स्कूटी सिखाने के बहाने रूबी दीदी की बीच सड़क पर चुदाई!
Family Sex Story : दीदी को स्कूटी सिखाने के बहाने मैने उनकी चूंची को दबाकर Antarvasna जगा कर गरम करा फिर उन्हे जंगल में लेजाकर खुली सड़क में कुतिया बना कर उसकी चुत चोदी!
ये कहानी आपको रूबी दीदी सुनाएंगी। कैसे हो जवान जिस्मों , मैं रूबी हूँ। हमारा गाँव है उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा, जहाँ हवा में मिट्टी की खुशबू और खेतों की हरियाली हमेशा बसी रहती है।
मैं 28 साल की हूँ, मेरा रंग सांवला है जिस वजह से मेरी शादी काफी मुश्किल से हुई थी। लेकिन मेरा जिस्म ऐसा है कि देखने वाले की नजरें ठहर जाती हैं। मेरी कमर 28 के साइज़ अनुसार पतली, कूल्हे 30 के जितने चौड़े, और 32 वाली चुंचियाँ है जो ऐसी भरी-पूरी है की साड़ी के ब्लाउज में भी उभर आती हैं।
लोग कहते हैं, मेरा बदन मदक है जैसे कोई शराब की बोतल हो जो, एक घूँट में नशा चढ़ा जाए। मेरा पति शहर में नौकरी करता है, वे महीने में दो-चार बार ही आता है, बाकी वक्त मैं गाँव में अकेली ही रहती हूँ।
लेकिन मेरी जिंदगी में एक तूफान आया था वो था मेरा छोटा भाई हाशमी।
हाशमी, जो 24 साल का जवान लड़का है, वोह लंबा-चौड़ा, काले बालों वाला जो मेरे दिल को अच्छे से समझने की काबिलियत रखती है, और उसकी आँखों में मेरे लिए शरारत भरी चमक मैं हमेशा देखती हूं और उसका लंड! अरे अरे, ये तो बाद में बताऊँगी।
ये कहानी आज से ठीक तीन महीने पहले की है। गर्मियों का मौसम था, जब धूप इतनी तेज कि त्वचा जल जाती थी।
हाशमी पढ़ाई के सिलसिले के फ्री होकर शहर से गाँव लौटा था। हमारा घर थोड़ा पुराना है, आँगन में आम का पेड़, और बाहर गली में जगह-जगह गड्ढे है।
एक दिन शाम को हाशमी ने नई स्कूटी लाकर खड़ी कर दी। वो लाल रंग की चमचमाती हुई स्कूटी थी जैसे कोई खिलौना होता है।
मैंने देखा तो पूछा, "अरे भैया, ये क्यों लाया? शहर की चीजें गाँव में कैसे चलेंगी?" ये Bhai Bahan Ki Chudai Ki Kahani आप Garamkahani पर पढ़ रहे है।
वो हँसा, उसकी हँसी में मुझे कुछ चालाकी लग रही थी वो बोला "दीदी, ये तो तुम्हारे लिए लाया हूँ। भैया तो महीनों आते ही नहीं, तुम्हें तो गाँव में घूमना-फिरना चाहिए बाकी तुम फालतू मत सोचो मैं सिखा दूँगा स्कूटी चलाना।
"मैंने पहले तो मना करा, लेकिन स्कूटी देखकर मन में कुछ कसक सी लगी।"
सच कहूँ, मुझे डर लगता था थोड़ा गड्ढों वाली सड़कें, बैलगाड़ियाँ, और ऊपर से मेरा गदराया बदन, जो पसीने से चिपचिपा हो जाता था। लेकिन हाशमी ने जिद पकड़ ली तो मैं हर गई"कल से शुरू करते हैं, शाम को।" मैंने हामी भर ली।
अगले दिन शाम को मैं तैयार हुई। साड़ी पहनी, लेकिन हल्की हरे रंग की कॉटन वाली, जो मेरे रंग पर चमकती दिखे न जाने क्यों मुझे मेरे रंग की हमेशा फिक्र रहती है।
क्यों के बचपन से रंग की वजह से मुझे काफी न उम्मीदी मिली थी। मेरी सादी का ब्लाउज टाइट था, चुंचियाँ दबे हुए लेकिन उभरे हुए लोग रहे थे। मैने पेटीकोट नाभि के नीचे बाँधा, ताकी गर्मी में आराम मिले।
