सोते भाई का दीदी ने थामा लंड! - घर की बातें!
New Hindi Sex Stories - बेटे ने सुबह फिर माँ की चूत फाड़ भरी कोख! टेबल तले चुत में डाली उँगली! सुबह नंगे सोते देख दीदी ने सहलाया लंड! फिर माँ ने पकड़ा रंगे हाथ!
इस भाग "मदारचोद बेटे ने फाड़ दी चूत! - घर की बातें!" में आपने पढ़ा :-
मैं बाथरूम की तरफ़ बढ़ा, अपने कमरे से कपड़े लिए। कॉमन बाथरूम का दरवाज़ा हाथ लगाते ही एक बात याद आई - इस बाथरूम का दूसरा मुँह दीदियों के कमरे में खुलता है। सुबह-सुबह लॉक की आदत अभी भी नहीं थी।
दरवाज़ा खोला।
शावर चल रहा था। भाप भरी थी। श्रुति दीदी पानी के नीचे खड़ी थीं। पूरा बदन नंगा। मुँह दूसरी तरफ़ था, गाँड मेरी तरफ़। संगमरमर जैसी गोरी त्वचा। फिगर चौंतीस-तीस-छत्तीस। एक हाथ नीचे था।
उँगली उनकी अपनी चूत में अंदर-बाहर हो रही थी। आँखें बंद थीं। उन्हें पता भी नहीं चला कि दरवाज़ा खुला है।
मैं दहलीज़ पर रुक गया। लंड जो सुबह नरम होकर सोया था, फिर तन गया।
दीदी की उँगली की रफ़्तार धीमी थी, जैसे जल्दी में न हों, जैसे रात की कोई बात दोहरा रही हों। उनके होठों पर वही दबी आह थी जो कभी दीवार के उस पार से आती थी।
मैं कुछ सेकंड और खड़ा रहा। फिर पीछे किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
माँ थीं। बाल अभी भी बिखरे, नाइटी वही। उन्होंने मेरी आँखों का रास्ता देखा - श्रुति की नंगी पीठ, उनकी उँगली, मेरा खड़ा लंड। माँ के चेहरे पर गुस्सा नहीं आया। उन्होंने सिर्फ़ दरवाज़ा बंद करने का इशारा किया।
फुसफुसाहट में कहा, “माँ, मुझे दोनों सिस्टर्स का फिगर बहुत पसंद है।”
माँ की नज़र एक पल मेरे लंड पर गई, फिर अंदर भाप वाले शीशे पर। “अच्छा! मैं कुछ उपाय करती हूँ। मदारचोद के साथ बहनचोद बनाने के लिए!”
इतना कहकर वो खड़ी रहीं। मैंने हाथ उनकी गाँड पर रखा। नाइटी के नीचे पैंटी नहीं थी। माँ पीछे नहीं हटीं।
मैंने उनके होठ अपने होठों पर रख दिए। सुबह की पहली चूत अभी सूखी भी नहीं थी, और बाथरूम के उस पार उनकी बेटी अपनी उँगली से वही आग बुझा रही थी।
माँ ने चुंबन तोड़ा। आवाज़ बहुत धीमी रखी, “पहले दरवाज़ा बंद कर मदारचोद! फिर मुझे अपने बिस्तर पर ले चलना!”
आगे की कहानी :-
माँ की फुसफुसाहट अभी कान में गूँज रही थी — पहले दरवाज़ा बंद कर मदारचोद, फिर मुझे अपने बिस्तर पर ले चलना।
मैंने बिना देर किए बाथरूम का वो दरवाज़ा धीरे से बंद किया, जिसकी दूसरी तरफ़ श्रुति अभी भी शॉवर के नीचे खड़ी थी। पानी की आवाज़ दीवार के उस पार साफ़ आ रही थी।
माँ मेरे बिल्कुल पीछे थीं। नाइटी पतली थी, नीचे पैंटी नहीं थी। सुबह की उनकी अपनी चूत अभी भी गीली थी - रात वाले वीर्य की नमी और इस नई हवस ने उन्हें एक साथ पकड़ रखा था।
मैंने उन्हें गोद में उठाया। माँ हल्की थीं, या फिर मेरे हाथों में उस समय ताकत ज़्यादा लग रही थी। गलियारे से अपने कमरे तक चार कदम थे। दरवाज़ा कंधे से धक्का देकर बंद किया।
माँ को बिस्तर पर लिटाते ही नाइटी ऊपर खिसक गई। दोनों जाँघें खुल गईं। चूत साफ़ दिख रही थी - रात की सूजन अभी पूरी बैठी नहीं थी, होंठ थोड़े फूले हुए, बीच की रेखा चमक रही थी।
माँ ने मेरा सिर पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया।
“देख ले मदारचोद, तेरी बहन नंगी उँगली कर रही है उसी बाथरूम में… और तू यहाँ मेरी चूत फाड़ने आया है। शर्म नहीं आती?”
