मेट्रो में फाड़ दी प्रेमा आंटी की चूत!
Public Sex XXX : दिल्ली मेट्रो की भीड़ में प्रेमा आंटी की बिना पैंटी वाली चूत पर दबाया लंड! Antarvasna से टनल में खड़ी-खड़ी फाड़ी चुत! और कोख में उतारा माल!
कैसे हो दोस्तो मैं हूं हाशमी Garamkahani की चुदाई और वासना भरी कहानियां पढ़ना अब तो एक आदत सी बन गई।
आज मैने सोचा आप लोगों को अपनी एक कहानी सुनाऊँ जो पिछले महीने में चल रहे दिल्ली के आंदोलन से जुड़ी थी।आप जानते होंगे उन दिनों दिल्ली के मेट्रो स्टेशन ठीक से नहीं चल रहे थे आधे बंद थे आधे खुले थे इस वजह से भीड़ भी बहुत थी।
मुझे सीलमपुर से साकेत की तरफ एक शादी में जाना था रस्ते में जाते हुए।
मैने सोचा मेट्रो ले लेता हूं उस समय तक मुझे नहीं पता था मेट्रो की हालत कैसी है।
मैं यू. पी. से चला और सीलमपुर से मेट्रो ली लेकिन जैसे ही नई दिल्ली वाले मेट्रो स्टेशन जाने लगा तो भीड़ बढ़ने लगी।
मेरे आगे अचानक एक औरत आकर खड़ी हुई जो मुझसे उम्र में बड़ी थी शायद 35 के आसपास की होंगी।
मेरी उमर 27 है दिखने में ठीक ठाक लगता हूं उस दिन मैने जो शर्ट पहनी थी उसका एक बटन खुला था तो सीने के बाल साफ दिख रहे थे।
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सुबह का समय था उन मैडम को देखकर लगा शायद वो कही से कसरत कर के आ रही होंगी। उनके जिस्म से पसीने और परफ्यूम की बहुत तेज़ खुशबू आ रही थी।
उनका जिस्म दिखने में बिल्कुल आग जितना गर्म था मैने एक नज़र भर के उनको नीचे से ऊपर तक देखा।
भरी भरी टांगे जो टाइट पजामे में चमक रही थी टांगों की गोलाई मादक लग रही थी ।
घुटने से ऊपर जांघों का मोटापन मखमली एहसास दे रहा था।
पजामा इतना टाइट था के चूत के बीच गहराई की लकीर चमक रही थी उससे ऊपर 36 की गांड़ बेहद कामुक थी। उनकी 30 की कमर और पेट पर दिखती पसीने की बूंदे मेरे तापमान को बड़ा रही थी।
न जाने क्यों लेकिन मेरा मन उन बूंदो को चूमने का कर रहा था। उससे ऊपर एक नीली कुर्ती थी जिसमें उनकी ब्रा का आकार दिख रहा था। ब्रा के ऊपर उनका खुला सीना था जिसपर वही मदहोश करने वाली पसीने की बूंदे थी ।
उनके होठ कांप रहे थे और आंखे मुझे ही देख रही थी। उनकी आँखें मुझे गुस्से में घूर रही थी।
जैसे ही मुझे एहसास हुआ की मैडम ने मुझे ताड़ते हुए देख लिया है तो मेरे सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। मैने अपनी नज़रे उनके जिस्म से न चहते हुए हटाई और इधर उधर देखने लगा।
मैडम घूमकर खड़ी हो गई न्यू दिल्ली मेट्रो स्टेशन से आगे चलकर मेट्रो एक टनल में रुक गई।
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उसमें इमरजेंसी लाइट्स जल गई और आपस में लोगों ने अपने मोबाइल की फ्लैश जलाली एक लड़का बोला ये सब हमारे आंदोलन को रोकने की चालाकी है।
उसके बोलते ही चहल पहल होने लगी मैं अपने पीछे वाले पोल से लगकर खड़ा था।
वो मैडम भी मुझसे बिल्कुल चिपक गई उनकी गुब्बारे जैसी गांड़ मेरे लंड पर दब गई।
उन्होंने पीछे मुड़कर मुझे सोरी कहा और बोली “भीड़ बहुत है यहां।" मैने भी कह दिया कोई बात नहीं।
वैसे भी कौन बेवकूफ होगा जिसे उन जैसे मैडम के करीब आने से दिक्कत हो।
मैडम ने पैंटी नहीं पहनी थी मेरे हाथ में फोन था और एक हाथ से हंगर पकड़ा था मैडम की गांड़ मेरे लंड पर दबी जा रही थी ।
