बस में माँ ने बेटे को चोदना सिखाया!
Family Sex Story : स्लीपर बस में प्यासी माँ ने पकड़ा बेटे का लंड! और सिखाया माँ की चूत चोदना! फिर हुई पूरी रात कम्पार्टमेंट में चुत-चुदाई का गेम! और बन गई विडिओ!
मैं रोहन, उम्र उन्नीस साल, और मेरी माँ प्रिया, अड़तीस साल की हाउसवाइफ। हमारा घर मुंबई के एक छोटे से इलाके में था। पापा ज्यादातर समय बाहर रहते थे।
माँ का शरीर ऐसा था कि देखते ही नजर अटक जाती। भारी छातियाँ, पतली कमर और वो बड़ी, मोटी गांड़ जो चलते वक्त दोनों तरफ लहराती रहती। पिछले दो साल से मैं उनकी तरफ आकर्षित होने लगा था।
रोज सुबह माँ नाश्ता बनाते वक्त झुकतीं तो उनकी छातियाँ नाइटी के अंदर से साफ दिख जातीं। कभी-कभी वे फर्श साफ करतीं तो उनकी गांड़ मेरे सामने आ जाती। मैं चुपचाप देखता रहता। मन में बार-बार एक ही ख्याल आता -
“ये मेरी माँ है… फिर भी…” और शर्म के साथ-साथ लंड अपने आप खड़ा हो जाता।
एक शाम माँ नहाने के बाद सिर्फ तौलिए में बाहर आईं। तौलिया छोटा था। उनकी जांघें और गांड़ का ऊपरी हिस्सा दिख रहा था। उन्होंने मुझे देखा तो हड़बड़ा गईं और जल्दी से कमरे में चली गईं।
उस रात मैं उनकी नहाने के बाद की खुशबू याद करके मुठ मारता रहा।
ऐसे ही छोटे-छोटे मौके मुझे और दीवाना बना रहे थे। माँ को इसका अंदाजा शायद था, लेकिन वो कुछ नहीं बोलती थीं।
फिर एक दिन पापा ने फोन करके कहा कि उन्हें इंदौर जाना है। माँ बोलीं, “चलो हम भी चलते हैं।” हमने मुंबई से इंदौर जाने वाली वॉल्वो बस का AC स्लीपर कम्पार्टमेंट बुक कर लिया। रात की बस थी - 11:30 बजे निकलनी थी।
बस स्टैंड पर पहुँचे। माँ ने हल्का सा मेकअप किया था। टाइट कुर्ती और सलवार पहनी थी। कुर्ती उनकी छातियों को कस रही थी और सलवार उनकी बड़ी गांड़ को और ज्यादा उभार दे रही थी। मैं बार-बार उनकी तरफ देख रहा था।
बस में चढ़े। हमारा कम्पार्टमेंट छोटा था। माँ नीचे वाली बर्थ पर लेट गईं। मैं उनके पास बैठ गया। बस चल पड़ी। माँ ने थोड़ा नाश्ता निकाला। हमने साथ खाया। माँ थक गई थीं।
बोलीं, “रोहन, मैं सो जाती हूँ। तू भी सो जा।”
कुछ ही देर में उनकी साँसें भारी हो गईं। वे गहरी नींद में चली गईं।
बस के अंदर अंधेरा था। सिर्फ छोटी सी रीडिंग लाइट जल रही थी। मैं मोबाइल में हेडफोन लगाकर माँ-बेटे वाली सेक्स स्टोरी पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते मेरा लंड खड़ा हो गया।
मैंने सोचा - “एक बार देख लूँ…” और धीरे से माँ की तरफ करवट ली। माँ मेरे बहुत करीब सोई हुई थीं। उनकी साँसें मेरे गले पर पड़ रही थीं। मैं और पास खिसक गया। मेरा कंधा अब उनके कंधे से लग रहा था।
मैं स्टोरी पढ़ता रहा और लंड हिलाने लगा। माँ की खुशबू मेरे नाक में भर रही थी। कुछ देर बाद माँ हिलीं। मैंने तुरंत रुक गया। माँ ने आँखें खोलीं, इधर-उधर देखा, फिर वापस सो गईं।