“शर्म सुबह चार बजे उतर गई थी माँ। जब तूने खुद लंड थामा था।”
माँ हँसी नहीं। उन्होंने टी-शर्ट खींचकर मेरे सिर के ऊपर से निकाल दी। लुंगी पहले ही कमर से नीचे थी। खड़ा लंड उनकी जाँघ पर गिर गया। माँ ने उसे पकड़ा, सुपाड़े पर अंगूठा फेरा, फिर अपनी चूत के मुँह पर रख दिया।
“डाल। आज सुबह धीरे चुदाई की ज़रूरत नहीं। रात को जो चुत तूने फाड़ा है, वो अभी बंद नहीं हुआ। अंदर घुसा और निकालना मत जब तक मैं न बोलूँ।”
मैंने एक झटके में लंड भीतर कर दिया। रात की चुदाई से रास्ता बना हुआ था, फिर भी माँ की चूत ने जड़ तक जकड़ लिया।
माँ के मुँह से एक लंबी आवाज़ निकली, दाँत भींच लिए, नाखून मेरी पीठ पर चले। मैंने एक स्तन मुँह में लिया, दूसरे को हाथ से मसलने लगा। धक्के छोटे नहीं थे।
बिस्तर की चर्र-चर्र दबाने की कोशिश की, क्योंकि दीवार के उस पार पानी अभी बंद नहीं हुआ था।
“आह… हाँ… वहीं… थोड़ा और अंदर… तेरी बहन को पता नहीं चलना चाहिए कि माँ इस वक्त बेटे के लंड पर बैठी है।”
“पता चल जाए तो?” मैंने साँस के बीच पूछा।
माँ ने आँखें खोलीं। उस निगाह में डर नहीं था। “तो वो भी सीख लेगी और भाई को बहनचोद बना लेगी! घर की बात घर में रहती है। तू सिर्फ़ चोदता रह।”
दस-पंद्रह मिनट वही लय रही। कभी गहरा, कभी बाहर तक खींचकर फिर जड़ तक।
माँ के स्तन मेरे मुँह और हाथ में काँपते रहे। उनकी चूत हर धक्के पर पानी छोड़ रही थी, मेरी जाँघें गीली हो गई थीं। मैंने रफ़्तार बढ़ाई तो माँ की कमर उठी, दोनों टाँगें मेरे पीछे लिपट गईं।
“अब निकालने वाला है माँ।”
“अंदर ही छोड़। बाहर मत निकालना। सुबह-सुबह मेरी कोख फिर से गर्म हो जाए।”
दो झटके और पिचकारी छूटी। पूरा वीर्य उनकी चूत में गया। माँ की एक लंबी सिसकी निकली, शरीर ढीला पड़ा, फिर भी उन्होंने लंड को अंदर ही रखा। कुछ देर हम वैसे ही पड़े रहे।
बाहर शॉवर की आवाज़ रुक गई। नल की एक आखिरी बूँद गिरी, फिर खामोशी।
माँ ने धीरे से मुझे सरकाया, चूत से लंड निकला तो सफ़ेद धार उनकी जाँघ पर बह निकली। पास पड़ा तौलिया उठाकर उन्होंने खुद को पोंछा, फिर मेरे लंड को भी एक बार साफ़ किया - जल्दी-जल्दी, जैसे कुछ हिसाब पूरा करना हो।
दरवाज़े तक जाते-जाते मुड़ीं। आवाज़ सामान्य कर ली, जैसे किचन का काम याद आ गया हो।
“मैं तुझे पूछने आई थी - ऑमलेट खाएगा या उबला अंडा?”