मुझे मज़ा आ रहा था मैडम ने पूछा " कहा जा रहे हो तुम” मैने बताया की एक शादी में जाना है।
मैने भी उनसे पूछ लिया के वो कहा जाएंगी “उन्होंने बताया घर जाना है लेकिन रस्ते बंद है तो मेट्रो लेने की गलती कर दी मैने।"
मैने मैडम का चेहरा देखा हल्की रोशनी में वो चंद की तरह चमक रही थी।
गोल मोल प्यारा सा चेहरा, बड़ी और नशीली आंखे, मोटे चटक लिपस्टिक वाले होठ।
उनके होठों को जैसे इंतज़ार था के कोई उन्हें चूमे, उनके नर्म से गाल और गहरे काले बाल थे मैने उन्हें इतनी गौर से देखा की मैडम भी शर्मा गई।
वो मेरी तरफ गांड़ दबाकर पलट गई और मुझसे चिपकने लगी।
मेट्रो में बहुत ज़्यादा भीड़ थी हल्की धक्का मुक्की हो रही थी जितनी हलचल होती उतना लंड उनकी गांड़ पर दबता।
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मुझे हल्के पसीने आ रहे थे मेट्रो में धीरे धीरे फोन की लाइट कम होने लगी थी और अंधेरा होता जा रहा था। बस इमरजेंसी लाइट्स की रोशनी थी जिसमें मुझे उन मैडम का खूबसूरत सा चेहरा दिख रहा था।
मेरे सिर पर वासना सवार होने लगी थी शायद मैडम का भी यही हाल था वो अब मेरे लंड पर गांड़ दबा रही थी।
थोड़ी जगह लेकर वो मेरी तरफ पलट गई, उनकी और मेरी लंबाई तकरीबन बराबर थी।
मैने भी अपना फोन नीचे कर लिया मैने उनसे पूछा “आपका नाम क्या है?" उन्होंने अपना नाम प्रेमा बताया और मुझसे भी पूछी।
“आप नहीं जा रहे आंदोलन में।" मैने कहा मुझे दिलचस्पी नहीं वो बोली के उनको भी दिलचस्पी नहीं बातों बातों में प्रेमा जी के हाथ मेरी शर्ट का बटन पर थे।
प्रेमा जी के पीछे कोई लड़की खड़ी थी उसके आगे कोई लड़का था जो उसका बॉयफ्रेंड रहा होगा। उस लड़के का हाथ लड़की के ब्रा के अंदर था उन्हें देखकर मेरा तापमान बढ़ने लगा।
मैने प्रेमा जी को देखा वो मुझे ही देख रही थी उनके चेहरे पर मुस्कान थी मेरी हवाइयां उड़ी हुई थी। कौन ये सोचकर सुबह उठता होगा के मेट्रो में एक अप्सरा के साथ फंसेंगे।
प्रेमा जी की चूत मेरे लंड पर दब रही थी उन्होंने पैंटी नहीं पहनी थी मेरा लंड चूत में अंदर दब रहा था।
उनके और मेरे होठ धीरे धीरे करीब आ रह थे मुझे डर था कोई देखना ले लेकिन प्रेमा जी की नज़रे सिर्फ मेरे ऊपर थी।
उनके चेहरे लग रहा था मेरी अगली हरकत हमारे आगे आने वाले सफर को तय करेगी।
मैने कही सुना था एक मर्द और औरत के होठों की दूरी जब 2 इंच से कम होने लगे तो किसिंग के अलावा दूसरा कुछ नहीं होना चाहिए।
मुझे पता नहीं क्या हुआ मैने उनके होठों को चूमा और पीछे हो गया। मैं घबराया इतना की पसीने तेज़ हो गए। मैने प्रेमा जी को देखा उनकी आँखें बंद थी , वो भी अनजान थी मैं भी अनजान था ।
इस मेट्रो के सफर ने दो जिस्मो इतना करीब कर दिया जितना दो लोग सालों साल नहीं आ पाते।
मैं रुका रहा तो प्रेमा जी मुस्कुराकर बोली “क्या करते हो तुम" मैने बता दिया मैं कहानियां लिखता हूं ।
तो वो बोली “हमारे ऊपर भी एक कहानी लिखना इस पल के बारे में।"
मैने हां में सर हिला दिया फिर प्रेमा जी ने मेरे बालों में हाथ लेजाकर मेरे चेहरे को नीचे करा और होठों पर अपने होठ लगाकर मुझे आगे बढ़ने का सिग्नल दे दिया।
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भीड़ की वजह से मैं उनको बहुत ज़्यादा नहीं चूम सकता था फिर भी उन हसीन लबो को कुछ पल मैने चूसकर रस पी लिया।
