सविता भाभी बारिश में चुदने आई!

Chudai Ki Kahani : विधवा सविता रात तक का जवाब देने भीगी साड़ी में आईं! साड़ी से चुचियाँ निकलीं! गिरी फटी चड्डी! फिर कमरे में घुसी कपड़े बदलने! Full कामुक चुदाई!


अभी तक आपने : "चटाई वाली सविता भाभी! 02" में पढ़ा :-


"इतना सुनते ही सविता चौंक गईं। शायद हज़म न हो रहा हो।


“अमेय, ये तुम क्या बोल रहे हो? तुम्हारी उम्र ही क्या है। तेरी माँ और मैं अच्छी दोस्त हैं। तुझको मैंने ऐसी निगाहों से…” इतना कहते-कहते मैंने उनके होठों पर हाथ रख दिया। “रुको जरा भाभी। पहले मेरी बात तो सुनो।”


वो मुझे देखती रहीं। रुकीं। मेरा हाथ हटाया। “क्या अब बोलना बाकी है, इस सब के बाद भी? ठीक है, बोलो।”


“जरा आराम से सोचो। अब आपके पति का देहांत हो चुका है। बेटी भी आपके पास नहीं रहती। आपकी भी कुछ इच्छाएँ होंगी। आप अभी जवान हो।


चटाई बेचना भी कुछ दिनों बंद था, हालत ठीक नहीं है।  ऐसी परिस्थिति में साथ देने वाला कोई चाहिए होगा या नहीं - आप ही बताओ। मैं वो सारी मदद करूँगा… और आप मेरी मदद करना।”


बीच में बोलीं, “तुम्हारी मदद? कैसी मदद? और मुझे कौनसी मदद तुम करोगे?”


“भाभी, आप समझ नहीं रहे। मैं अब जवान हो चुका हूँ। मेरी भी कुछ जरूरतें हैं। आपकी भी।” मैंने उनका हाथ अपने हाथ में लिया। सविता को सब समझ आ रहा था - मुझे उनसे क्या चाहिए। फिर भी भोली बन रही थीं। हाथ छुड़ा लिया।


वो जबसे आई थीं, बिना कुछ बोले मेरे लंड को घूरे जा रही थीं। मतलब साफ था - मन में बहुत सारी इच्छाएँ दबी थीं।


अगर गलत लगता तो कब की चली गई होतीं, या साफ-साफ मना कर देतीं। ऐसे बैठकर मजा नहीं लेतीं। बस घबरा गई थीं कि सब इतनी जल्दी और अचानक हो गया।


शायद सोचा भी न हो कि मैं उनसे ऐसा पूछूँगा भी। मैंने सारा आत्मविश्वास जुटाकर वही पूछ लिया था।


अब आगे :-


सविता शांत खड़ी मेरी बातें सुन रही थीं। मैंने कहा, “देखो भाभी, कुछ गलत लग गया हो तो माफ कर देना। लेकिन साफ लगता है आगे आपको किसी की जरूरत पड़ेगी।


अकेले सब नहीं कर पाओगी। साथ जो भी इंसान आएगा, कैसा निकलेगा पता नहीं।


अगर वो भी आपके पति जैसा निकला तो? रोज शराब, मारना, पीटना - आप ही सोचो, अब वो सब झेल पाओगी? उससे अच्छा मैं ही हूँ ना। आपने मुझे पहले से देखा है, जानती हो। मैं आपको चाहता भी हूँ। आपके लिए कुछ भी कर सकता हूँ।”


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भाभी कुछ नहीं बोल रही थीं। मायूस होकर बस देखे जा रही थीं। मैं आगे बढ़ा, “वो सब छोड़ो। पता है घर किराए का है। इतने दिन काम नहीं किया तो पैसे कम होंगे, खर्चा-पानी सब देखना होगा।


बेटी पास नहीं रहेगी, उसका खर्च तो आपको ही उठाना पड़ेगा। इतने पैसे कहाँ से लाओगी? मुझे थोड़े दिनों में जॉब लग जाएगी। क्यों न ये जिम्मेदारियाँ मैं उठाऊँ। बस आप मेरा ध्यान रखना।”