मैं बिस्तर पर नंगा लेटा रहा। “जो तू बना दे माँ।” यह XXX Desi Sex वाली Parivarik Chudai Antarvasana Sex Story आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
माँ हँसी। नाइटी समेटते हुए कमरे से निकलीं। जाँघों के बीच अभी भी नमी चमक रही थी। मैंने उनकी गाँड को जाते हुए देखा। उन्होंने दरवाज़े पर एक बार मुड़कर देखा, मुस्कुराईं, और चली गईं।
बाथरूम का दरवाज़ा फिर खोला। श्रुति जा चुकी थीं। फर्श गीला था, शीशे पर भाप थी, हवा में साबुन और कुछ और गंध मिली हुई थी।
मैंने शावर खोला, शरीर धोया, और सोचा - दीदी ने दरवाज़ा बंद होते सुना होगा या नहीं। सुना होगा तो भी वो चुप रही थीं। घर की औरतों का खुलपन अब मुझसे छिपता नहीं था।
रातों की दबी आहें, एक जैसी ड्रेस, माँ का बेटियों के अंडरगारमेंट खुद चुनना - ये सब अचानक जुड़ने लगा था। पूरा चित्र अभी नहीं था। वो दृश्य बाद में आशा के मुँह से निकला।
उस सुबह मैं सिर्फ़ इतना जानता था कि इस घर में शर्म की दीवार पहले से दरक चुकी है।
कपड़े बदलकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।
थोड़ी देर में माँ नाश्ता लेकर आईं। वन-पीस मैक्सी पहनी हुई थीं, गला बहुत गहरा। ट्रे टेबल पर रखते समय उनकी नज़र मेरे चेहरे पर गई, फिर नीचे। ड्रेस के साइड में कट थे, कमर तक। वो मेरे बाईं तरफ़ खड़ी हो गईं।
मैं दाएँ हाथ से नाश्ता कर रहा था। बायाँ हाथ धीरे से उनकी ड्रेस के अंदर चला गया। माँ हटी नहीं। मेरी कोहनी उनकी जाँघ से छुई, फिर हथेली अंदर सरक गई।
हाथ ऊपर तक गया तो समझ आया - पैंटी फिर नहीं पहनी थी। सुबह की चुदाई के बाद उन्होंने नीचे कुछ नहीं डाला था।
मैंने दाईं गोलाई सहलाई, फिर बीच की रेखा पर मध्यमा फेरी। माँ की साँस बदली। उन्होंने आँखें नहीं खोलीं, होंठ काट लिए। सामने दराज के ऊपर आईना था।
उस आईने में माँ का चेहरा साफ़ दिख रहा था - आँखें बंद, माथा हल्का पसीना। मैंने मध्यमा अंदर कर दी। चूत रात और सुबह से गरम और ढीली थी, उँगली आसानी से चली गई। फिर तर्जनी भी साथ डाल दी।
जिम की वजह से उँगलियाँ मोटी हो चुकी थीं। माँ की टाँगें धीरे-धीरे सिमटने लगीं, दोनों उँगलियाँ भीतर तक समा गईं।
रफ़्तार बढ़ाई। हथेली भीग गई। दो-तीन मिनट में माँ का पानी मेरे हाथ पर आ गया। आईने में उनका चेहरा पूरा पसीने-पसीने था।
माँ ने आँखें खोलीं, आवाज़ बहुत धीमी रखी।
“पिछले बारह घंटे में तूने मुझे दो बार चोदा है। फिर भी तेरा जी नहीं भरता।”
“क्या करूँ माँ, ये लंड माँगे मोर। इस घर की तीनों औरतों का फिगर ही कुछ ऐसा है।”
तभी श्रुति की आवाज़ हॉल से आई, “माँ, मेरा नाश्ता तैयार है क्या?”
