बहन ने बनाया मदारचोद! 02

Hindi Sex Stories : माँ की Vasna बहन ने निकलवाई! फिर बेटे ने चूसे मम्मी के बूब्स और चुत! फिर लंड से चोदी चुत! और भर दिया माल! बहन संग मिलकर माँ को बनाया रखैल!


Family Antarvasna :


अभी तक आपने "बहन ने बनाया मदारचोद!" में पढ़ा :-


“भैया… मम्मी जैसी चूत चाहिए तुझे ना… तो पहले मेरी फाड़…”


गलियारे में कदमों की आवाज आई। बहुत हल्की। हम दोनों थम गए। लंड अंदर ही था। कदम rubarub आए और दरवाजे के बाहर रुक गए। एक साँस सुनाई दी। कपड़े की हल्की रगड़। कोई खड़ा था। एक मिनट से ज्यादा।


प्रिया ने मेरे कंधे में नाखून गाड़ लिए, लेकिन आवाज नहीं निकाली। फिर कदम लौटे। धीरे-धीरे।


मम्मी के कमरे का दरवाजा बंद होने की आवाज आई - जोर से नहीं, जैसे कोई सोच-समझकर बंद कर रहा हो।


प्रिया मेरे कान में हँसी, साँस फूलती हुई।


“अब वो माँ नहीं रही भैया। अब वो औरत है जो खड़ी होकर सुन गई और चिल्लाई नहीं। चिल्लाना था तो दस सेकंड में चिल्लातीं। वो गईं सोचने। सोचने वाली औरत राजी होती है, बस समय मांगती है।”


मैं उसके अंदर ही झड़ गया। गुस्सा, डर और कामावेश एक साथ निकला। प्रिया मेरे ऊपर लेटी रही और बालों में उंगलियाँ फेरती हुई बोली, “कल आखिरी धक्का है।


मैं मम्मी से सीधा पूछूँगी कि दरवाजे के बाहर क्या कर रही थीं। तुम तैयार रहना। अगर वो जवाब दें… तो फिर यह घर पहले जैसा नहीं बचेगा।”


मैं छत की तरफ देखता रहा। माँ की साँस दरवाजे के बाहर अभी भी कानों में घूम रही थी। नींद नहीं आई। सिर्फ एक ख्याल बार-बार आता रहा - उन्होंने सुना, समझा, और लौट गईं। लौटना भी एक जवाब होता है।


अब आगे :-


तीसरे दिन सुबह मम्मी देर से उठीं। आँखें सूजी हुई थीं, जैसे रात भर नींद न आई हो। चाय बनाते समय उन्होंने मुझसे सीधा मुँह नहीं मिलाया।


प्रिया ने पूछा, “मम्मी, रात को पानी लेने उठी थीं क्या? मैंने कदमों की आहट सुनी थी।”


मम्मी की करछी एक पल रुक गई। फिर उन्होंने बहुत संभलकर कहा, “नींद नहीं आ रही थी। घर में घूमी थी। तुम लोग देर तक जागते हो, इसलिए आवाजें आती रहती हैं। अब से दरवाजे ठीक से बंद किया करो।”


प्रिया ने कप नीचे रखा। “मतलब आपने?”


मम्मी ने उनकी तरफ देखा। आवाज सख्त थी, लेकिन टूट रही थी।


“मैं बहरी नहीं हूँ प्रिया। इस घर की दीवारें भी पतली हैं। जो नहीं सुनना चाहिए, वो भी कभी-कभी सुनना पड़ जाता है। मैंने कुछ नहीं पूछा। तुम भी आगे से मुझे कुछ समझाने मत निकलना।”


“मैं समझाने नहीं निकली मम्मी। मैं पूछ रही हूँ कि आपने सुना और चुप क्यों रहीं?


अगर आपको गलत लगा होता तो आप सुबह मुझे थप्पड़ मारतीं, आर्यन को डाँटतीं, पापा को फोन करतीं। आपने कुछ नहीं किया। सिर्फ यह कहा कि दरवाजा बंद रखा करो।”


मम्मी का चेहरा लाल हो गया।


“क्योंकि मैं इस घर को बचाना चाहती हूँ। पापा दिल्ली में हैं। नेहा लंदन में है। पड़ोसी हर चीज नापते हैं। अगर मैं शोर मचा दूँ तो क्या बचेगा? तुम्हारी इज्जत, आर्यन की नौकरी, मेरा चेहरा?