प्रेमा जी इंतज़ार कर रही थी मैने अपना हाथ कांपते अंदाज़ में नीचे करा और उनके पजामा को नीचे कर दिया।
उसके बाद मैने अपना लंड पेंट से निकाला और उनकी चूत के छेद पर लगा दिया। एक असमंजस भरे माहौल में दो जिस्म भीड़ में इस तरह से मिल रहे थे। जिसके बारे में पूरे देश ओ दुनिया में बस दो लोग जानते थे एक प्रेमा जी और एक हाशमी।
अचानक मेट्रो में एक झटका आया प्रेमा जी के पीछे जो लड़की थी वो उनके ऊपर टिकी और प्रेमा जी मेरे लंड पर चढ़ गई।
एक ही झटके में पूरा लंड उनकी चूत को चीरते हुए अंदर घुस चुका था। उनके मुंह से आआआह! एक मोहक सिसकी निकली।
मैने उनको संभालें के लिए कमर पकड़ ली पीछे से लड़की बोली सोरी! मेरे मन से निकला थैंक यू।
प्रेमा जी ने शुक्र भरी आंखों से “ कोई बात नहीं" बोला। प्रेमा जी ने मेरे पीछे का पोल पकड़ लिया और मैने धीरे धीरे धक्के लगने शुरू करे।
ह्म्म्ममम! ऑफ़फ अआआह! इच्ह्ह आअआअह। ह्म्म्ममम! ऑफ़फ अआआह! इच्ह्ह आअआअह, ह्म्म्ममम! ऑफ़फ अआआह! इच्ह्ह आअआअह। की दबी आवाज़ प्रेमा जी करने लगी।
मेरा गर्म लंड उनकी गीली भट्टी जैसी गर्म चूत में अंदर बाहर होता जा रहा था। वो भी अपनी तरफ से चूत को लंड पर धकेल रही थी। उन्होंने अपने सर को मेरे सीने पर रख लिया। वो मुझे गले लगा रही थी हवस भरे इस माहौल में एक प्यार भरा एहसास मिल रहा था।
मैने उनके चेहरे को देखा उनकी आंख में आंसू था वो बोली " मुझे तुम्हारे सीने के बाल पसंद आए।” मैं थोड़ा शर्मा गया।
हमने धक्के लगाने बंद कर दिए थे मेट्रो की भीड़ और ये पल अपनी पूरी कोशिश में था के हम दोनों करीब आजाए।
ये चुदाई समय की चालाकी लगी मुझे तो लगा भीड़ को समय ने आज बस इसलिए तैयार करा के प्रेमा जी के साथ चुदाई हो सके।
जितना हलचल बढ़ती उतनी हमारी चुदाई बढ़ती जाती। हम अपनी आहे काबू करने की कोशिश कर रहा थे।
उनका चेहरा मेरे सीने में छुपा था मेट्रो शुरू हो गई थी लेकिन भीड़ बहुत थी लाइट आ गई मगर कोई हमें देख नहीं सकता था।
वो मुझे गले लगाए चूत में लंड ले रही थी मैं भी उनकी कमर पकड़े अपनी तरफ से ज़ोर लगा रह था।
ह्म्म्ममम! ऑफ़फ अआआह! इच्ह्ह आअआअह। ह्म्म्ममम! ऑफ़फ अआआह की आवाज़ हमारी सांसों में थी।
मेरा लंड बिल्कुल गर्म और गिला था प्रेमा जी मुझे देखकर बोली “काश ये पल कभी खत्म न होता मगर अब स्टेशन आने वाल है।"
हमने अपनी चुदाई में थोड़ी तेज़ी दिखाई उन्होंने एक पैर इस तरह मेरी जांघ पर रखी के चूत के अंदर लंड पूरा जा पा रहा था।
कुछ पांच मिनट में मस्त चुदाई करते करते और वासना की आग में जलते जलते हम चरमसुख को पोहचे ।
मैने अपना सारा पानी प्रेमा जी की चूत में उतार दिया उन्होंने भी चूत को भरते हुए महसूस करा।उन्होंने मेरे होठ पर जल्दी से चूमकर अपना पजामा ऊपर कर लिया। पहला स्टेशन आते ही मेट्रो खाली हो गई सब क्रांतिकारी लोग उतर गए।
अगले स्टेशन तक मैं और प्रेमा जी एक सीट पर सुकून से बैठे रहे उनका सर मेरे कंधे पर था मैं उनके बाल सहला रहा था।
वो मेरे लंड को सहला रही थी वहीं हमने अपने नंबर बदले और अपने अपने रस्ते चले गए बस एक वादे के साथ के आज की मुलाकात पूरी जल्द ही होगी।
उस आंदोलन वाली मेट्रो ने मुझे मेरे सफर का एक साथी दे दिया जिससे मिलने का मुझे अब बेसब्री से इंतज़ार है।
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