मेरी नाभि गहरी और गोल है, जो मेरे रंग में चमकती है। मेरा जिस्म भरपूर यौवन से भरा है मगर मेरा रंग मुझे हमेशा परेशान करता है। हाशमी से मेरी करीबी का यही नतीजा था के उसने कभी मुझे मेरे रंग से नहीं परखा।
फिर हुआ ऐसा के हाशमी ने स्कूटी स्टार्ट की और कहा, "दीदी, पीछे बैठ जाओ। पहले मैं तुमको घुमाता हूँ, फिर तुम्हें सिखाऊँगा।" मैं उसके पीछे बैठी, मेरी जाँघें उसके कूल्हों से सटीं थी।
स्कूटी चली तो हवा के झोंके मुझपर आए, मेरे बाल हवा में उड़ने लगे। हाशमी की पीठ चौड़ी थी, मुझे उसके मसल्स महसूस हो रहे थे। मुझे मन में कुछ अजीब सा लगा जैसे कोई पुरानी याद ताजा हो गई हो। ये Gaon me Desi Chudai Ki Kahani आप Garamkahani पर पढ़ रहे है।
हाशमी ने काफी तेज़ स्कूटी चलाई कुछ ही पल में हम गाँव के बाहर खुले मैदान में पहुँचे। वो बस घास का मैदान था, दूर-दूर तक हमे कोई नहीं दिख रहा था। हाशमी ने स्कूटी रोकी और उतर गया। वो मुझसे बोला "अब तुम्हारी बारी। मैं पीछे बैठता हूँ, आप चलाओ कुछ गड़बड़ होगी तो मैं संभालूँगा।"
मैं थोड़ी घबरा गई। "नहीं भैया, डर लगता है मुझे।" लेकिन वो जिद्दी था उसकी बात मानकर मैं आगे बैठी और हैंडल पकड़ा। हाशमी मेरे पीछे आया, उसके हाथ मेरे कंधों पर रखे थे।
उसने मुझे ठीक करते हुए बोला "लिवर दबाओ धीरे से।" फिर स्कूटी चली, लेकिन मैं डगमगा रही थी। अचानक हाशमी चिल्लाया, "बैलेंस ठीक राखी!" और स्कूटी झटके से लुढ़कने लगी।
मैं चीखी, लेकिन वो तेजी से मुझे संभाला संभालते हुए उसने एक हाथ से मेरी कमर पकड़ी, और दूसरे से... अरे दूसरे हाथ से उसने मेरी बायीं चुंची को दबोचकर जोर से दबा दिया! मेरी सांस जैसे गले में रुक गई और झट से स्कूटी रुकी, हम दोनों गिरते-गिरते बचे।
मैं साँसें फूल रही थी, मेरी मोटी चुंची पर उसका हाथ अभी भी था।
मुझे गर्माहट महसूस हो रही थी, जैसे अंदर कोई आग लग गई हो।मेरे कानो में तभी एक हल्की आवाज़ आई "सॉरी दीदी, बैलेंस बिगड़ गया," वो बोला, लेकिन उसकी आँखों में शरारत थी।
मैंने हाथ हटाने को कहा, लेकिन मेरी आवाज काँप रही थी।
"भैया, ये हटाओ...?" वो हँसा, "अरे, बचाने के लिए हो गया था। फिर वो बात बनाते हुए बोला “देखो, स्कूटी ठीक है न?" मैंने कुछ न कहा। मेरे मन में कुछ गुदगुदी सी हो रही थी।
चुंची पर वो दबाव, मेरी त्वचा पर उसकी उँगलियों का निशान मैने उससे घर चलने को कहा और हम वापस लौटे, लेकिन रास्ते भर मैं चुप रही। रात को सोते वक्त वो स्पर्श फिर से याद आया जिससे मेरी चूत गीली हो गई। हाशमी को मैने हमेशा अपना भाई ही मना है वो बस एक मोहल्लेदारी के रिश्ता से मुझसे बचपन से जुड़ा था।
अगले दिन फिर शाम को हम स्कूटी लेकर निकले। मैंने आज सलवार-कमीज पहनी थी वो भी हल्की पिंक वाली, जिसमें मेरी मदक कमर और कूल्हे साफ दिखते है।
आज मैने ब्रा नहीं पहनी मेरे दिल में बना था के आराम मिले लेकिन चूत में कुछ और खलबली थी। हाशमी ने जब मुझे देखा तो उसकी आँखें चमकीं। "चलो दीदी, आज काम बेहतर होगा।" हम फिर वही मैदान में पहुंचे। फिर से मैं आगे बैठी, और वो पीछे आया।
फिर से स्कूटी चली, लेकिन आज उसने जानबूझकर शायद बैलेंस बिगाड़ा। "ओह!" वो चिल्लाया, और फिर से वही नाटक उसने दोहराया वही गिरने का बहाना, संभालना, लेकिन मैने अपनी चूंची पर पहले ही हाथ जमा लिया।