मैं माँ हूँ। माँ कभी-कभी चुप रहकर भी घर चलाती है।”


मैं किचन के दरवाजे पर खड़ा यह सब सुन रहा था। मम्मी ने मुझे देख लिया। कुछ देर दोनों तरफ खामोशी रही। फिर उन्होंने बहुत धीमे कहा,


“और तुम… तुम रात को उनके कमरे में जो कर रहे हो, वो मुझे बताने की जरूरत नहीं। मैं समझ गई हूँ। बस इतना याद रखना आर्यन - गलत चीज छुपकर करने से सही नहीं हो जाती।”


प्रिया बोली, “तो सही कैसे होती है मम्मी? पापा महीने में एक बार आकर सो जाते हैं। आप पैंतालीस साल की हो। शरीर की जरूरतें उम्र देखकर नहीं रुकतीं। आप रात को करवटें बदलती हो। मैंने देखा है।”


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“बस कर प्रिया।” मम्मी की आवाज काँपी। “तू मेरी बेटी है, मेरी जज नहीं। और आर्यन मेरा बेटा है, मेरा मर्द नहीं। यह फर्क हमेशा रहना चाहिए।”


प्रिया उनके बहुत पास चली गई। “फर्क तब रहता है जब दिल में फर्क हो। आपकी आँखों में कल रात फर्क नहीं था। दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुनने वाली औरत माँ नहीं रहती मम्मी। वो औरत बन जाती है जो फैसला टाल रही होती है।”


मम्मी ने उनका हाथ हटाया और अपने कमरे में चली गईं। दरवाजा बंद किया, कुंडी नहीं लगाई।


शाम को पापा का फोन आया। मम्मी ने स्पीकर ऑन रखा जैसे हमें सुनाना चाहती हों। पापा बोले, “इस महीने भी नहीं आ पाऊँगा अंजलि। मीटिंग है। तुम संभाल लेना घर।”


मम्मी ने सिर्फ इतना कहा, “हाँ, संभाल लिया है। तुम अपना काम करो।” फोन कटने के बाद वो सिंक के पास खड़ी रहीं। पीठ हमारी तरफ थी। कंधे भारी लग रहे थे।


रात ग्यारह बजकर पंद्रह मिनट पर प्रिया मेरे कमरे में नहीं आई। वो सीधे मम्मी के कमरे गई और मुझे साथ ले गई। मैंने मना किया, “आज मत प्रिया। वो अभी तैयार नहीं।”


प्रिया ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। “तैयार कोई नहीं होता भैया। तैयार किया जाता है। आज छुआई से ज्यादा कुछ नहीं होगा। चुदाई नहीं। बस सच सामने आएगा।”


मम्मी के कमरे में लाइट बंद थी। गली की रोशनी खिड़की से आ रही थी। मम्मी बिस्तर पर करवट लिए लेटी थीं। नाइटी पहनी थी, कंबल कमर तक था। उन्होंने हमें देखा और उठने लगीं।


“इस वक्त क्या चाहिए?”


प्रिया बिस्तर के किनारे बैठ गई। “बात करनी है मम्मी। कल वाली बात अधूरी रह गई।”


“मैं सो रही हूँ। सुबह बात करना।”


“सो नहीं रही थीं आप। आँखें खली हुई हैं।” प्रिया ने उनका हाथ पकड़ा। मम्मी ने छुड़ाने की कोशिश की, फिर छोड़ दिया।


“मैं आर्यन को इसलिए लाई हूँ क्योंकि आप उसे देख चुकी हो। नहाते समय भी, पैर दबाते समय भी, कल रात दरवाजे के बाहर भी। अब इनकार का कोई मतलब नहीं बचता।”