लेकिन इस बार उनकी साँसें पहले जैसी गहरी नहीं थीं।
मैंने इंतजार किया। फिर धीरे से फिर से हिलाने लगा। इस बार और सावधानी से। मेरा कंधा उनके कंधे से लगातार टकरा रहा था। माँ फिर हिलीं। इस बार उन्होंने करवट ली और उनका एक हाथ मेरे पेट के पास आ गया।
मेरा दिल जोर से धड़क रहा था। मैंने फिर रुक गया।
माँ की आँखें आधी खुली थीं। उन्होंने मेरी तरफ देखा। फिर उनका नजर नीचे गया - मेरे खड़े लंड पर। कुछ सेकंड तक वो चुप रही।
फिर धीरे से हाथ बढ़ाया और मेरे लंड को छू लिया।
मैं स्तब्ध रह गया। माँ ने हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन रुक गई। उनकी आवाज़ बहुत धीमी और काँपती हुई थी —
“रोहन… ये क्या कर रहा है बेटा… मैं तेरी माँ हूँ…”
लेकिन हाथ पूरी तरह वापस नहीं हटा। कुछ सेकंड बाद उन्होंने लंड को हल्का सा पकड़ लिया। फिर बहुत धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया।
मैंने फुसफुसाकर कहा, “माँ… मत करो… ये गलत है…” माँ ने आँखें बंद कर लीं। उनकी साँसें अब तेज़ हो रही थीं। “मुझे पता है… लेकिन… रुक नहीं पा रही…”
उनका हाथ अब थोड़ा और तेज़ हो गया। मैंने हिम्मत करके अपना हाथ उनकी छाती पर रख दिया। कुर्ती के ऊपर से दबाया। माँ का शरीर हल्का सा काँप गया। “रोहन… नहीं बेटा…” लेकिन आवाज में कोई रोकने की ताकत नहीं थी।
मैंने कुर्ती के अंदर हाथ डाला। ब्रा के अंदर निप्पल पहले से सख्त हो चुके थे। मैंने उन्हें उँगलियों से घुमाया। माँ ने होठ काट लिए। “आह्ह्ह… बेटा…”
मैंने दूसरा हाथ उनकी सलवार के अंदर डाला। चूत गर्म और थोड़ी गीली थी। धीरे से सहलाया। माँ की टाँगें हिल गईं। “उम्म्म… ये मत कर… मैं… आह्ह्ह…”
मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं। माँ ने मेरे लंड को और कसकर पकड़ लिया। उनकी गांड़ हिलने लगी। बस के कम्पार्टमेंट में सिर्फ हमारी साँसें और उँगलियों की हल्की आवाज़ थी। बाहर कंडक्टर घूम रहा था।
मैंने उँगलियाँ अंदर-बाहर करना शुरू किया। माँ अब पूरी तरह से काँप रही थीं। “हाँ बेटा… धीरे… कोई सुन लेगा… आह्ह्ह…”
दस-पंद्रह मिनट बाद माँ का शरीर अकड़ गया। उन्होंने मेरे कंधे को कसकर पकड़ लिया। “आह्ह्ह… रोहन… मैं… आह्ह्ह…!” एक लंबी, दबी हुई आवाज के साथ वे झड़ गईं।
मैंने उँगलियाँ निकालीं और माँ के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। माँ ने पहले थोड़ा विरोध किया, फिर धीरे-धीरे होठ खोल दिए। हम स्मूच करने लगे।
मैंने माँ की कुर्ती ऊपर खींची। ब्रा उतार दी। उनके भारी बूब्स बाहर आ गए। निप्पल सख्त और गहरे रंग के। मैंने एक बूब मुँह में लिया और चूसने लगा। माँ ने मेरे सिर को अपनी छाती से दबा लिया। “आह्ह्ह… चूस… अपनी माँ के… उफ्फ…”