मगर इस बार मेरी दायीं चुंची पर उसका हाथ आया। उसने आज मुझे अधिक जोर से दबा दिया, जैसे जानकर ही मसल रहा हो। मैं न रुक पाई और सिसकारी भर ली आअआआ! "भैया, दर्द हो रहा है।"
लेकिन दर्द कहाँ, वो तो सुख था। उसके अंगूठे ने मेरे निप्पल को छुआ, जो सख्त हो चुका था । हमारी स्कूटी रुकी और हम दोनों हाँफ रहे थे।"दीदी, सॉरी! लेकिन तुम्हारी कुर्ती फिसल गई और चुंचियाँ इतनी नरम हैं ,के हाथ फिसल गया।"
वो बोला, मगर अभी भी हाथ नहीं हटाया। मैंने ही खुद उसे धीरे से हटाया, लेकिन मेरा चेहरा लाल हो गया था। या हो सकता है मेरा गहरा रंग होने से शायद ज्यादा चमक रहा हो। "चलो, आज और प्रैक्टिस करते हैं।"
मैने उससे कहा और हमने फिर स्कूटी चलाई। अब तो हर ब्रेक पर, हर गड्ढे पर, उसके हाथ मेरी चुंचियों पर आ जाते थी। कभी संभालने के बहाने, कभी बैलेंस के नाम पर और बीच-बीच में, वो मेरे कंधे पर सिर रखकर चूम भी लेता।
उसका एहसास उफ्फफ! वो हल्का सा, गर्म साँसों वाला चुम्बन मेरी प्यासी वासना को भड़काने का काम करता था। वो "दीदी, तुम्हारी गर्दन कितनी सुंदर है।" पहली बार तो मैं हट गई, लेकिन दूसरी बार मेरे मन में अच्छा लगा। जैसे कोई पुरानी भूख मिट रही हो।
फिर अगले दिन भी वही हुआ। आज मैंने टी-शर्ट और ट्रैक पैंट पहनी थी जो गाँव में आरामदायक रहती है। मेरी टी-शर्ट टाइट थी जिसमें चुंचियाँ उभरी हुईं लग रही थी। हाशमी ने कहा, "दीदी, आज तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा।" ये Antarvasna Family Sex Story आप Garam Kahani पर पढ़ रहे है।
हम तेज़ी से स्कूटी पर निकले मैदान में पहुँचकर स्कूटी चलाते हुए उसके हाथ फिर मेरी नादान चुंचियों पर आ गया लेकिन आज मैंने उसे रोका नहीं बल्कि, जब वो मेरी चूंची दबा रहा था, तो मैं पीछे झुककर उसके कंधे पर सिर टिका रही थी।
"हमममम! भैया, धीरे! आह, अच्छा लग रहा है।" मैंने उसे फुसफुसाया। वो भी थोड़ा चौंका, फिर मुस्कुराया।
"दीदी, सच?" और फिर हुआ एक चुम्बन आआह! कंधे पर, फिर एक बार मेरी गर्दन पर उसने चूमा। अब मेरी साँसें तेज हो गईं थी।
स्कूटी चलाते हुए, उसके हाथ मेरी जाँघों पर सरकने लगे। मैंने भी कुछ न कहा। मेरे मन में आग लग रही थी। मेरे बदन पर पसीना चमक रहा था हम दोनों थोड़ी देर में घर वापस आ गए। चुंचियाँ सख्त होकर दर्द करने लगीं थी।
हमें स्कूटी पर घूमते हुए दो दिन हो गए थे, और अब मुझे वो स्पर्श अच्छा लगने लगा था। मेरी रातें बेचैन हो रही थी। मैं हाशमी के बारे में सोचती और अपनी चूत पर हाथ फेरती। वो कहने को मेरा भाई था, लेकिन मेरा इरादा साफ था वो भी चुदाई का।
फिर तीसरे दिन मैं तैयार हुई। अब मैने लाल सलवार-कमीज ली लेकिन अंदर कुछ नहीं पहना। "भैया, आज कहाँ चलें?"
मैंने पूछा तो वो बोला, "दीदी, आज एक सुनसान सड़क पर चलते है वहां आसानी से सिखलोगी सब। वो मुझे गाँव के बाहर, जंगल वाली सड़क पर ले आया।
आगे की कहानी : - "स्कूटी सिखाने के बहाने रूबी दीदी की बीच सड़क पर चुदाई 02"
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