मम्मी ने मेरी तरफ देखा। मेरा गला सूख गया। मैं बोला, “मम्मी, अगर आप कहो तो मैं अभी चला जाऊँ। मैं आपको डराना नहीं चाहता। जो हो रहा है घर में, वो गलत लगता है मुझे भी।


लेकिन गलत लगने के बाद भी मैं रुक नहीं पा रहा। प्रिया ने मुझसे कहा था कि आप अकेली हैं। मैंने आपकी आँखों में वह अकेलापन देखा है।”


मम्मी की आवाज बहुत धीमी निकली। “तुम दोनों मुझे पागल बना रहे हो। मैं तुम्हारी माँ हूँ आर्यन। मैंने तुम्हें दूध पिलाया है। तुम्हारे बुखार में रात जागी हूँ। अब तुम मेरे कमरे में खड़े हो और मेरी बेटी कह रही है कि मैं औरत बन जाऊँ।”


प्रिया ने कहा, “माँ और औरत एक साथ रह सकती हैं। दिन में आप हमारी मम्मी रहना। रात को अपने शरीर की सुन लेना। कोई बाहर नहीं जाने वाला। पापा नहीं आ रहे। नेहा नहीं आ रही। यह घर इन दिनों सिर्फ तीन लोगों का है।”


मम्मी ने कंबल अपनी छाती तक खींच लिया। “एक बार अगर यह रेखा पार हुई तो वापस नहीं आती प्रिया। तुम यह समझती हो?”


“समझती हूँ। इसीलिए धीरे लाई हूँ।” प्रिया ने मेरा हाथ लिया और मम्मी की कमर के पास रखा, कंबल के ऊपर से।


मम्मी का शरीर काँपा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया - हटाने के लिए नहीं, रोकने के लिए कि और आगे न जाऊँ।


“बस यहीं तक,” उन्होंने फुसफुसाया। “आज इससे ज्यादा नहीं। मैं सोचना चाहती हूँ। माँ को भी सोचने का हक होता है।”


मेरा हाथ उनकी कमर की गर्मी महसूस कर रहा था। नाइटी पतली थी। नीचे ब्रा का हुक नहीं लग रहा था।


मैंने कहा, “मैं आज कुछ और नहीं करूँगा मम्मी। बस इतना बता दो - कल रात दरवाजे के बाहर खड़े होकर आपको गुस्सा आया था या कुछ और।”


बहुत देर बाद मम्मी ने जवाब दिया। आँखें गीली थीं, आवाज काँप रही थी।


“गुस्सा भी आया था। शर्म भी आई थी। और… एक बात ऐसी भी आई जिसे माँ होने के नाते कह नहीं सकती। इसलिए जाओ दोनों। दरवाजा बंद करके जाना। और आर्यन, कल सुबह मेरे चेहरे पर वही वाला लड़का बनकर रहना। यह रात यहाँ दब जाए।”


प्रिया उठी। मैंने हाथ हटाया। मम्मी ने कंबल और कस लिया, लेकिन हमारी तरफ पीठ करके नहीं लेटीं। वो देखती रहीं जब तक हम दरवाजे तक नहीं पहुँच गए।


बाहर आकर प्रिया ने बहुत धीमे कहा, “आज जो वाक्य निकला ना भैया - जिसे माँ कह नहीं सकती - वही दरवाजा है। कल रात हम फिर जाएँगे। उस रात वो हाथ नहीं रोकेंगी।”


मैं अपने कमरे में आया और दरवाजा बंद कर लिया। हाथ पर अभी भी मम्मी की कमर की गर्मी थी। नींद नहीं आई। सिर्फ उनकी आखिरी बात घूमती रही। उन्होंने नहीं कहा कि मत आना। उन्होंने कहा - सोचना चाहती हूँ।


सोचने वाली औरत इंकार नहीं कर रही होती। वो समय माँग रही होती है।


चौथे दिन पूरा घर चुप रहा। मम्मी ने सुबह वही वाला चेहरा लगा लिया - चाय, रोटी, “जूते बाहर निकालो” - लेकिन उनकी आँखें मेरे चेहरे पर टिकतीं और हट जातीं।