सुनकर वो थोड़ी शांत हुईं, सोच में पड़ गईं। मुझसे दूर हटकर देखने लगीं। जाल अच्छे से बिछा था — पहले उत्तेजित किया, दबी हुई शारीरिक इच्छा जगाई, फिर जरूरतें गिनाईं, हालत सामने रखी।


उनके पास अच्छा विकल्प और नहीं था। शारीरिक और भौतिक दोनों जरूरतें मैं पूरा कर सकता था, यह उन्हें समझ आ रहा था। फिर भी दुविधा में फँसी थीं। कुछ बोल नहीं रही थीं।


“अब कुछ तो बोलो भाभी। मैं कुछ फोर्स नहीं करने वाला। बस हाँ या ना में जवाब दो। ना हुई तो आगे से चेहरा भी नहीं दिखाऊँगा। हाँ आई तो आपको मेरी रानी बनाकर रखूँगा। सोच लो अब आप ही — रानी बनकर रहना है या वही पुरानी जिंदगी में वापस जाना है।”


वो एकदम मेरी तरफ देखने लगीं। जाने-अनजाने नजर एकदम हल्की नीचे गई, फिर चेहरे पर लौटी। लंड इस सब में बैठ चुका था, लेकिन अंदर कुछ न पहनने की वजह से पैंट में लंबाई छुपी समझ आ रही थी।


शायद वो भी बहुत कुछ चाहती थीं, बस डर रही थीं। जिंदगी में सब अचानक घट रहा था।


सविता बोलीं, “मैं क्या बोलूँ। ऐसे जवाब नहीं दे सकती इस सब का। अभी-अभी बहुत कुछ झेला है। पति शराब पीकर आता था, बहुत मारता था, गालियाँ देता था। कितने दिन भूखी सोई हूँ। मेरी जरूरतों का ख्याल उसने कभी किया ही नहीं।


इस सबसे अभी-अभी बाहर आई हूँ। और इतनी जल्दी किसी और पर भरोसा… वो भी तुम जैसे छोटे, नादान लड़के पर। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”


भड़ास निकाल रही थीं, मन हल्का कर रही थीं। यह अच्छा संकेत था। मैं थोड़ा पास गया, हाथ लिया। इस बार हाथ नहीं झटका। थोड़ा पीछे खींचा, उंगलियाँ मेरे हाथ में रह गईं।


“देखो अमेय, आज तक दूसरों के लिए जिंदगी जी है। अब अपने लिए जीना सोच रही हूँ। तुम आ गए तो क्या होगा, पता नहीं। मैं बड़े संकट में पड़ गई हूँ।”


“कैसा संकट भाभी? आपसे प्यार करना गलत है? या प्यार का इजहार गलत लगा? मैंने साफ शब्दों में कहा है - मैं आपसे प्यार करता हूँ। मेरी कुछ जरूरतें हैं, वो आप पूरी करो। आपकी जरूरतें होंगी, वो मैं पूरा करूँगा। इतना आसान है।”


“नहीं, तुम समझ नहीं रहे क्या बोल रहे हो। तुम इतने जवान हो, मैं विधवा। जितना लगता है उतना आसान नहीं होगा। और तुम्हें मैं ही क्यों पसंद आई? सिर्फ मैं ही क्यों?”


“मुझे सिर्फ आपको पाना है भाभी। तुम ही क्यों - इसका जवाब नहीं है। बस इतना पता है, तुम ही और कोई नहीं।”


सविता गहरे सोच में पड़ गईं। बोल नहीं पा रही थीं। उन्हें भी वो सब चाहिए था, जुबान पर नहीं ला रही थीं। अब आखिरी वार करना था। भाभी छोड़कर नाम से पुकारने की योजना थी - थोड़ा अपनापन लगे, अलग नजर से देख सकें।


“सविता! अब आखिरी बार बताओ। क्या तुम्हें मुझसे प्यार है या नहीं। ये सब चाहती हो या नहीं। वरना यहाँ से जा सकती हो। जाते-जाते याद रखना - मैं फिर कभी नहीं दिखूँगा।”


वो चौंक गईं। अचानक नाम से पुकारना, आखिरी शब्द गुस्से में निकल जाना - चेहरा देखने लायक था। बस रोने को थीं। मैंने दोनों हाथ पकड़े, आँखों में आँखें डालकर पूछा, “क्या है तुम्हारा जवाब भाभी?”


