चटाई वाली सविता भाभी! 02

Antarvasna Sex : घर खाली पाकर देवर ने भाभी को चाय देते दिखाया 6 इंची लंड! और गांड से सटाया! विधवा होने का हवाला देकर जगाई Kamvasna! फिर चूत और मदद का दिया सौदा!


अभी तक आपने "चटाई वाली सविता भाभी!!" में पढ़ा :-


"दिन बीतते गए। निकलने का कल तय था। रेलवे की बुकिंग हो चुकी थी। मैंने बैग भरकर ऐसा रेडी रखा कि जानबूझकर कुछ किया हो, पता न चले। रात खाने पर अचानक सिर पर हाथ रखा, टेंशन का नाटक किया।


माँ झट पूछीं, “बेटा, क्या हुआ? कोई परेशानी है?” पापा भी देखने लगे।


“माँ, कॉलेज का एक सबमिशन था। भूल गया। तीन दिन में पूरा करके देना है, वरना मैडम फेल कर देंगी।”


पापा खुद बोल उठे, “तो वहाँ आने की कोई जरूरत नहीं। यहीं बैठ, पढ़ाई कर। यही तेरी सजा है अब।” माँ कुछ न बोल सकीं।


“ठीक है। बस अपना ख्याल रखना। कुछ लगे तो बाजू वाली आंटी से माँग लेना। और सुन, मैं तेरी मामी को डिब्बा देने को कह देती हूँ। वहाँ जाकर ले आना।”


मुराद पूरी होने वाली थी। “माँ, चिंता मत कर। सब सँभाल लूँगा। अच्छे मार्क्स लाने हैं इस बार। वरना मैं भी साथ चल पड़ता।” दोनों खुश हो गए। खाना शांति से हुआ। सब सो गए।


पूरी रात नींद नहीं आई। क्या होगा, कैसे होगा, अगर मना कर दिया तो, अगर माँ को कह दिया तो - बवाल, घर से बाहर का रास्ता। सुबह टैक्सी बुक की, उन्हें रेलवे पर बिठाया, वापस आया। शनिवार था। अब बस कल का इंतजार। सविता हर रविवार आती थीं।


शाम होते-होते मैं बिस्तर पर लेटा सविता भाभी के खयाल में डूबा। लंड बाहर निकाला, शीशे में देखा। उन्हें सोचते-सोचते छह इंच का लंड तन गया, शीशे में समा ही नहीं रहा था।


दस-पंद्रह मिनट हाथ चलाया, सविता का नाम लेते-लेते हाथ पर ही झाड़ दिया। बहुत दिनों बाद हिलाया था। गाढ़ा, गरम वीर्य निकला। कंट्रोल नहीं रह रहा था।


मन में खयाल आने लगे - कल आई ही नहीं तो? दिल की बात कह दी और मना कर दिया तो? माँ को बता दिया तो?"


अब आगे :-


तभी फोन बजा। मामी थीं, “खाना तैयार है, ले जाओ।” डिब्बा लिया, खाया, फिर बिस्तर पर सविता के खयालों में डूब गया। नींद कब लगी, पता नहीं चला।


सुबह आठ बजे मामी का कॉल आया, नाश्ते के लिए। नींद खुली तो नजर लंड पर गई। साला सुबह-सुबह एकदम खड़ा। जैसे आज कोई जंग हो और वो दुश्मन को पेलने के लिए तैयार खड़ा हो।


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मोटा और छह इंच होने की वजह से उत्तेजित न भी रहूँ तब भी आकार थोड़ा-थोड़ा दिख ही जाता था। इसीलिए लंगोट पहनना शुरू किया था, उसके ऊपर अंडरवियर - ताकि किसी को शेप न दिखे।


लंड शांत किया, मामी के घर डिब्बा लेने निकला। मामा घर पर थे, मामी ने कहा यहीं नाश्ता करके जाना। बातें करते नाश्ता हुआ। घर आते-आते साढ़े नौ बज गए। मामा का घर थोड़ा दूर था।


आते ही नहाने चला गया। आज एक-एक अंग घिसकर नहाया। सविता लगभग ग्यारह से बारह के बीच आती थीं। बाल सेट किए, परफ्यूम मारा, राह देखने लगा। दिमाग में प्लान बैठ चुका था।


जानबूझकर सबसे टाइट लोअर पहनी, अंदर अंडरवियर नहीं। चाह था कि वो अपनी आँखों से मेरा छह इंच मोटा लंड देखें और पागल हो जाएँ।


सोफे पर मोबाइल देख रहा था कि घंटी बजी। धड़कन तेज हो गई। डोर होल से देखा — बाहर सविता भाभी खड़ी थीं। खुशी का ठिकाना न रहा। मन में चिल्ला रहा था। लंड की नसें खड़ी हो गईं।


खुद से बोला, अभी नहीं, जरा वक्त दे। फिर कोई नहीं रोकेगा। दरवाजा खोला।


सामने हरी साड़ी में खड़ी थीं। साड़ी पुरानी, ब्लाउज कंधे पर थोड़ा फटा। फिर भी अप्सरा से कम न लगीं। कटीला बदन, दिखती नाभि, बड़ी मोटी गांड — जैसे सब पुकार रहे हों।