माँ ने मेरा हाथ अपनी ड्रेस से बाहर निकाला, जैसे कुछ गिरा हो। “अभी नहीं, पाँच मिनट लगेंगे।”
मैंने गीली हथेली टेबल पर पड़े नैपकिन से पोंछी और नाश्ता खत्म करने लगा। उठने ही वाला था कि सामने से श्रुति इंटरव्यू के कपड़ों में निकलकर आईं।
ग्रे शर्ट, काली ट्राउज़र। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे। उस खुलेपन से स्तनों की गोलाई साफ़ उठ रही थी। मैं तुरंत कुर्सी पर बैठ गया। दीदी मेरे सामने वाली कुर्सी पर आ बैठीं।
“तू आज कहाँ जा रहा है?”
“एक दोस्त से मिलने।”
“मुझे इंटरव्यू के लिए छोड़ देगा? प्लीज़।”
“जाना कहाँ है?”
“बांद्रा ईस्ट। एक एमएनसी का दफ़्तर है।”
“ठीक है, छोड़ दूँगा।”
मेरी निगाह उनके खुले बटनों पर थी। दीदी ने नोट कर लिया। उन्होंने कुछ बटन बंद किए, ऊपर के दो फिर खुले छोड़ दिए। माँ चाय लेकर आईं।
“तुझे नाश्ते के साथ कॉफ़ी चाहिए या चाय?”
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माँ ने शर्ट की तरफ़ देखा, “ज़रा अपने शर्ट के बटन बंद कर ले।”
श्रुति ने चम्मच हिलाते हुए कहा, “माँ, ये इंटरव्यू की नई ट्रिक है। जब ये दो बटन खुले हों तो बॉस सीवी पर कम ध्यान देते हैं।”
“तू और तेरी ट्रिक।”
श्रुति ने जल्दी नाश्ता खत्म किया, फिर मुझसे पूछा, “कैसी लग रही हूँ?”
“ये जॉब आपको मिल ही जाएगी। अगर बॉस कोई मेल हुआ तो और भी जल्दी।”
दीदी मुस्कुराईं। वो मुस्कान शर्मीली कम, हिसाब वाली ज़्यादा लगी। हम दोनों निकले। बाइक पर दीदी मेरे पीछे बैठीं। बांद्रा के दफ़्तर के गेट तक छोड़ आया। उतरते समय उन्होंने सारे बटन बंद कर लिए। मैंने कुछ नहीं पूछा।
दोस्त के घर से दोपहर कट गई। जिम करके शाम साढ़े सात बजे घर लौटा। जूते उतारे, हॉल में कदम रखा - और रुक गया।
सोफे पर एक औरत बैठी थी। बहुत हॉट। उसके साथ एक लड़की थी - नताशा, श्रेया की सबसे अच्छी सहेली। बगल में बैठी सेक्सी औरत उसकी माँ थीं। मेरी निगाह उनकी क्लीवेज पर अटक गई और हटी नहीं।
श्रेया ने कहा, “ये है मेरा भाई संदीप। सैंडी।”
“नमस्ते आंटी।”
जेनिफर ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “नमस्ते बेटा। कैसे हो? हम आपकी सिस्टर्स को नताशा की शादी का निमंत्रण देने आए हैं। अगले हफ़्ते इसकी शादी है। आपको अपनी दोनों बहनों के साथ आना है।”
“कंग्राट्स आपको।”
“थैंक यू। आप भी ज़रूर आइए अपनी सिस्टर्स के साथ।”
“शादी कहाँ है?”
“गोआ में।”
“ओह वॉव। गोआ बहुत खूबसूरत है। मैं ज़रूर आता… लेकिन घर पर माँ के साथ भी कोई होना चाहिए।”
मेरी निगाह उनके गले के नीचे घूम रही थी। आंटी ने वो बात पकड़ ली। उन्होंने साड़ी का पल्लू ठीक किया, मगर छाती और छिपाई नहीं।
“अच्छा, हम चलते हैं। अभी दो जगह और जाना है।”
वो उठीं। चलते-चलते एक बार फिर मुड़ीं। उस निगाह में निमंत्रण सिर्फ़ शादी का नहीं था।
मैं हॉल से निकलकर अपने कमरे में गया, शावर खोला। पानी गिर रहा था और दिमाग में तीन तस्वीरें एक साथ घूम रही थीं - सुबह माँ के बिस्तर पर फटी चूत, टेबल के नीचे भीगी हथेली, और सोफे पर बैठी जेनिफर की खुली क्लीवेज।
नहाकर हॉल में आया तो दोनों दीदी डाइनिंग टेबल पर गोआ का प्लान बाँट रही थीं। श्रुति कह रही थी मंगलवार को फ़ंक्शन है तो सोमवार पहुँच जाएँ। श्रेया कह रही थी शुक्रवार शाम निकलें, शनिवार सुबह गोआ।
“माँ कहाँ है?”