बाँहों में लेना चाहता था, स्तन महसूस करने। तभी उन्होंने हाथ छोड़े, “ठीक है अमेय, जवाब चाहिए ना तो वक्त चाहिए। जल्दबाजी में कुछ नहीं बता सकती। अभी घर जाना होगा। दोपहर हो गई, आज ज्यादा ही देर हो गई है।”


घड़ी में डेढ़ बज रहे थे। हाथ छोड़कर थोड़ा दूर खड़ी हो गईं। उम्मीद टूटने लगी। लगा अब नहीं मानने वाली, जाएगी और वापस नहीं आएगी। खोना नहीं था।


“ठीक है सविता, जा सकती हो। पर एक बात सुन लेना। मुझे अभी तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत है। माँ-बाबा दीदी के पास चले गए, पंद्रह-बीस दिन बाद आएँगे। पढ़ाई की वजह से मुझे यहीं छोड़ा।


अब खाना बनाना, घर का काम, पढ़ाई का वक्त इसी में जा रहा है। क्या यहाँ रहकर मेरा ध्यान रख सकती हो? खाना बनाना, घर साफ रखना। जो भी हो उसके पैसे दे दूँगा।”


बीच में बोलीं, “क्यों? खाना तुम क्यों बना रहे हो? झूठ मत बोलो। मालूम है मामा का घर पास में है, उधर जा सकते हो।” ये Desi Sex Ki Hindi Sex Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!


“मामा-मामी चार-पाँच दिन रिश्तेदारों के यहाँ गए हैं। उसके बाद खाने बुलाया है। चार-पाँच दिन तो मुझे ही करना पड़ेगा ना।” सविता को मनाने के लिए झूठ बोल दिया था।


सोच में पड़ गईं। तभी कहा, “वक्त चाहिए था ना। लो, आज रात तक का समय देता हूँ। जवाब हाँ है तो आज रात तक बताना होगा। इतना ही वक्त दे सकता हूँ। कुछ नहीं आया तो समझ जाऊँगा ना को।”


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“अभी मुझे तुम्हारी जरूरत है। काम पड़ी तो हमेशा साथ रहूँगा।”


सविता देखने लगीं। उनके अंदर भी आकर्षण बैठ रहा था। “ठीक है, सोचूँगी। अगर बात सिर्फ खाना बनाने की हो तो तैयार हूँ। पर सिर्फ दो-तीन दिन बनाऊँगी। तुम्हारे मामा आने तक।”


थोड़ा गुस्सा आया। बार-बार समझाना अच्छा नहीं लग रहा था। “सविता, मैं सिर्फ खाना बनाने के लिए नहीं बुला रहा। तीन दिन रहने के लिए बुला रहा हूँ। पूरा घर सँभालना होगा, मेरा भी ध्यान रखना होगा। मंजूर हो तो ही आना, वरना जरूरत नहीं।


और सुनो - इसके बाद एक शब्द नहीं सुनना। सामान लो और जाओ।”


मायूस हो गईं, आँखों से आँसू टपके। “ठीक है। निकलती हूँ।”


बुरा लगा। शायद ज्यादा कठोर हो गया उस बेचारी पर। पर चूत के लिए उतना तो करना पड़ता है — यही सोचा। “अब आगे की बातें जवाब आने पर ही होंगी। जा सकती हो।”


आँखें पोंछीं, चटाइयाँ उठाने लगीं। अकेले उठा नहीं सकती थीं। मैं मदद को बढ़ा। झट से आगे जाने से लंड पैंट में एक-दो बार उछला। नजर पड़ गई। जानबूझकर नहीं किया था, अंदर चड्डी न होने की वजह से हुआ।


मूड एकदम बदला, गाल में हँस पड़ीं। उछलता लंड देखकर शर्म आई, मुस्कान चेहरे पर साफ थी।