प्रिया ने दिन में एक बार ही कहा, “रात बारह बजे उनके कमरे के बाहर खड़ा रहना। मैं पहले अंदर जाऊँगी। तुम तभी घुसना जब मैं बुलाऊँ।”


रात बारह बजकर पाँच मिनट पर मम्मी के कमरे का दरवाजा हल्का खुला था। अंदर एक बल्ब जल रहा था। प्रिया बिस्तर के किनारे बैठी मम्मी का हाथ पकड़े हुए थी। मम्मी नाइटी में थीं, कंबल एक तरफ गिरा था। मैं देहलीज पर रुका।


मम्मी ने देखा और आवाज बहुत धीमी निकली, “आर्यन, आज मत आओ। कल जो कहा था ना सोचने को… मैं अभी भी माँ हूँ।”


प्रिया बोली, “मम्मी, सोच लिया आपने। नहीं सोचतीं तो दरवाजा कुंडी से बंद होता। आपने खुला छोड़ा है।”


मैं अंदर आया और दरवाजा इस बार ठीक से बंद कर दिया। “मम्मी, अगर आप एक बार भी साफ कह दो कि जाओ, तो मैं चला जाऊँगा। आधी बात से घर नहीं चलता।


या तो मुझे अपने बेटे की तरह भगाओ, या फिर आज रात जो हो रहा है उसे नाम दो।”


मम्मी की आँखें भर आईं। “नाम क्या दूँ मैं? कि माँ ने बेटे को कमरे में बुलाया? कि बेटी बैठी तमाशा देख रही है? तुम दोनों मुझे पाप की तरफ खींच रहे हो और मैं… मैं रुक नहीं पा रही।”


प्रिया ने उनका चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया। “रुकना है तो अभी कह दो। नहीं तो आर्यन के पास बैठो। आज चुपके-छुपे नहीं होगा। आज सब सामने होगा।”


मैं उनके पास बैठा। नाइटी पतली थी। बिना ब्रा के बूब्स कपड़े में भारी लग रहे थे। मैंने हाथ उनकी कमर पर रखा, कंबल के ऊपर से नहीं - सीधे कपड़े पर। मम्मी काँपीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, कुछ सेकंड रोका, फिर धीरे-धीरे छोड़ दिया।


“धीरे करना आर्यन। मैं तुम्हारी माँ हूँ… यह बात बीच-बीच में याद आ जाएगी।”


मैंने उनका माथा चूमा, फिर गाल, फिर होंठों के पास रुक गया। “याद आए तो कह देना। मैं रुक जाऊँगा।”


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उन्होंने जवाब के बजाय होंठ आगे किए। किस पहले सूखा था, डरा हुआ। फिर उनके होंठ खुले, जीभ काँपती हुई अंदर आई। मैंने नाइटी का पल्ला ऊपर किया। गोरे, भारी बूब्स बाहर आए।


निप्पल बड़े और काले, ठंड से नहीं - उत्तेजना से तने हुए। मैंने एक मुँह में लिया। मम्मी के मुँह से लंबी सिसकी निकली।


“आह्ह्ह… आर्यन… मत चूसो ऐसे… मैं माँ हूँ… अह्ह्ह… वहीं मत दबाओ…”


प्रिया उनके पीछे बैठ गई। उनके बाल पीछे किए और कान में बोली, “माँ हो दिन में। अभी बूब्स किसी माँ के नहीं लग रहे। अभी ये एक औरत के बूब्स हैं जिन्हें सालों बाद किसी ने भूख से चूसा है।”


मैंने दूसरा भी मुँह में लिया, हाथ से मसला, निप्पल दाँतों से हल्का काटा। मम्मी का हाथ मेरे सिर पर था - धक्का देने के लिए नहीं, और दबाने के लिए। प्रिया ने उनकी जांघें खोलीं। पैंटी बीच से गीली चिपक रही थी। प्रिया ने मेरा हाथ वहाँ रख दिया।


“देखो भैया, कितनी गरम हो चुकी हैं। अभी भी कह रही हैं कि सोच रही हूँ।”


मम्मी ने आँखें बंद कर लीं। “प्रिया… तू बहुत आगे निकल गई…”