“किचन में खाना बना रही हैं।”
मैं किचन की तरफ़ बढ़ा। माँ गैस के सामने थीं। वही सुबह वाली ड्रेस, साइड में फुल-लेंथ कट, कमर तक। उन्होंने मुझे देखकर मुस्कुराईं।
“आ गया तू।”
“हाँ, नताशा की मॉम बैठे थे तभी आ गया।”
“दस-पंद्रह मिनट में खाना तैयार हो जाएगा।”
“मैं कुछ हेल्प कर दूँ?”
“हाँ, ज़रा सलाद काट दे।”
“खीरा, गाजर और हरी सब्ज़ी कहाँ है?”
“फ़्रिज में है।”
फ़्रिज किचन के एकदम बाएँ कोने में था। वहाँ जाने के लिए माँ के पीछे से निकलना ही पड़ता था। मैं शॉर्ट्स और टी-शर्ट में था। माँ गैस के नीचे शेल्फ़ से सलाद की ट्रे निकाल रही थीं।
जैसे ही उनके पीछे पहुँचा, एक हाथ कमर पर रखा और ड्रेस बाईं तरफ़ सरका दी। अंदर टाइट शॉर्ट्स थीं, बहुत नरम कपड़े की। हाथ गाँड पर रखा, दबाया। माँ उसी पोज़ में रुक गईं। हरी झंडी मिल गई।
दो-तीन बार गोलाई फेरी, फिर शॉर्ट्स नीचे सरका दीं। गोरी गाँड आँखों के सामने थी। बाईं उँगली चूत पर फेरी। माँ हटी नहीं। दोनों उसी वासना में डूबे थे।
तभी श्रेया की आवाज़ आई।
“माँ, बहुत भूख लगी है। जल्दी खाना लगा दो।”
मैं झट से फ़्रिज की तरफ़ खिसक गया। माँ सीधी होकर काम में लग गईं। शॉर्ट्स उन्होंने खुद ऊपर खींच लीं, लेकिन साँस अभी तेज़ थी।
सलाद की थाली लेकर जब डाइनिंग टेबल की तरफ़ निकला, शॉर्ट्स में तंबू बना हुआ था। श्रुति ने देख लिया।
“आजकल कोई बहुत काम कर रहा है।”
“तुम दोनों महारानियाँ कभी माँ की हेल्प नहीं करतीं। और अगर कोई करे तो तुम्हें प्रॉब्लम है?”
श्रुति ने कप उठाया, “हम कहाँ तुझे रोक रहे हैं। हम तो चाहते हैं तुम माँ के हर काम में हेल्प करो।”
श्रेया ने बात काटी, “श्रुति, तेरे इंटरव्यू का क्या हुआ?”
“फ़ाइनल राउंड के लिए सिलेक्ट हो गई। फ़ाइनेंस।”
“बेस्ट ऑफ़ लक।”
माँ खाना लेकर आईं। उस रात नॉन-veg था। खाने के दौरान मेज़ के नीचे माँ का पाँव एक बार मेरे पाँव से सटा, फिर हट गया। श्रेया फिर मुस्कुराई। श्रुति चुप रही, लेकिन उनकी निगाह मेरे चेहरे पर सामान्य से ज़्यादा देर टिकी रही।
खाना उठाने के बाद मैं अपने कमरे में लैपटॉप खोलकर बैठ गया। फ़ाइल अपडेट करनी थी। पौन दस बज गए।
दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं।
“सैंडी बेटा, आज सोना नहीं है तुझे?”