बहुत दिनों से प्यास न बुझी हो और इस रेगिस्तान में एक मैं ही बुझा सकूँ।


सविता बोलीं, “अरे, मुझे यहाँ खड़ा रखोगे? अंदर आने को भी पूछोगे?” मैं घूरता रह गया।


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“सॉरी भाभी। ध्यान कहीं और था। आइए, अंदर आइए। बैठिए।”


वो मुस्कुराईं और अंदर आ गईं। हमेशा की तरह नीचे बैठीं। “बेटा, जरा पानी पिला दे। आज बहुत चलना हुआ। और दीदी कहाँ हैं, उन्हें भी बुला दे।”


पानी देने गया। गिलास देते हुए बोला, “माँ-पापा दीदी के यहाँ चले गए। पंद्रह-बीस दिन बाद ही आएँगे।”


यह सुनते ही वो मायूस हो गईं। शायद माँ को बहुत कुछ कहना था। निराशा चेहरे पर साफ थी। अब उन्हें अच्छे से देख पा रहा था। मंगलसूत्र नहीं था। सिर्फ बिंदी। माँग खाली। सौंदर्य और उभर आया था।


“भाभी, माँ ने आपके पति के बारे में बताया। बहुत बुरा हुआ। अब आप कैसे हो? ठीक तो हो ना?”


“हाँ अमेय, अब ठीक हूँ। मायके गई थी थोड़े दिन। दो हफ्ते हुए लौटकर आई हूँ।”


“बेटी कहाँ है? वो ठीक है ना?”


“हाँ, ठीक है। वहीं छोड़ आई हूँ। अब दादी के यहाँ बड़ी होगी, पढ़ेगी।”


“तो आप यहाँ अकेली रहोगी?”


“हाँ। पैसे कमाने के लिए किसी को तो इधर रुकना पड़ेगा ना।”


“सही कहा। रुकिए, चाय बनाता हूँ। बढ़िया सी।”


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वो झट से मना करने लगीं। “तू बस बैठ। कुछ मत बना। अब निकलने वाली हूँ। तेरी माँ होतीं तो बात करके मन हल्का होता। अब क्या करे।” चटाइयाँ उठाने लगीं।


मैंने जोर दिया। “चाय तो पीनी ही होगी।” अंदर बनाने चला गया। आग्रह देखकर रुक गईं। “चल ठीक है, थोड़ा सा ही बना। ज्यादा नहीं।” फिर बैठ गईं।


सामने देखकर नर्वस हो गया। लंड नीचे लटक गया था। सोचा, अब वक्त है हथियार दिखाने का। चाय गैस पर रखी और लंड सहलाने लगा।


आँख बंद कर सविता को देखा - छह इंच की हालत में आ गया। तभी चाय उबलकर ऊपर आई। महक पूरे घर में फैल गई। हॉल से आवाज आई, “अरे वाह, खुशबू बहुत अच्छी आ रही है अमेय। तुम तो सब सीख गए।”


मैं हँसकर बोला, “हाँ भाभी, अब बड़ा हो गया हूँ। सब सीख रहा हूँ।”


चाय कप में डाली। लंड का आकार अब पूरी तरह दिख रहा था — मोटा, लंबा। ट्रे के पीछे छुपा लिया। जानबूझकर ट्रे नीचे पकड़ी और सविता को चाय देने निकला। वो नीचे बैठी थीं।


मैं झुका और ट्रे उनके सामने ले गया। प्लान वही था - जैसे ही कप उठाएँ, ट्रे बाजू करूँ, लंड उनके सामने आ जाए।


सविता ने कप उठाया। पहले नजर चाय पर थी। कप उठते ही पैंट के अंदर का लंबा लंड उनके सामने आ गया। अंडरवियर नहीं थी, इसलिए emerg कर साफ दिख रहा था।


मैंने उनका चेहरा देखा। आँखें फटी की फटी रह गईं। बस वहीं देखे जा रही थीं। अचानक होश में आईं और कप मुँह से लगाया। चाय एकदम गरम थी। मुँह जल गया। जोर से चिल्लाईं। थोड़ी चाय ब्लाउज पर गिर गई।


मैं वहीं था। झट से मग में पानी लाया, दिया और बोला, “क्या हुआ भाभी? आराम से पियो ना, गरम है। दिखाइए क्या हुआ।”


“अरे कुछ नहीं। ज्यादा ही गरम थी।” पानी पिया। ये Desi Sex Ki Hindi Sex Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!