“मैं वही जगह ले आई जहाँ आप खड़ी थीं मम्मी।” प्रिया ने पैंटी खींच दी। हल्के बाल, फूली फाँकें, चमकता पानी। मैं नीचे गया। गंध से सिर घूम गया। जीभ लगाई तो मम्मी की कमर उछली।


“आह्ह्ह… मत चाटो वहाँ… आर्यन… मैं… अह्ह्ह… अपनी माँ की चूत… मत…”


मैंने नहीं रोका। फाँकें चाटीं, क्लिट चूसी, जीभ अंदर दी। मम्मी ने तकिया मुँह पर दबाया, प्रिया ने हटा दिया। “आवाज निकलो। घर में हम तीन हैं। डर किससे रहा है?”


मम्मी की जांघें मेरे सिर को कसने लगीं। वो मेरे मुँह पर झड़ गईं - शरीर अकड़ा, एक दबी चीख निकली, फिर लंबी कँपकँपी।


मैं उठा। पजामा नीचे किया। आठ इंच का तना लंड उनकी आँखों के सामने आ गया। मम्मी ने देखा और मुँह फेर लिया, फिर वापस देखा।


“इतना… मोटा है… मैं इतने दिन बाद… आर्यन, कंडोम लाओ।”


प्रिया ने साफ कहा, “नहीं मम्मी। आज अंदर ही लेना है। तभी यह बात पूरी होगी। तभी ये मदारचोद बनेगा।”


मैं उनके घुटनों के बीच आया। लंड की नोक गीली चूत पर रखी। “मम्मी, दर्द हो तो नाखून गाड़ देना। निकालने को कहोगी तो निकाल दूँगा।”


उन्होंने सिर हिलाया। मैंने धीरे धक्का दिया। आधा अंदर गया। मम्मी की चूत गरम और भीगी थी, प्रिया जितनी टाइट नहीं। उन्होंने मेरे कंधे दबोच लिए। “आह्ह्ह… रुक… रुक बेटा… बहुत दिन बाद कुछ गया है अंदर… अह्ह्ह…”


मैं रुका। उनके माथे से पसीना पोंछा। फिर और अंदर। पूरा लंड समा गया। तीनों की साँसें एक हो गईं। माँ की चूत में बेटे का लंड। कमरे में और कोई आवाज नहीं थी।


मम्मी की दीवारें लंड निगल रही थीं। गरम, गीली, सालों की प्यास से भरी। मैंने हिलाया नहीं पहले। बस अंदर रखकर महसूस किया। उनकी नाभि मेरे पेट से लगी थी, बूब्स मेरे सीने से दब रहे थे।


“आह्ह्ह… पूरा… पूरा अंदर है ना… आर्यन… बहुत मोटा लग रहा है… अह्ह्ह…”


“पूरा है मम्मी। आठ इंच आपकी चूत में! बताइए कैसा लग रहा है अपने बेटे का लंड?”


वो आँखें भींचे रहीं। जवाब नहीं दिया। प्रिया ने उनका मुँह घुमाया और किस कर लिया, फिर उनके होंठों से अलग होकर बोली, “बोलो ना मम्मी। छुपा के क्या रखना है अब? चूत बोल रही है, मुँह भी बोल दे।”


मम्मी की आवाज टूटकर निकली, “मजा… आ रहा है… नहीं आना चाहिए था… लेकिन आ रहा है… अह्ह्ह आर्यन… धीरे निकालो… फिर धीरे डालो…”


मैंने धीमे धक्के शुरू किए। हर बार लंड लगभग बाहर आता, फिर जड़ तक बैठता। मम्मी की चूत चप-चप करने लगी। उनकी टांगें मेरे कमर पर काँप रही थीं।


“धीरे… हाँ… अब थोड़ा और… अह्ह्ह… आर्यन… याद रखना मैं कौन हूँ…”


“कौन हो मम्मी? बोलो साफ। दिन में माँ, अभी क्या हो?”


प्रिया उनके एक चूचे को मसलते हुए कान में बोली, “बोलो मम्मी, किसकी चूत में लंड है? किसका माल लेने वाली हो आज?”