“माँ, आज मेरे बेडरूम में सोते हैं। यहाँ भी डबल बेड है। मुझे सिर्फ़ एक फ़ाइल अपडेट करनी है। दस-बारह मिनट लगेंगे।”
“ठीक है। मैं थोड़ी देर में बदलकर आती हूँ। टेन मिनट दे देना।”
“ओके माँ। तब तक मेरा काम भी हो जाएगा।”
दरवाज़ा बंद हुआ। मैंने फ़ाइल जल्दी खत्म की। दस मिनट बाद माँ आईं।
शॉर्ट नाइटी पहनी थी - जाँघें पूरी ढकती भी नहीं थीं। मैंने बेडरूम का दरवाज़ा बंद किया, बड़ी लाइट बुझाई, डिम लाइट जलाई, बाथरूम जाकर कपड़े बदले, निचला बदन धोया, बॉक्सर पहनकर निकला।
माँ बिस्तर पर लेटी थीं। चेहरा बाईं तरफ़ था। नाइटी पैंटी तक खिसक चुकी थी। मैं बाईं साइड लेट गया। नींद गायब थी। कल रात की चुदाई और आज सुबह की चुदाई दोनों आँखों के पीछे चल रही थीं। लंड फिर खड़ा हो गया।
माँ सोई हुई लग रही थीं, लेकिन बिस्तर के बीच में खिसक चुकी थीं। पीठ मेरी तरफ़ थी। मैं सट गया। खड़ा लंड उनकी गाँड से छुआ। पैंटी गाँड में धँसी हुई थी। मैंने लंड बॉक्सर से बाहर निकाला और गाँड पर लगाया।
माँ के मुँह से निकला, “आह…”
जाग चुकी थीं।
माँ ने गाँड पीछे सरकाई। मेरे दाहिने हाथ को उन्होंने खुद अपने स्तनों पर रख लिया। मैं दबाने लगा। थोड़ी देर बाद वो पीठ के बल लेट गईं।
आँखें बंद थीं, पैंटी साफ़ दिख रही थी। मैंने पैंटी पर चूमा! कोई मनाही नहीं हुई। नाइटी रेशमी थी, खींचते ही गर्दन तक चली गई। दोनों स्तन सामने थे। एक मुँह में लिया, एक हाथ से मसलने लगा। माँ की मोअन धीरे-धीरे खुलने लगी।
पेट पर चुंबन किया, और नीचे गया। पैंटी पर जीभ फेरी। फिर उसे सरकाकर पैरों तक पहुँचा दिया। चूत पर छोटे-छोटे बाल थे, होंठ भीगे हुए। दोनों टाँगें खोलीं, निचले होंठों पर उँगली फेरी। माँ तकिया नोचने लगीं।
मैंने होंठ उनकी चूत पर रख दिए।
माँ की आवाज़ फट कर निकली, “आह… आह… बेटा ये क्या कर रहा है तू। आज तक मुझे ये सुख कभी नहीं मिला।”
“माँ, आज मैं तुझे हर वो सुख दूँगा जो तू डिसर्व करती है।” यह Mom Son की Free Hindi Sex Kahani आप गरम कहानी डॉट कॉम में पढ़ रहे है!
“चाट बेटा… चाट कर खा जा इसे। जितना रस बचा है मेरी चूत में, आज पूरा पी जा। सालों से ये चूत इसी सुख के लिए तड़पती रही है।”
मैंने चाटना जारी रखा। माँ बिना पानी की मछली की तरह तड़पने लगीं।
कुछ देर रस पीने के बाद मैंने बॉक्सर उतारी, लंड उनके मुँह के पास ले गया। दोनों उनसठ की पोज़ में आ गए। पहले माँ ने मुँह नहीं खोला। जब मैंने लंड उनके होठों पर दबाया, मुँह खुल गया। उन्होंने चूसना शुरू किया।
तीन मिनट बाद माँ का शरीर अकड़ा, चूत ने पानी छोड़ा, मैंने वो जूस पी लिया। माँ अभी भी लंड पूरे जोश से चूस रही थीं। पाँच-सात मिनट बाद एक ज़ोरदार पिचकारी छूटी। माँ का मुँह वीर्य से भर गया।
उन्होंने सब निगल लिया, फिर जीभ से लंड चाटकर साफ़ कर दिया।
मैं सीधा हुआ, उनके होठों पर चुंबन किया।
माँ ने साँस लेते हुए कहा, “मुझे बहुत मज़ा आया।”
“मेरा भी आज का तजुर्बा बहुत ज़ोरदार था।”
“तेरा लंड इतना बड़ा कैसे हो गया?”