कुछ देर बाद माँ ने मुझे नीचे की तरफ धकेला। “अब मेरी बारी…”
माँ घुटनों के बल बैठ गईं। मेरे लंड को हाथ में लिया। सुपाड़े पर धीरे से किस किया। फिर पूरा लंड चाटते हुए मुँह में ले लिया।
माँ घुटनों के बल बैठ गईं। मेरे लंड को हाथ में लिया। सुपाड़े पर धीरे से किस किया। फिर पूरा लंड चाटते हुए एक ही बार में मुँह में ले लिया।
मैं पागल हो गया। माँ के बाल पकड़कर उनके मुँह में लंड ठोकने लगा। “आह्ह्ह… माँ… चूसो… ज़ोर से चूसो… तेरी जीभ… उफ्फ…”
माँ अच्छे से चूस रही थीं। गला भर रहा था, लेकिन रुकी नहीं। उनकी जीभ लंड के नीचे घूम रही थी। मैं उनकी साँसें, गर्म मुँह की गर्माहट और चूसने की गीली आवाज़ सुन रहा था। बस के बाहर कंडक्टर के कदमों की आवाज़ आ रही थी। पर्दा पतला था।
माँ ने लंड को मुँह से निकाला और फुसफुसाई, “श्श्श… आवाज़ मत करो बेटा… कोई सुन लेगा…”
फिर फिर से पूरा लंड अंदर ले लिया। मैं उनकी मुँह में लंड ठोकता रहा। माँ की आँखों से आँसू आ गए थे, लेकिन वे रुकी नहीं। दस मिनट बाद मैंने कहा, “माँ… गिरने वाला है…” माँ ने और गहरा ले लिया। मैं उनके मुँह में झड़ गया। गरम वीर्य की फुहारें उनके गले में गईं। माँ ने सारा पी लिया। एक बूंद भी बाहर नहीं गिरने दिया।
वे मेरे पास लेट गईं। दोनों थककर चुपचाप लेटे रहे। मेरा लंड कुछ देर बाद फिर खड़ा होने लगा। माँ ने महसूस किया। उन्होंने मुझे देखा। उनकी आँखों में अब शर्म कम और भूख ज्यादा थी।
मैं माँ के ऊपर आ गया। लंड उनकी चूत पर रखा और सिर्फ सुपाड़े से रगड़ने लगा। माँ तड़प रही थीं। “बस करो बेटा… अब और मत तड़पाओ… डाल दो… अपनी माँ की चूत में…”
लेकिन मैंने अभी भी नहीं डाला। सिर्फ टिप से चूत के फटे को छूता और निकाल लेता। माँ की गांड़ हिल रही थी। “आह्ह्ह… रोहन… रुक मत… अब डाल… फाड़ दे… मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रही…”
मैंने धीरे से सुपाड़ा चूत के अंदर डाला। सिर्फ आधा इंच। माँ ने साँस ली। फिर मैंने निकाल लिया। माँ ने मेरी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। “रोहन… मत तड़पा… अब पूरा डाल…”
इस बार मैंने एक ही जोरदार झटके में पूरा लंड अंदर घुसा दिया। माँ चीख पड़ीं — “आह्ह्ह्ह्ह्ह!!!! मार डाला रे बेटा… आराम से… उफ्फ…”
मैंने रुककर कहा, “माँ… दर्द हो रहा है क्या?” माँ ने सिर हिलाया, “नहीं… बस… थोड़ा रुक… आह्ह्ह…”
दस सेकंड बाद माँ ने खुद अपनी गांड़ ऊपर उठाई। मैंने धीरे-धीरे कमर चलानी शुरू की। “फच… फच…” की हल्की आवाज़ कम्पार्टमेंट में फैल रही थी। माँ की चूत बहुत टाइट थी। गर्म और गीली।
मैंने स्पीड बढ़ाई। माँ अब आहें भर रही थीं — “आह्ह्ह… बेटा… चोद… ज़ोर से चोद… अपनी माँ को… आह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही…”