बहुत देर बाद मम्मी बोलीं, आवाज रोई-सी और गंदी एक साथ, “मेरी चूत में… अपने बेटे का लंड है… अह्ह्ह… भगवान… मैं क्या करवा रही हूँ… अपनी कोख वाले लड़के से चुद रही हूँ…”


मैंने स्पीड बढ़ाई। बिस्तर की चर्र-चर्र तेज हो गई। मम्मी की टांगें खुद मेरी कमर पर बंद हो गईं।


बूब्स हर धक्के पर उछल-उछल कर मेरे मुँह से टकरा रहे थे। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया, जोर से चूसा, दाँतों से दबाया। मम्मी के नाखून मेरी पीठ पर लकीरें काटने लगे।


“आह्ह्ह… चूस… ऐसे ही चूस… हरामी… अपने मम्मी के दूध पी… अह्ह्ह… और गहरा… चूत के अंदर तक ले जा…”


“सुन रही हो प्रिया? मम्मी गाली दे रही हैं। खुल गईं।”


प्रिया ने अपनी नाइटी पूरी ऊपर कर ली और मम्मी के चेहरे के पास अपनी चूत ले गई। “चाटो मम्मी। जो रस तेरे बेटे ने मेरी चूत में भरा है, वो भी चख लो।”


मम्मी ने पहले मुँह फेरा। मैंने उसी वक्त एक जोरदार धक्का मारा। उनकी कमर उछली।


“आह्हhhhh… मत कर ऐसा… प्रिया हटा… अह्ह्ह… नहीं… रख… रख इधर…”


उन्होंने जीभ निकाली। प्रिया की गीली चूत पर पहली बार माँ की जीभ लगी। प्रिया ने बाल पकड़कर बैठ गईं।


“आह्ह्ह मम्मी… चाटो… अपनी बेटी की चूत चाटो जब  बेटा तुम्हारी फाड़ रहा है…”


मैंने मम्मी की दोनों टांगें कंधों पर चढ़ा लीं। कोण बदल गया। लंड और गहरा चला गया। उनकी आँखें खुल गईं।


“उफ्फ्फ… वहाँ… वहाँ लग रहा है… आर्यन रुक… नहीं मत रुक… मार… अपनी मम्मी की चूत मार… रंडी बना दे… अह्ह्ह…”


“कितनी रंडी लग रही हो मम्मी साड़ी उतारने के बाद। पापा को पता चले कि उनकी बीवी बेटे का लंड निगल रही है तो क्या कहेंगे?”


“मत बोल… पापा का नाम मत ले… अह्ह्ह… बस चोद… सोच-सोच कर चोद… मैं तेरी रंडी हूँ आज रात… तेरी मम्मी रंडी… आह्ह्ह हाँ… ऐसे ही… तड़प-तड़प…”


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चप-चप की आवाज तेज हो गई। उनकी चूत से पानी मेरे अंडों तक बह रहा था। मैंने गांड के नीचे हाथ दिया, एक उंगली उनके छेद पर फेरी। मम्मी झटक गईं।


“वहाँ नहीं… आर्यन… गांड मत… आज नहीं… चूत ले… चूत फाड़… अह्ह्ह… उंगली मत डाल…”


मैंने उंगली नहीं डाली, सिर्फ दबाए रखा और चूत में और तेज चलाने लगा। प्रिया मम्मी के मुँह से उतरकर उनके बगल में लेट गई, खुद की चूत में तीन उंगलियाँ किए हुए देख रही थी।


“भैया, इनकी गांड भी लाल कर दे थप्पड़ मारकर। मम्मी को मजा आता है, मुँह से नहीं कहेंगी।”


मैंने उनकी बाईं गांड पर थप्पड़ मारा। आवाज कड़की। मम्मी की चूत ने लंड को जकड़ लिया।


“आह्ह्ह… मार… और मार… हरामी बच्चे… मम्मी की गांड पर मार… अह्ह्ह… मैं झड़ने वाली हूँ… आ रहा है… आ रहा है…”


“झड़ मम्मी। अपने बेटे के लंड पर झड़। चूत से पानी गिरा।”