सामान उठाते वक्त मैंने उनके हाथ के ऊपर हाथ रखा, ढेर सिर पर दिया। नजरें चुरा रही थीं, मुस्कान नहीं छुप रही थी। दरवाजा खोला, नीचे जाने लगीं। मैंने दरवाजा लगाया, दौड़कर बालकनी गया, छिपकर देखा - ऊपर देखती हैं क्या। जाते वक्त ऊपर देखा। नीचे आकर बालकनी में देखा।


समझ गया - वो भी पसंद करती हैं, बस डर रही हैं। वही सब करना चाहती हैं जो मैं करना चाहता था। बहुत दिनों से प्यासी थीं, कुआँ खुद चलकर पास आ गया था। चूत गीली हो गई होगी — अंदाजा था। कहीं लग रहा था आज रात नहीं आएँगी।


डरपोक थीं, इच्छा से जीना शायद न आता हो। हिम्मत जुटाकर आईं तो भी अगले दिन, खाना बनाने के बहाने। तब कुछ हो पाए तो हो, वरना चुपचाप खाना खाकर बैठना। शायद आज के बाद मुँह भी न दिखाएँ। ये विचार करके दिमाग फटने लगा था।


दोपहर मामा के यहाँ खाना खाकर आया। करते-करते शाम हो गई। दोस्तों के साथ बाहर घूमने चला गया, बाहर ही खाने का प्लान बन गया। बहुत मस्ती हुई। दोस्तों की वजह से सविता थोड़ी देर दिमाग से उतरी। रात आठ बजे घर लौटा।


बिस्तर हॉल में ही लगाया था - वहाँ टीवी था, सोचा कोई एडल्ट फिल्म देखकर हिला लूँगा। पूरे दिन का तनाव निकलना था।


बिस्तर पर पड़ा। लगभग नौ बज रहे थे। खयाल में अब सविता का आना नहीं था। ये Antarvasna Savita Bhabhi Chudai Ki Kahani आप गरमकहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है!


मोबाइल पर गरमकहानी खोल रखी थी। खड़ा लंड हाथ में था। बाहर हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। दरवाजे-खिड़कियाँ बंद, घर में गर्मी, एसी चालू। लंड हाथ में लिए भाभी की चुदाई की कहानी पढ़ रहा था।


तभी घंटी बजी। डर गया। झट से शॉर्ट्स पहनी। लगा मामा होंगे, या पड़ोस वाली आंटी दिमाग खाने आई होंगी। गालियाँ देते-देते उठा, बिना देखे दरवाजा खोला। जो देखा, देखते रह गया।


सविता भाभी खड़ी थीं। पूरी भीगी हुई। साड़ी पहनी थी, बारिश में बदन से चिपक गई थी। चौंक गया। अपेक्षा ही नहीं थी कि आएँगी। चेहरे की खुशी छुप न सकी।


वो मुझे देखकर मुस्कुराईं। अलग अंदाज से आई थीं, चेहरे की चमक छिपाए नहीं छिप रही थी। कहानियाँ पढ़ने से लंड सख्त हो चुका था। शॉर्ट्स से आकार साफ दिख रहा था। सामने खड़ी थीं, नजर आसानी से लंड पर गई, गाल में हँसने लगीं।


“क्या मैं अंदर आऊँ? या मुझे यहीं रोकने का इरादा है?”


भीगा शरीर, कटीला बदन - नजर हट नहीं रही थी। होश में आया। “अरे नहीं-नहीं। आओ ना अंदर सविता। बारिश बहुत थी क्या?”


अंदर आ गईं। “हाँ, आते वक्त बहुत बारिश लग गई। क्या करे।”


“ऐसी बारिश में क्यों आईं? अब बीमार पड़ गईं तो कौन देखेगा?”