मैं उनके सामने ऐसे खड़ा रहा कि खड़ा छह इंच का लंड साफ दिखे। वो चाय पी रही थीं। जब-जब कप मुँह से लगातीं, उतना समय मेरे लंड को घूरतीं। फिर थोड़ा मेरी तरफ देखकर मुस्कुरातीं और बात जोड़ लेतीं। समझ रहा था, वो भी उत्तेजित हो रही हैं।


मैंने थोड़ा-थोड़ा लंड को उनके सामने सहलाना शुरू किया। ऐसा करते ही लंड और तन गया। लग रहा था पैंट फाड़कर बाहर आ जाएगा। भाभी वो सब देख रही थीं। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।


चाय खत्म की और बोलीं, “चलो, मैं निकलती हूँ। माँ को बता देना मैं आई थी।” खड़ी हुईं। खड़े होते ही पल्लू नीचे गिर गया। पूरा बदन सामने था। ब्लाउज का ऊपर वाला बटन टूटा हुआ था। आधे स्तन दिख रहे थे। सिर्फ बीच का बटन लगा था, नीचे सेफ्टी पिन। गरीब थीं, सुंदर बहुत।


गोल स्तन ब्लाउज से बाहर आना चाहते थे। चुचियाँ फिर दिखीं - बड़ी और खड़ी। चेहरा साँवला था, छाती गोरी। शायद मेरा लंड देखकर वो भी गरम हो चुकी थीं। मैं पास था, उनकी निगाह मुझ पर ही गड़ी थी। लोहा गरम था, बस घाव की देर थी।


पल्लू उठाया और सोफे के पास जाकर खड़ी हो गईं। मैं भी झट उनके पास गया। अनजाने-से इतना करीब चला गया कि खड़ा लंड उनके पिछवाड़े से हल्का सा लग गया।


भाभी असहज हुईं। थोड़ा आगे खिसकीं, मेरी तरफ मुड़ीं और बोलीं, “अमेय, ये क्या चल रहा है तुम्हारा? तुम इतने पास क्यों आकर खड़े हो गए हो?” आवाज में थोड़ा गुस्सा था, थोड़ी घबराहट। सब एकदम अचानक हुआ था इसलिए वो घबरा गई थीं।


मैंने हिम्मत करके मन बना लिया था - अब मुँह से कहना बाकी था। “देखो सविता, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ। पहले शांत हो जाओ और मेरी बात सुनो।”


“क्या? कौनसी बात?”


“पहले यह वादा दो कि गुस्सा नहीं करोगी। तभी बताऊँगा।”


वो थोड़ी सीरियस हो गईं। मेरी तरफ देखकर बात करने लगीं। “ऐसी कौनसी बात करने वाले हो कि मुझे गुस्सा आए? पहले बताओ, फिर मैं सोचूँगी।”


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“मैं घुमा-फिराकर नहीं बोलने वाला भाभी। मुझे आप बहुत पसंद हो। जबसे देखा था, तभी से चाहने लगा था।


तब आप शादीशुदा थीं और मैं बहुत छोटा था। समझ नहीं पाता था यह क्या है, इसलिए कुछ बोल नहीं पाया। अब समझ आ रहा है। मैं आपके प्रति हमेशा आकर्षित होता हूँ।”


इतना सुनते ही सविता चौंक गईं। शायद हज़म न हो रहा हो।


“अमेय, ये तुम क्या बोल रहे हो? तुम्हारी उम्र ही क्या है। तेरी माँ और मैं अच्छी दोस्त हैं। तुझको मैंने ऐसी निगाहों से…” इतना कहते-कहते मैंने उनके होठों पर हाथ रख दिया। “रुको जरा भाभी। पहले मेरी बात तो सुनो।”


वो मुझे देखती रहीं। रुकीं। मेरा हाथ हटाया। “क्या अब बोलना बाकी है, इस सब के बाद भी? ठीक है, बोलो।”


“जरा आराम से सोचो। अब आपके पति का देहांत हो चुका है। बेटी भी आपके पास नहीं रहती। आपकी भी कुछ इच्छाएँ होंगी। आप अभी जवान हो।


चटाई बेचना भी कुछ दिनों बंद था, हालत ठीक नहीं है।  ऐसी परिस्थिति में साथ देने वाला कोई चाहिए होगा या नहीं - आप ही बताओ। मैं वो सारी मदद करूँगा… और आप मेरी मदद करना।”


बीच में बोलीं, “तुम्हारी मदद? कैसी मदद? और मुझे कौनसी मदद तुम करोगे?”


“भाभी, आप समझ नहीं रहे। मैं अब जवान हो चुका हूँ। मेरी भी कुछ जरूरतें हैं। आपकी भी।” मैंने उनका हाथ अपने हाथ में लिया। सविता को सब समझ आ रहा था - मुझे उनसे क्या चाहिए। फिर भी भोली बन रही थीं। हाथ छुड़ा लिया।


वो जबसे आई थीं, बिना कुछ बोले मेरे लंड को घूरे जा रही थीं। मतलब साफ था - मन में बहुत सारी इच्छाएँ दबी थीं।


अगर गलत लगता तो कब की चली गई होतीं, या साफ-साफ मना कर देतीं। ऐसे बैठकर मजा नहीं लेतीं। बस घबरा गई थीं कि सब इतनी जल्दी और अचानक हो गया। शायद सोचा भी न हो कि मैं उनसे ऐसा पूछूँगा भी। मैंने सारा आत्मविश्वास जुटाकर वही पूछ लिया था।


आगे की कहानी :- "सविता भाभी बारिश में चुदने आई!"

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Nice story
Lekin complete kro yrrr
Kisi ko apni chut chatwani ho msg me.
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