उनका शरीर अकड़ गया। टांगें काँपीं। चूत फड़क-फड़क कर मेरा लंड निचोड़ने लगी। एक लंबी, दबी-दबी चीख निकली, फिर टूटकर खुल गई।


“आह्हhhhh… आ गया… झड़ गई… आर्यन… तेरी मम्मी झड़ गई… मत निकालना… अंदर रख… अह्ह्ह…”


चूत ने इतना कस लिया कि मैं रुक न सका। कमर अकड़ी। प्रिया ने पीछे से मेरी कमर पकड़ ली।


“अंदर छोड़ो भैया। आज की रात अधूरी मत छोड़ो। मम्मी की कोख में भर दो। मदारचोद बन जाओ पूरी तरह।”


मम्मी ने खुद मेरी गांड पकड़कर अंदर खींचा। “हाँ… छोड़… अंदर छोड़… अपने मम्मी की चूत में माल भर… अह्ह्ह… ले ले मेरी कोख… तेरा है आज…”


मैं अंदर ही झड़ गया। गरम माल उनकी गहराई में छूटता रहा, एक-एक झटके में। मम्मी हर झटके पर काँप रही थीं, चूत अभी भी चूस रही थी जैसे और माँग रही हो।


“उफ्फ्फ… कितना गरम है… भर गया… अह्ह्ह आर्यन… और निकले तो और छोड़… निकाल मत अभी…”


मैं उनके ऊपर गिरा। लंड अंदर ही था, धड़कन दोनों तरफ महसूस हो रही थी। प्रिया ने मम्मी के कान में कहा, “अब ये चूत सिर्फ पापा की नहीं रही मम्मी। अब बेटे का माल भी अंदर पड़ा है।”


मम्मी ने आँखें नहीं खोलीं। सिर्फ साँस के साथ बोलीं, “चुप रह प्रिया… मैं जान गई… अह्ह्ह… निकाल मत अभी आर्यन… थोड़ी देर और अंदर रह… माँ को और महसूस करने दे…”


कमरे में सिर्फ भारी साँसें थीं, बिस्तर की हल्की चर्र, और मम्मी की चूत से धीरे-धीरे रस मिलकर बहने की आवाज। लंड अभी भी उनके अंदर धड़क रहा था। रात खत्म नहीं हुई थी। सिर्फ पहला माल उतरा था।


गरम माल उनकी चूत में भरता रहा, झटके पर झटका। मम्मी ने मुझे सीने से लगा लिया। उनके निप्पल मेरे गाल से चिपक रहे थे। हम तीनों एक पल के लिए वहीं अटक गए।


बहुत देर बाद मम्मी ने छत की तरफ देखते हुए कहा, “यह बात घर से बाहर नहीं जानी चाहिए। पापा को नहीं, नेहा को नहीं, किसी रिश्तेदार को नहीं। दिन में तुम मेरे बेटे हो। रात में… रात की बात रात में रहे।”


प्रिया ने उनके माथे से पसीना पोंछा। “नहीं जाएगी मम्मी। लेकिन यह आखिरी रात भी नहीं है। अब जब चाहो, हम तीनों। इसी कमरे में।”


मम्मी ने इंकार नहीं किया। उन्होंने मेरा सिर अपने सीने से लगाया - बचपन वाला अंदाज, बस इस बार निप्पल मेरे होंठों से छू रहे थे।


“दरवाजा अब से बंद रखा करो। और जब करो… तो धीरे। मैं अभी भी माँ हूँ इस घर की।”


मैंने लंड बाहर निकाला। उनकी चूत से सफेद माल रिसने लगा। प्रिया ने उंगली से लिया और मम्मी के होंठों के पास ले गई। मम्मी ने मुँह फेरा, फिर बहुत धीमे चाट लिया। आँखें बंद थीं।


सुबह चाय बनेगी। पड़ोसी नमस्ते करेंगे। दिल्ली से पापा का फोन आएगा।


लेकिन इस रात के बाद आर्यन सिर्फ बेटा नहीं बचा।
बहन ने उसे मदारचोद बना दिया था!!

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