“क्या करे। किसी ने तो बस आज रात तक का वक्त दिया था। उसे परवाह नहीं थी तो मैं क्या कर सकती हूँ।” ताना दे रही थीं। मैं खुश था।


“हाँ फिर। जवाब मिलना जरूरी था, चाहे कुछ भी हो। रुको, आता हूँ।” दौड़कर तौलिया लाया, पोंछने को दिया। शरीर पोंछने लगीं। पूरी गीली थीं। ब्लाउज के अंदर का सब दिख रहा था, स्तन साड़ी से ढक लिए थे। फिर भी भीगी साड़ी में गोल स्तन और उभर आए थे।


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चुचियाँ साड़ी में से ऊपर को आई दिख रही थीं। हाथ में फटी बैग थी, चेन आधी खुली, अंदर कपड़े। बैग सौंप दीं। “अमेय, ये सारे कपड़े भीग चुके हैं। बाहर जाकर सूखने डाल देना।”


सच में दो-तीन दिन रहने आई थीं। खुशी का ठिकाना न रहा। अब उन्हें नंगा करने, कैसे चोदना है - वही सपने घूमने लगे।


“जा रहे हो ना? या मैं ही करूँ?”


होश में आया। “अरे नहीं-नहीं, जा रहा हूँ। ठीक है। तब तक तौलिया से बाल सुखा लेना, वरना सर्दी लग जाएगी।” मेरी तरफ देखकर मुस्कुराईं, गर्दन हिलाई।


बालकनी में बैग खोला। तीन साड़ियाँ निकालीं। दो टाँग दीं। तीसरी खोलते ही कुछ गिरा - अंदर की चड्डी। उठाकर देखा, पिछला भाग पूरा फटा था, छेद-छेद हो गए थे। झट से सूँघा। सविता की चूत की मिठास उसमें से आ ही रही थी।


गीली होने की वजह से उसे भी सुखने डाल दिया। साथ शायद एक ही पैंटी लाई थीं। ब्रा पहनती ही नहीं थीं, यह पहले से मालूम था।


अंदर गया। हॉल में एसी चालू था, भीगकर आई थीं, ठंड लगने लगी थी। फटाफट बोला, “सविता, गरमा-गरम कॉफी लेकर आता हूँ। या चाय चाहिए? तुम बोलो।”


धीरे बोलीं, “चलेंगी कॉफी।” मुस्कुराईं। फिर, “सुनो ना, मेरे पास सिर्फ साड़ियाँ हैं और वो सब भीग गईं। तुम्हारे पास माँ का कोई गाउन वगैरह हो तो दोगे क्या?” नेकी और पूछ-पूछ वाली बात हो गई।


“हाँ सविता, क्यों नहीं। और अब ये घर तुम्हारा ही है। कुछ चाहिए तो बेझिझक माँगना।” बस मुस्कुराईं। उनकी बहुत फिक्र कर रहा था। शायद पहली बार कोई इतने अच्छे से पेश आ रहा हो। वो भी खुश थीं।


अंदर चलने को कहा, अपना कमरा दिखाया। “सविता, ये मेरा रूम है। गीले कपड़े उतारो। मैं तब तक नए कपड़े लेकर आता हूँ।” कमरे में गईं, मुड़ीं, मेरी तरफ देखते-देखते दरवाजा बंद कर लिया।


हँसते हुए बोलीं, “अब जाओ यहाँ से और गाउन लेकर आओ जल्दी।” थोड़ा शर्माया। उनकी साड़ी उतरते देखना था। पीछे-पीछे आते देख समझ गई थीं, इसलिए झट दरवाजा लगा दिया था। अब और कितनी देर रोक सकती थीं? आज पूरी रात मेरी थी।


माँ-पापा के कमरे गया। मालूम था पापा गुस्सा होते हैं तो माँ शांत करने के लिए कुछ अलग तरह के गाउन इस्तेमाल करती हैं, ऊपर वाली अलमारी में रखे हैं। बिस्तर पर चढ़कर देखने लगा - सबसे हॉट कौनसा है।


गाउन देखते-देखते लंड ने सलामी दे दी, खड़ा हो गया। हर गाउन में उन्हें ही देख रहा था। लंड से बोला, बेटे आज तू ही इज्जत रखने वाला है, मस्त खड़ा हो जा।


आगे की कहानी :- "सविता भाभी बारिश में चुदने आई! 02"

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