मैंने उनकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और और तेज़ चोदने लगा। माँ की छातियाँ उछल रही थीं। निप्पल सख्त। मैंने एक बूब मुँह में लिया और चूसते हुए चोदता रहा।
माँ ने मुझे नीचे आने का इशारा किया। मैं लेट गया। माँ मेरे ऊपर चढ़ गईं। उन्होंने खुद लंड पकड़कर चूत में डाला और ऊपर-नीचे होने लगीं। “आह्ह्ह… रोहन… लंड कितना मोटा है… उफ्फ… भर रहा है… आह्ह्ह…”
मैं उनकी गांड़ पकड़कर ऊपर-नीचे कर रहा था। माँ की चूत मेरे लंड को कस रही थी। पूरा कम्पार्टमेंट “आह्ह्ह… उफ्फ… छप… छप…” की आवाज़ से भर गया था।
माँ ने झुककर मेरे होंठों पर किस किया। मैंने उनकी गांड़ पर थप्पड़ मारा। माँ ने और जोर से चीखी — “आह्ह्ह… फिर मार… बेटा… अपनी माँ की गांड़ मार…”
मैंने उन्हें नीचे लिटाया और साइड में लेटकर चोदना शुरू किया। एक हाथ उनकी छाती पर, दूसरा उनकी चूत पर। माँ अब बिल्कुल पागल हो चुकी थीं। “हाँ… आह्ह्ह… चोद… फाड़ दे… मैं तेरी रंडी हूँ आज रात… आह्ह्ह…”
बीस मिनट बाद माँ ने कहा, “बेटा… मैं फिर झड़ने वाली हूँ…” मैंने स्पीड और बढ़ा दी। माँ का शरीर अकड़ गया। “आह्ह्ह्ह्ह… रोहन… आह्ह्ह…!” वे जोर से झड़ गईं। उनकी चूत ने मेरे लंड को और कस लिया।
मैं भी रुक न सका। “माँ… मैं भी…” “अंदर ही छोड़ दे बेटा… अपनी माँ की चूत में…”
मैंने जोर से झटका मारा और उनके अंदर ही झड़ गया। गरम वीर्य की फुहारें माँ की चूत में भर गईं। माँ ने आँखें बंद कर लीं और लंबी साँस ली। “आह्ह्ह… भर दिया… अपनी माँ की चूत भर दी…”
हम दोनों थककर एक-दूसरे से लिपटकर लेट गए। मेरा लंड अभी भी उनकी चूत के अंदर था। बाहर कंडक्टर के कदमों की आवाज़ आ रही थी। हम दोनों की साँसें एक हो चुकी थीं।
कुछ देर बाद मेरा लंड फिर खड़ा होने लगा। माँ ने महसूस किया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “फिर से…?”
मैंने उन्हें पीठ के बल लिटाया और फिर से चोदना शुरू किया। इस बार और धीरे-धीरे, गहरे-गहरे झटके। माँ की आँखों से आँसू आ रहे थे, लेकिन वे बार-बार “हाँ… और… आह्ह्ह…” बोल रही थीं।
सुबह पाँच बजे तक हम दो बार और चोद चुके थे। आखिरी बार माँ ने खुद मुझे नीचे लिटाया और ऊपर बैठकर चोदा। जब मैं झड़ने वाला था तो माँ ने कहा, “मुँह में दे… इस बार मुँह में…”
मैं उनके मुँह में झड़ गया। माँ ने फिर सारा पी लिया।
सुबह छह बजे बस इंदौर पहुँचने वाली थी। हम दोनों जल्दी से कपड़े पहन लिए। माँ ने मुझे देखा और धीरे से कहा, “ये बस की रात… कभी किसी को नहीं बताना… समझा?”
मैंने सिर हिलाया। लेकिन मन में पता था कि ये रात हम दोनों के लिए कुछ और भी बन चुकी थी।
आगे की कहानी : "ढाबे में खुला माँ-बेटे की चुदाई का राज!"
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