आती भैंसों की आवाज गूंज रही थी। सलमा ने मेरे सीने पर सिर रखकर कहा,


“बेटा… आज तुम दोनों ने हमें पूरी तरह चोद दिया…” उसकी आवाज में थकान और संतुष्टि दोनों थे।


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विक्रम हँसते हुए बोला, “अभी तो शुरूआत है।” उसने रुखसाना को अपने पास खींचा और उसके मम्मों को मसलने लगा।


रुखसाना अब बिना किसी शर्म के कराहने लगी — “आह्ह्ह… विक्रम… और… आह्ह्ह…”


मैंने सलमा को फिर से कुतिया बना दिया। उसकी मोटी, लाल पड़ी गांड मेरे सामने थी। मैंने थूक लगाया और लंड एक बार फिर उसकी गांड में धकेल दिया।


सलमा जोर से सिसकार उठी - “आह्हhhhh… राहुल… फिर से… आह्ह्ह… मोटा लग रहा है… आह्ह्ह…”


विक्रम ने रुखसाना को अपने ऊपर बिठा लिया। रुखसाना खुद लंड को अपनी चूत में सेट करके बैठ गई और ऊपर-नीचे कूदने लगी। “आह्ह्ह… विक्रम… गहरा… आह्ह्ह… मेरी चूत फाड़ दे… आह्ह्ह…”


दोनों माँ-बेटी अब पूरी तरह खुल चुकी थीं। सलमा अपनी गांड पीछे की तरफ उठा-उठा कर चुदवा रही थी और गालियाँ देने लगी — “आह्ह्ह… चोद… मादरचोद… और जोर से… आह्ह्ह… आज मेरी गांड सुजा दे… आह्ह्ह…”


रुखसाना भी विक्रम के लंड पर जोर-जोर से कूद रही थी। उसके छोटे मम्मे ऊपर-नीचे हो रहे थे। “आह्ह्ह… अम्मी… देख… मैं कैसे चुद रही हूँ… आह्ह्ह… मजा आ रहा है… आह्ह्ह…”


मैंने सलमा के बाल पकड़कर और तेजी से धक्के लगाने शुरू कर दिए। “साली… तुम दोनों कितनी बड़ी चुदक्कड़ हो… खेत में आकर लंड ले रही हो… आह्ह्ह…”


सलमा कराहते हुए बोली, “आह्ह्ह… हाँ बेटा… हमारी बिरादरी की औरतें ऐसी ही होती हैं… आह्ह्ह… चोद… जितना मन करे चोद… आह्ह्ह…”


थोड़ी देर बाद विक्रम ने रुखसाना को नीचे लिटा दिया और उसकी टांगें कंधों पर रखकर जोर-जोर से चोदने लगा। रुखसाना की चीखें खेत में गूंज रही थीं — “आह्हhhhh… विक्रम… और… आह्ह्ह… बच्चेदानी में ठोक… आह्ह्ह…”


मैंने भी सलमा को पलट दिया और missionary में उसकी चूत फाड़ने लगा। सलमा ने अपने पैर मेरे कमर पर लपेट लिए और नाखून गाड़ दिए — “आह्ह्ह… राहुल… आज तुमने मुझे याद दिला दिया… क्या होता है असली चुदाई… आह्ह्ह…”


15 मिनट बाद दोनों औरतें एक के बाद एक झड़ गईं। रुखसाना पहले — “आह्हhhhh… आ गया… आह्ह्ह…” फिर सलमा — “आह्हhhhh… बेटा… भर दे… आह्ह्ह…”


विक्रम ने रुखसाना की चूत में माल छोड़ दिया। मैंने भी सलमा की चूत में झाड़ दिया। दोनों की चूतों से हमारा वीर्य बाहर बहने लगा।


हम थककर फिर लेट गए। सलमा ने मेरे लंड को मुँह में लेकर साफ किया और बोली, “बेटा… अब जब चाहो बुला लेना… हम दोनों तैयार रहेंगे।”


रुखसाना ने भी विक्रम का लंड चूसते हुए कहा, “हाँ… अब शर्म नहीं… आह्ह्ह…”


विक्रम ने दोनों के चेहरे पर थप्पड़ जैसे हल्के थप्पड़ मारते हुए कहा, “अच्छी लड़कियाँ हो। कल शाम को फिर यहीं आना। और आज से गाँव की दूसरी औरतों को भी बता देना… जो तैयार हों, खेत में आएँ।”


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सलमा और रुखसाना दोनों ने सिर हिलाया।


हमने कपड़े पहने। जाते समय सलमा ने मेरे लंड को एक बार फिर हाथ से दबाया और फुसफुसाई, “रात को अगर मन करे… हमारे घर के पीछे आ जाना।”


मैं मुस्कुराया। विक्रम भी रुखसाना की गांड पर एक आखिरी थप्पड़ मारकर बोला, “जा… और तैयार रह।”