“पता नहीं। रोज़ सरसों के तेल से मालिश करता हूँ।”
माँ ने मेरा हाथ अपने स्तनों पर रखा, खुद मेरे लंड को सहलाने लगीं। दस-बारह मिनट होठों पर होठ रहे। फिर मैं नीचे गया, क्लिट मुँह में ली। माँ बोलीं, “आह बेटा, ज़रा धीरे…”
उस आवाज़ ने जोश और बढ़ा दिया। पूरी चूत मुँह में लेकर चाटने लगा। माँ उछल पड़ीं।
“आह… आह… बहुत मज़ा आ रहा है। और चूस… पूरा रस पी जा। सालों बाद मेरी चूत इतना पानी छोड़ रही है।”
चाटने के बाद दोनों टाँगों के बीच बैठ गया। सुपाड़ा चूत के मुँह पर रखा। माँ ने आँखें बंद कर लीं, होंठ भींच लिए, तकिया कानों पर दबा लिया। हरी झंडी थी। एक झटका मारा - चाटने से चूत इतनी गीली थी कि लंड एक ही धक्के में पूरा समा गया।
धीमे धक्के शुरू किए। फिर ऊपर आकर होठ चूसे, रफ़्तार बढ़ाई। कुछ देर बाद झड़ गया। साइड में लेट गया।
माँ ने छत की तरफ़ देखते हुए कहा, “आज बहुत सालों बाद मुझे चुदाई का आनंद मिला है।”
“माँ, मैंने अपना पानी तेरी चूत में छोड़ दिया है। कहीं तू प्रेग्नेंट हो गई तो?”
माँ हँसी, बालों में उँगली फेरी। “अरे बुद्धू, मेरा अठारह साल पहले ऑपरेशन हो गया है।”
“हाँ तो फिर ठीक। अब जब भी तुझे चोदूँगा, पानी तेरे अंदर ही छोडूँगा।”
हम दोनों एक दूसरे को गले लगाकर नंगे सो गए।
सुबह माँ पुकार रही थीं। मैंने जवाब नहीं दिया, तकिया चेहरे पर रख लिया। माँ को याद नहीं रहा कि मैं पूरा नंगा सोया था। उन्होंने श्रुति को भेज दिया जगाने।
श्रुति कमरे में आईं - और उनका मुँह खुला रह गया। मेरा लंड पूरा खड़ा था। वो कुछ देर खड़ी देखती रहीं। फिर हाथ बढ़ाया, लंड पकड़ा, धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगीं। मज़ा आने लगा।
मैंने आँखें हल्की खोलीं - श्रुति अपना मुँह लंड के करीब ले आई थीं।
उसी पल माँ कमरे में आ गईं। श्रुति के कंधे पर हाथ रखा।
श्रुति झट से मुड़ीं और बाहर चली गईं। माँ ने मुझे कंबल से ढक दिया और कमरे से निकलीं।
हॉल में आवाज़ें आने लगीं। माँ पूछ रही थीं, “क्या हुआ श्रुति?”
श्रुति की आवाज़ काँप रही थी, “माँ, तूने देखा? भाई कैसे पूरा नंगा सो रहा था?”
“हाँ, वो तो रोज़ ऐसे ही सोता है।”
“कल रात तो वो तुम्हारे साथ सोया था ना?”
“हाँ। लेकिन सुबह उठकर अपने कमरे चला गया था।”
बातें और गहराई में जाने लगीं। मैं बाथरूम का दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि रुक गया। दीवार के उस पार माँ और बेटी वही बात कर रही थीं, जो इस घर को हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
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