उस दिन के बाद सलमा और रुखसाना नियमित रूप से खेत में आने लगीं। कभी अकेली, कभी साथ। हम दोनों मिलकर उन्हें चोदते। कभी उनकी गांड, कभी चूत, कभी मुँह।


धीरे-धीरे गाँव की और भी मुस्लिम औरतें हमारी “सेवा” में आ गईं। कोई भाभी, कोई अम्मी, कोई जवान बेटी। खेत हमारा अड्डा बन गया था।


लेकिन सबसे ज्यादा मजा सलमा और रुखसाना के साथ ही आता था। माँ-बेटी को एक साथ चोदना… उनकी गालियाँ सुनना… उनकी गांड लाल करना… ये सब अब हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा बन चुका था।


उस दिन के बाद सलमा और रुखसाना पूरी तरह हमारी हो चुकी थीं। अगले ही दिन शाम को दोनों फिर खेत में आईं। इस बार वो खुद कपड़े उतारकर तैयार बैठी हुई थीं।


सलमा ने मुझे देखते ही कहा, “बेटा… आज दोनों को एक साथ चोदना… आह्ह्ह…”


हमने वैसा ही किया। विक्रम ने रुखसाना को कुतिया बनाया और उसकी गांड में लंड डाल दिया। मैंने सलमा को अपने ऊपर बिठा लिया।


दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे के बगल में कराह रही थीं - “आह्ह्ह… राहुल… विक्रम… और जोर से… आह्ह्ह… फाड़ दो… आह्ह्ह…”


हमने उन्हें घंटों चोदा। कभी उनकी चूत, कभी गांड, कभी मुँह।


सलमा अब खुद गालियाँ देने लगी थी - “आह्ह्ह… मादरचोद… और गहरा… आज मेरी गांड का भोसड़ा बना दो… आह्ह्ह…” रुखसाना भी पीछे नहीं थी - “आह्ह्ह… विक्रम… मेरी चूत सुजा दो… आह्ह्ह…”


जब हम दोनों झड़ गए तो सलमा ने मेरे लंड को चूस-चूसकर साफ किया और रुखसाना ने विक्रम का। जाते समय सलमा ने कहा, “बेटा… अब जब चाहो रात को हमारे घर के पीछे आ जाना। दरवाजा खुला रहेगा।”


हमने वैसा ही किया। कई रातें हम उनके घर के पिछवाड़े में बिताईं। कभी आँगन में, कभी कोठरी में। सलमा और रुखसाना अब बिना किसी शर्म के नंगी घूमतीं और हमें लुभातीं।


एक दिन विक्रम ने हँसते हुए कहा, “राहुल… इन दोनों को देखकर लगता है ये पहली बार नहीं चुद रही। बहुत अनुभवी हैं।” मैंने सहमति में सिर हिलाया।


सलमा ने खुद एक रात कबूल किया, “बेटा… गाँव के कई मर्दों ने हमें चोदा है… लेकिन तुम दोनों जैसे जवान और जोशीले नहीं मिले।”


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धीरे-धीरे हमारी “सेवा” में गाँव की और औरतें भी आने लगीं। कोई पड़ोस की भाभी, कोई विधवा अम्मी, कोई जवान बेटी। खेत हमारा अड्डा बन गया था। सुबह-शाम वहाँ नंगी औरतें मिलतीं और हम दोनों मिलकर उन्हें चोदते।


लेकिन सबसे ज्यादा मजा हमेशा सलमा और रुखसाना के साथ ही आता था। माँ-बेटी को एक साथ नंगा देखना, उनकी गांड पर थप्पड़ मारना, उनकी चूत और गांड में बारी-बारी से लंड डालना… ये सब अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था।


एक शाम जब हम दोनों सलमा और रुखसाना को चोदकर थक गए थे, तो सलमा ने मेरे सीने पर सिर रखकर कहा, “बेटा… अब तुम दोनों हमारे मालिक हो। जब चाहो, जितना चाहो… चोद सकते हो।”


रुखसाना ने भी विक्रम का लंड हाथ में लेकर मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ… अब शर्म नहीं रही… आह्ह्ह…”


विक्रम ने दोनों की गांड पर एक-एक थप्पड़ मारा और बोला, “अच्छी बात है। अब से ये खेत और तुम दोनों… हमारी प्रॉपर्टी हो।”


हम हँसे। सलमा और रुखसाना भी हँसीं।


दोस्तों, ये थी मेरी और मेरे दोस्त विक्रम की गाँव वाली कहानी। सलमा और रुखसाना के साथ शुरू हुई ये हवस बाद में पूरे गाँव की कई औरतों तक फैल गई। खेत में आज भी कई औरतें आती हैं… और हम दोनों आज भी उनका इंतजार करते हैं।


अगर आपको ये कहानी पसंद आई हो तो जरूर बताना। आगे और गाँव की औरतों की कहानियाँ भी सुनाऊँगा।


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